वामपंथी और तथाकथित बुद्धिजीवियों ने प्राचीन भारतीय विमान प्रौद्योगिकी पर तथ्यहीन शोध पत्र के झूठ को फैलाया!



Ancient Indian Aviation research paper (Courtesy Photo)
Rajeev Ranjan Prasad
Rajeev Ranjan Prasad

मेरे आलेख “वैमानिक शास्त्र – कल्पना और विचारधारा” से असहमत मित्र ने एक शोधपत्र भेजा – “अ क्रिटिकल स्टडी ऑफ द वर्क – वैमानिक शास्त्र (साईंटिफिक ओपीनियन, 1974, पृ 5-12)” तथा इसे इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साईन्स के एच एस मुकुंदा, एस एम देशपाण्डेय एवं एच आर नागेंद्रा द्वारा लिखा गया है। पूरा शोधपत्र पढ कर गहरी निराशा हुई चूंकि अधिकतम विवरण “ऐसा लगता है (appears that), संभावना है (supposed to) अथवा हो सकता है (maybe) जैसी शब्दावलियों से भरा पड़ा है। मेरे सामने प्रश्न यह था कि क्या इन शोधार्थियों ने वैमानिक शास्त्र में उल्लेखित विधियों की बारीक विवेचना प्रस्तुत की है? इसका उत्तर है- नहीं। शोधपत्र का अधिकांश हिस्सा यह सिद्ध करने में लगाया गया है कि वैमानिक शास्त्र महर्षि भारद्वाज की मूल कृति है अथवा किसी ने अपनी कल्पना के आधार पर इसे तैयार किया है। मुझे लगा कि कालखण्ड की बात स्क्रिप्ट की डेटिंग अथवा भाषा-विज्ञान के आधार पर कही गयी होगी। हर युग की अपनी भाषागत पहचान है जिसे कोई भी भाषा-वैज्ञानिक आसानी से सुझा सकता है, परंतु शोधपत्र में उनके द्वारा किये गये काल निर्धारण का यह आधार नहीं था। इससे क्या सिद्ध होता है कि कौन सी पाण्डुलिपी कहाँ मिली,कब मिली?

मैं विज्ञान के उस प्रपत्र को पढा रहा था जो इतिहास का प्रतीत हो रहा था। शोधपत्र के पहले भाग का सार संक्षेप है – Vymanika Shastra was brought into existence sometime between 1900 and 1922 by Pandit Subbaraya Shastry by techniques unclear to us at the moment. इस उद्धरण में रेखांकित करने वाला वाक्य है “तकनीक जिससे वर्तमान में हम अनभिज्ञ हैं – techniques unclear to us at the moment” और यदि यही सच्चाई है तो फिर पूरे शोधपत्र की वैज्ञानिकता पर सवाल खड़ा होता है अथवा वैमानिक शास्त्र पर?

मेरा प्रश्न है कि शिवकर बापूजी तलपडे जिनके विषय में यह कहा जाता है कि उनके द्वारा पहला विमान प्राचीन शास्त्रों को आधार बना कर डिजाईन करने व वर्ष 1895 में उडाने का प्रयास किया गया वह किन संदर्भों पर आधारित था इसका शोधपत्र में संज्ञान क्यों नहीं लिया गया जबकि दयानंद सरस्वती का उद्धरण देते हुए लिखा गया है कि उनके ऋग्वेद के भाष्य (1878 अथवा पूर्व में प्रकाशित) में विमान के परिचालन को ले कर अनेक वर्णन हैं। यहाँ वर्ष 1878 महत्व का नहीं है चूंकि भाष्य मूल कृति नहीं होते, वस्तुत: विमान की शोधपत्र में उल्लेखित संकल्पना उन वैदिक श्लोकों से ली गयी हैं जिनका रचनाकाल ईसामसीह के जन्म से भी हजारो वर्ष पहले का है। प्रपत्र लिखने वालों की भाषा से प्रतीत होता है कि उन्हें आपत्ति है कि विमान शास्त्र में जिन मशीनों/यंत्रों का उल्लेख है वे आधुनिक प्रतीत होते हैं। वे लिखते हैं – It has several tiers, each one containing different yantras (machines). The drawings show parts like cylinder, piston worm gear, and pumps which seem entirely modern (beyond 18th century), समझने में असमर्थ हूँ कि इसपर गर्व होना चाहिये अथवा प्रश्नचिन्ह लगाया जाना चाहिये?

प्रपत्र में दो कृतियों ब्रम्हमुनि परिव्राजका के “वृहद विमान शास्त्र” एवं महर्षि भरद्वाज के “वैमानिक शास्त्र” पर अपर्याप्त चर्चा है। लेखक त्रय लिखते हैं कि वैमानिकी पर केंद्रित उल्लेखित कृतियाँ सीधे सीधे विमान की संरचनागत विशेषताओं को बताने लगती हैं। आधुनिक विज्ञान के दम्भ का प्रदर्शन करते हुए लिखा गया है कि – The science of aeronautics requires an understanding of a number of disciplines: aerodynamics, aeronautical structures, propulsive devices, materials, and metallurgy. The subject works lay uncalled for emphasis on propulsive devices and structures, but little or no emphasis on aerodynamics. इस वाक्यांश से चकित हूँ कि वैज्ञानिकों का लिखा शोधपत्र “एयरोडाईनमिक्स पर कम अथवा नहीं के बराबर जोर देने – little or no emphasis on aerodynamics की बात करता है। यदि ‘नहीं है’ तो बोल्ड अक्षरों में NO लिख कर नकारा जाना चाहिये यदि LITTLE EMPHASIS है तो उस पर स-तर्क चर्चा होनी चाहिये।

शोधपत्र में वैमानिक शास्त्र के विषय में जानकारी देते हुए लिखा गया है कि ग्रंथ में विमान की परिभाषा, विमान चालक, वायु मार्ग, वायु यात्रा के दौरान भोजन, पहने जाने वाले वस्त्र, धातु-प्रयोग, युद्ध में विमान के उपयोग, विविध यंत्रों आदि व उनके प्रयोगों की जानकारी दी गयी है। प्रपत्र मुख्य रूप से चार प्रकार के वर्णित विमानों पर अपने विचार रखता है। लिखा गया है कि ग्रंथों में विमानों के मांत्रिक, तांत्रिक एवं कृतक के रूप में तीन मुख्य वर्गीकरण हैं। कृतक श्रेणी के चार प्रमुखता से वर्णित वायुयानों अर्थात शकुन, सुंदर, रुक्म एवं त्रिपुर पर ही शोधपत्र में चर्चा है – The works [1,2] under discussion contain description and details on the definition of an airplane, a pilot, aerial routes, food, clothing, metals, metal production, mirrors and their uses in wars, varieties of machinery and yantras, planes like ‘mantrik’, ‘tantrik’, and ‘kritak’. Details about four planes in the ‘kritak’ category –Shakuna, Sundara, Rukma, and Tripura – are also given.

सभी चार प्रकार के विमानों का वर्णन पढते हुए आश्चर्य इस बात का है कि प्रपत्र लेखकों को विमान में प्रयोग किये जाने वाले फ्यूल अथवा ईंधन की समुचित जानकारी हासिल नहीं हो सकी है इसकी स्वीकारोक्ति है, उन्हें श्लोकों में प्रयोग किये गये युनिट समझ में नहीं आये और पूरा रिसर्च भी हो गया। वे लिखते हैं – One of them concerns the kind of units used. The basic text uses ‘vitasti’ for length, ‘link’ for speed, ‘kaksha’ for heat, & ‘link’ again for electrical force. The units of speed and temperature are new and, to the best of our knowledge, do not have any easily decipherable meaning. मैं यहाँ लेखकों के “बेस्ट ऑफ अवर नॉलेज” का प्रयोग से सहमत हूँ कि जो समझ में आया ही नहीं उसपर ही पेपर लिख दिया गया और उसे साईंटिफिक भी माना जाये इसका दुराग्रह भी है?

फ्यूल पर तो बाद में चर्चा होगी, एयरोडाईनामिक्स पर भी विमर्श कर लिया जायेगा पहले अनिवार्य मापकों और इकाईयों को तो ठीक से समझ लो फिर दुनिया को समझाना कि विज्ञान अलाना है और शास्त्र फलाना। साईंस के विद्यार्थी इस कथित साईंटिफिक पेपर की हकीकत और नीयत को इस बात से भी समझ सकते हैं कि एक ओर आपको स्पीड/गति, हीट/ऊष्मा तथा इलेक्क्ट्रिकलफोर्स/विद्युतशक्ति की वैमानिक शास्त्र के श्लोकों में प्रयोग की गयी इकाईयाँ समझ नहीं आयीं लेकिन आपको चिंता है कि वजन और द्रव्यमान की इकाईयाँ का उल्लेख क्यों नहीं है -Also, no data have been given about the weights of crafts and their components. This is serious since weight is fundamental to the flying of heavier than air machines. Moreover, the unit of mass does not even appear anywhere is the text. इन शोधार्थियों से प्रश्न उठता है कि क्या वे संस्कृत का यथोचित ज्ञान रखते हैं? क्या वे उन पुरा-शब्दों के अर्थ करने की समुचित योग्यता भी रखते हैं जो कि उल्लेखित वैमानिक शास्त्र की भाषा है? क्या परिशिष्ठ में जितने संदर्भ दिये गये हैं (कुल छ:) वे इतने भर से इस जटिल और महत्वपूर्ण विषय को समझ लिया जायेगा? शोधपत्र की विशेषता है कि इसके लेखकों ने न तो डिजाईन बनाया, न कोई मॉडल तैयार किया, न ही किसी तरह का प्रयोग किया केवल अपने किताबी ज्ञान को सामने रखा है। क्या इसे विज्ञान का शोधपत्र माना जाना चाहिये?

इस कथित शोध-पत्र की चीर-फाड इसलिये आवश्यक है चूंकि इसी को वामपंथी तर्कशास्त्रियों ने आधार बना कर पोल खुली, कल्पना, असत्य आदि संबोधनों के साथ वैमानिक शास्त्र के विरुद्ध बडे बडे व्यंग्य लिखे हैं जिन्हें प्रगतिशील लेबल वाले अखबरों, पत्रिकाओं और वेबसाईटों ने प्रकाशित किया है। मेरा कहना है कि नकार सबसे आखिरी चरण है किसी भी शोध का पहला चरण स्वीकार है। वैमानिकी से ही जुडे एक महत्वपूर्ण ग्रंथ समरांगण सूत्रधार का अनुवाद व संपादन करने वाले प्रसिद्ध इतिहासकार श्रीकृष्ण जुगनू Shri Krishan Jugnu अपने एक लेख में ग्रंथ से उद्धरित करते हैं कि “भोजराज कहते हैं कि वह इस विद्या (वैमानिकी) को खुलकर इसलिए नहीं लिख रहे हैं कि यदि यह विद्या आतंकियों के हाथ पड़ गई तो नुकसान ही अधिक होगा। ग्रंथकार की यह आत्म स्वीकारोक्ति है कि इस विद्या पर राम नामक राजाधिराज के ‘यंत्र प्रपंच’ नामक ग्रंथ में ‘यंत्राध्याय’ है और उसी से वह यथेष्टं वर्णन उद्धृत कर रहा है। इससे लगता है कि 10वीं सदी से पहले राम नामक राजा का इस विद्या पर कोई ग्रंथ था जो बहुत नहीं तो गुप्तरूप से राजाओं के यहां पठनीय, अनुकरणीय रहा होगा”।

इस आलोक में नवभारत टाईम्स में 6 जनवरी 2015 को प्रकाशित इसी शोधपत्र को आधार बना कर लिखे गये एक आलेख के शीर्षक पर गौर करें – “40 साल पहले ही खुल गई थी ‘वैमानिक शास्त्र’ की पोल” और अब आप चाहें तो दो मिनट का मौन भारतीयों की वर्तमान विमर्श प्रक्रिया और सोच के लिये रख सकते हैं। नवभारत टाईम्स ने वर्ष 2015 में एकाएक चालीस वर्ष पश्चात शोधपत्र को इस वाहयात शीर्षक के साथ क्यों प्रकाशित किया जिसे वामपंथी पत्र-पत्रिकाओं व वेबसाईटों ने हाथोहाथ लिया, इसे तलाशने के लिये अधिक यत्न नहीं करना पड़ा।

प्रसिद्ध लेखक श्री सुरेश चिपलूनकर Suresh Chiplunkar के उसी दौरान लिखे गये एक ब्लॉग में जानकारी मिली कि – “जैसे ही यह निश्चित हुआ, कि मुम्बई में सम्पन्न होने वाली 102 वीं विज्ञान कांग्रेस में भूतपूर्व फ्लाईट इंजीनियर एवं पायलट प्रशिक्षक श्री आनंद बोडस द्वारा भारतीय प्राचीन विमानों पर एक शोधपत्र पढ़ा जाएगा, तभी यह तय हो गया था कि भारत में वर्षों से विभिन्न अकादमिक संस्थाओं पर काबिज, एक निहित स्वार्थी बौद्धिक समूह अपने पूरे दमखम एवं सम्पूर्ण गिरोहबाजी के साथ बोडस के इस विचार पर ही हमला करेगा, और ठीक वैसा ही हुआ भी”। तो गडे मुर्दे कब क्यों उखाडे जाते हैं

यह राजनीति का विषय है परंतु वैज्ञानिक कहे जाने वाले शोधपत्र ऐसे उथले हों तो आधुनिकता पर से भरोसा उठ जायेगा। आप योग्य नहीं तो ऐसे शोध में अपना कीमती समय क्यों खर्च करते हैं, आधुनिक विज्ञान के बहुत से विषय सामने हैं, पुरातन को किसी जुनूनी शोधार्थी के लिये छोड दीजिये जो कभी न कभी इस अबूझे विषय के गहरे सागर में उतर मोती तलाश ही लायेगा। आज का विज्ञान ही थोथे तर्क देने लगे और उसी को शोधपत्र का नाम दे कर भ्रमित करने का कार्य करे तो यह अनुचित कृत्य कहा जायेगा। इस तरह के तथ्यहीन प्रपत्र कुतर्कशास्त्रियों के लिये हथियार का काम करते हैं और वास्तविक शोध की दिशा में अवरोध बनते हैं।[अगली कड़ी में जारी……..]

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URL: Indian Education System and the Ghost of Lord Macaulay-9

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Rajeev Ranjan Prasad
Rajeev Ranjan Prasad
राजीव रंजन प्रसाद ने स्नात्कोत्तर (भूविज्ञान), एम.टेक (सुदूर संवेदन), पर्यावरण प्रबन्धन एवं सतत विकास में स्नात्कोत्तर डिप्लोमा की डिग्रियाँ हासिल की हैं। राजीव, 1982 से लेखनरत हैं। इन्होंने कविता, कहानी, निबन्ध, रिपोर्ताज, यात्रावृतांत, समालोचना के अलावा नाटक लेखन भी किया है साथ ही अनेकों तकनीकी तथा साहित्यिक संग्रहों में रचना सहयोग प्रदान किया है। राजीव की रचनायें अनेकों पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं तथा आकाशवाणी जगदलपुर से प्रसारित हुई हैं। इन्होंने अव्यावसायिक लघु-पत्रिका "प्रतिध्वनि" का 1991 तक सम्पादन किया था। लेखक ने 1989-1992 तक ईप्टा से जुड कर बैलाडिला क्षेत्र में अनेकों नाटकों में अभिनय किया है। 1995 - 2001 के दौरान उनके निर्देशित चर्चित नाटकों में किसके हाँथ लगाम, खबरदार-एक दिन, और सुबह हो गयी, अश्वत्थामाओं के युग में आदि प्रमुख हैं। राजीव की अब तक प्रकाशित पुस्तकें हैं - आमचो बस्तर (उपन्यास), ढोलकल (उपन्यास), बस्तर – 1857 (उपन्यास), बस्तरनामा (विमर्श), दंतक्षेत्र (विमर्श), बस्तर के जननायक (शोध आलेखों का संकलन), मौन मगध में (यात्रा वृतांत), मैं फिर लौटूंगा अश्वत्थामा (यात्रा वृतांत), बस्तर- पर्यटन और संभावनायें (पर्यटन विषयक), तू मछली को नहीं जानती (कविता संग्रह), प्रगतिशील कृषि के स्वर्णाक्षर – डॉ. नारायण चावड़ा (जीवनी/ कृषि शोध), खण्डहर (नाटक)। राजीव को महामहिम राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी द्वारा कृति “मौन मगध में” के लिये इन्दिरागाँधी राजभाषा पुरस्कार (वर्ष 2014) प्राप्त हुआ है। उनकी कृति “बस्तरनामा” को पर्यटन मंत्रालय के प्रतिष्ठित राहुल सांकृत्यायन पुरस्कार के लिये चयनित किया गया है। अन्य पुरस्कारों/सम्मानों में संगवारी सम्मान 2013, प्रवक्ता सम्मान (2014), साहित्यसेवी सम्मान (2015) मिनीमाताअ सम्मान (2016) आदि प्रमुख हैं।