दिन में जुआ रात को तश्करी, बांग्लादेश की सीमा बनी गो तश्करों के लिए ऐशगाह !

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देश में पिछले कुछ दिनों से गाय को लेकर जिस तरह न्यूज़ चैनल्स समाचार पत्र और सोशल मीडिया पर चीख चिल्लाहट मची हुई है। उसे देखकर ऐसा लगता है गाय से सम्बंधित सारी समस्यायें शीघ्र ही ख़तम हो जाने वाली हैं। लेकिन यह बात केवल बातों और भाषणों से ख़तम हो जाती तो बीते दशकों में समाप्त हो जाती।

लेकिन गाय को चल रहे हो-हल्ले के बीच भी रोज, गायें मारी जा रही है। गौवंश की खरीद फरोख्त बदस्तूर जारी है! एक्सपोर्ट के जरिये और तश्करी के जरिये भी! सीमा पर चल रहे गौवंश तस्करी का व्यापार धड़ल्ले से बॉर्डर सिक्योरिटी फाॅर्स और पुलिस की आँखों में धूल झोंककर चल रहा है। बांग्लादेश की सीमा पर गाय की तस्करी का यह आलम है कि भारत में अमूनन 5 हजार से 7 हजार रूपए वाली गाय की कीमत 20 हजार से 50 तक पहुच जाती हैं।

बांग्लादेश का बहुत बड़ा हिस्सा भारत की सीमाओं को साझा करता है। लगभग 1000 किलोमीटर के जमीनी हिस्से में सिर्फ आधे हिस्से को ही कवर किया गया है बाकी सारा हिस्सा खुला हुआ है! जो स्मगलरों को आसानी से भारत की सीमा के अंदर प्रवेश करने के लिए पर्याप्त है। खुले बॉर्डर के इतने बड़े हिस्से को बॉर्डर सिक्योरिटी फाॅर्स द्वारा एक साथ कवर करना मुमकिम नहीं है। बांग्लादेश से आये तस्करों को भारत के गौ तस्कर सुरक्षा और गौवंश दोनों मुहैय्या करवाते हैं।

भारत के गौवंश के तश्करों ने बांग्लादेश की सीमा से सटे इलाक़ों में जगह जगह जुएं के अड्डे खोल रखे हैं। जहाँ दिन भर बांग्लादेश से आये तस्कर जुआ खेलते हैं और गौवंश के साथ साथ भारतीय मुद्रा को भी अपने साथ ले जाते है! रात के अंधरे में चुपचाप और सांठगांठ से बड़ी आसानी से सीमा के उस पार चले जाते हैं! आंकड़े बताते हैं कि पिछले कुछ महीनों में लगभग 400 तस्कर पकडे गए जिनसे लगभग 85 से 90 हजार गायें बरामद की गयी हैं।

भारत में गौवंश की उपलब्धता बहुत सरल है, गाय बूढ़ी हो जाये तो लोग आने दो आने में इनका सौदा कर देते हैं! या फिर सड़कों में मरने के लिए छोड़ देते हैं और बड़ी आसानी से तश्करों के हाथों तक पहुच जाती है! भारत से होने वाली गौ तस्करी का बहुत बड़ा हिस्सा बांग्लादेश से होकर जाता है जिसमे भारत के गौ तस्करों से लेकर बांग्लादेश के तस्करो कि भूमिका सबसे ज्यादा है,तो क्यों न इस तस्करी पर लगाम लगाई जय जिससे गौहत्या जैसे अपराधों में कमी लायी जा सके।

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