संविधान की भावना के खिलाफ मुख्य न्यायाधीश अपनी पसंद के न्यायधीशों की नियुक्ति पर अड़े हैं!

सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश टी.एस.ठाकुर अपनी पसंद के न्यायाधीशों की नियुक्ति की जिद पर अड़े हैं, जो साफ-साफ संविधान की मूल भावना का उल्लंघन है। केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कल लोकसभा के पुस्तकालय में संविधान पर आयोजित कार्यशाला में स्पष्ट कहा कि जिस तरह आजकल न्यायाधीशों की नियुक्तियां हो रही हैं, वैसे पहले कभी नहीं हुई। अरुण जेटली पेशे से सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील भी हैं।

वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कहा कि संविधान कहता है कि राष्ट्रपति मुख्य न्यायाधीश से परामर्श करने के उपरांत जजों की नियुक्ति करता है। जेटली के अनुसार, लेकिन इस बात के कई मायने निकाल लिए गए हैं। अब ऐसा देखा जा रहा है कि मुख्य न्यायाधीश की सिफारिश पर सरकार जजों की नियुक्ति करती है, जबकि संविधान इस काम की सारी जिम्मेदारी राष्ट्रपति को देता है। आप संविधान के मूल भाव को उसके एकदम विपरीत नहीं पढ़ सकते हैं। न्यायपालिका न तो कार्यपालिका बन सकती है और न ही विधायिका की भूमिका ही निभा सकती है। जेटली के अनुसार, संविधान में हरेक की शक्तियां अलग-अलग स्पष्ट की गई हैं। ऐसा कोई भाव नहीं आना चाहि कि एक संस्था दूसरे से बेहतर निर्णय ले सकती हैं।

टिप्पणीः संविधान से बड़ी नहीं है न्यायपालिका
वास्तव में देखा जाए तो अरुण जेटली के कथन का आशय यह है कि संविधान राष्ट्रपति को यह अधिकार देता है कि वह जजों की निुयक्ति करे। इसमें मुख्य न्यायाधीश की भूमिका केवल परामर्शदाता की है। लेकिन आज चीफ जस्टिस टी.एस ठाकुर जिस तरह से जजों की नियुक्ति के लिए भेजे अपनी सूची पर अड़े हुए दिखाई देते हैं, उसमें राष्ट्रपति की भूमिका केवल हस्ताक्षर करने और सरकार की भूमिका केवल मुख्य न्यायाधीश की हां में हां मिलाने और राष्ट्रपति की भूमिका केवल हस्ताक्षर करने की रह गई है!

संविधान जिस मुख्य न्यायाधीश को जजों की नियुक्ति के मामले में परामदर्शदाता लिखता है, आज वह मुख्य न्यायाधीश मुख्य निर्णय करता बन गए हैं और संविधान जिन राष्ट्रपति को मुख्य निर्णयकर्ता कहता है, वह केवल मुख्य न्यायाधीश की सूची पर हस्ताक्षर करने वाले बन कर रह गए हैं! यह साफ-साफ संवैधनिक अधिकारों के अतिक्रमण का मसला है! यदि कार्यपालिका व विधायिका गौण हो गई और न्यायपालिका मुख्य रूप से प्रभावी हो गई तो जनता का निर्णय किस पर और किस प्रकार बाध्य होगा? जनता सरकार को पांच साल बाद मताधिकार के प्रयोग से हटा सकती है, जनता भ्रष्ट कार्यपालिका के खिलाफ सूचना के अधिकार कानून से लेकर अदालत तक का दरवाजा खटखटा सकती है, लेकिन जब न्यायपालिका भ्रष्ट हो जाए या मनमानी पर उतर जाए तो जनता कहां जाएगी? इसलिए यह जरूरी है कि संविधान प्रदत्त अधिकारों को विधायिका-कार्यपालिका-न्यायपालिका ठीक से पढ़े और उसी अनुरूप आचरण करे।

क्या है विवादः

ज्ञात हो कि अभी तक जजों की नियुक्ति कॉलेजियम प्रणाली के तहत होती है। सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ जज और संविधान पीठ कॉलेजियम के पांच सदस्यों में से एक जस्टिस जे.चेलेश्वर ने भी कॉलेजियत प्रणाली पर सवाल उठाते हुए कहा था कि “मुझे अपने अनुभवों के आधार पर यह लगता है कि कॉलेजियम में लोग गुट बना लेते हैं। राय और तर्क रिकॉर्ड किए बिना ही चयन हो जाता है। दो लोग बैठकर नाम तय कर लेते हैं और बाकी से ‘हां’ या ‘ना’ के लिए पूछ लेते हैं। कुल मिलाकर कॉलेजियम सबसे अपारदर्शी कार्यप्रणाली बन गई है, इसलिए मैं अब कॉलेजियम की मीटिंग में शामिल नहीं हो पाऊंगा।”

जस्टिस चेलेश्वर ने कहा था कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता को सुरक्षित रखने की मानसिकता से बनाए गए कॉलेजियम सिस्टम पर उन्होंने पक्षपात करने का आरोप लगाया। साथ ही कहा कि कुछ लोग ही न्यायपालिका की स्वतंत्रता का फायदा उठा रहे हैं. और तो और, इस प्रणाली में मजबूत मेरिट वाले और लायक लोगों के लिए कोई स्थान नहीं रह गया है

कॉलेजियम प्रणाली है क्या?

* देश की अदालतों (सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट) में जजों की नियुक्ति की प्रणाली को ‘कॉलेजियम सिस्टम’ कहा जाता है.
1993 से लागू इस सिस्टम के जरिए ही जजों के ट्रांसफर, पोस्टिंग और प्रमोशन का फैसला होता है.

* कॉलेजियम 5 लोगों का एक समूह है. इसमें भारत के चीफ जस्टिस समेत सुप्रीम कोर्ट के 4 सीनियर जज मेंबर हैं. सीनियर जज जे चेल्मेश्वर इसी समूह में मेंबर हैं.

* कॉलेजियम के अन्य सदस्यों में न्यायमूर्ति एआर दवे, न्यायमूर्ति जे एस खेहर और न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा हैं.
कॉलेजियम कथित तौर पर व्यक्ति के गुण-कौशल का मूल्यांकन करता है और उसकी नियुक्ति करता है. फिर सरकार उस नियुक्ति को हरी झंडी दे देती है.

* इस सिस्टम को नया रूप देने के लिए मोदी सरकार ने राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग(NJAC) बनाया था. यह सरकार द्वारा प्रस्तावित एक संवैधानिक संस्था थी, जिसे बाद में सुप्रीम कोर्ट ने रद्द कर दिया।

* NJAC में 6 सदस्य रखने का प्रस्ताव था, जिसमें चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया के साथ सुप्रीम कोर्ट के 2 वरिष्ठ जज, कानून मंत्री और विभिन्न क्षेत्रों से जुड़ीं 2 जानी-मानी हस्तियों को बतौर सदस्य शामिल करने की बात थी। यह जजों के कॉलेजियत से अधिक पारदर्शी और जनता का प्रतिनिधित्व करने वाली संस्था थी।

* लेकिन इसे यह कहकर सुप्रीम कोर्ट ने रद्द कर दिया कि जजों की का चुनाव व नियुक्ति का नया कानून गैर-संवैधानिक है। इससे न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर असर पड़ेगा.

* सीनियर जज जे चेल्मेश्वर के मुताबिक, कॉलेजियम में अब न तो ‘न्यायपालिका की स्वतंत्रता’ बची है, न ही प्रणाली में पारदर्शिता, क्योंकि स्वतंत्रता को कॉलेजियम के किन्हीं दो सदस्यों ने अपने हाथ में ले लिया है. जो इसका विरोध करते हैं, उसे कहीं दर्ज नहीं किया जाता.

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज मार्कण्डेय काटजू ने भी अपने ब्लॉग में कॉलेजियम पर तीखी टिप्पणी की थी. उन्होंने लिखा था, इस सिस्टम में ‘एक हाथ दो, एक हाथ लो’ वाला फॉर्मूला चलता है. लोग पक्षपात करते हैं और बाकी लोग अपने फायदे के लिए उसमें शामिल होते हैं. कुछ लोग अपने रिश्तेदारों को भी चुनते हैं. इसलिए अच्छे जज लाने में यह सिस्टम फेल है.

ज्ञात हो कि इलाहाबाद हाई कोर्ट के जज की नियुक्ति के लिए भेजे गए 44 नामों में से 11 को कॉलेजियम ने रिजेक्ट कर दिया. साथ ही कर्नाटक हाई कोर्ट की सिफारिश पर भेजे गए 10 नामों में से 8 को भी मना कर दिया गया. कारण बताया गया कि रिजेक्ट किए गए जजों के सीनियर जजों और राजनेताओं से रिश्तेदारी थी. जजों की नियुक्ति वाला वर्तमान कॉलेजियम सिस्टम पूरी तरह से भाई-भतीजावाद का शिकार है। सुप्रीम कोर्ट इसे बदलना ही नहीं चाहती और न ही संवैधानिक प्रमुख राष्ट्रपति से लेकर विधायिका तक को इसमें हस्तक्षेप करने का अधिकार देना चाहती है। जिस सुप्रीम कोर्ट को लोगों का जीवन लेने का अधिकार है, उसमें वह कहीं आम लोगों के प्रतिनधित्व को शामिल नहीं करना चाहती! यही कारण है कि इसमें भाई-भतीजावाद और भ्रष्टाचार की बात समय-समय पर बाहर आती रही है।

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