सुप्रीम कोर्ट ने कहा योग शिक्षा की अनिवार्यता को सुनिश्चित करे सरकार, स्वास्थ्य का अधिकार जीने के मौलिक अधिकार का अभिन्न अंग है!

सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक फैसले में कहा कि जो भी स्कूल शिक्षा के कानून के तहत आते हैं उनमें योग शिक्षा को लागू करना सुनिश्चित करे सरकार। उच्चतम न्यायालय ने केंद्र सरकार से कहा कि वह देश में पहली से आठवीं कक्षा तक के विद्यार्थियों के लिए योग शिक्षा अनिवार्य करने के वास्ते राष्ट्रीय योग नीति तैयार करने संबंधी याचिका पर तीन माह के भीतर फैसला ले। भाजपा के नेता और प्रसिद्ध वकील अश्विनी उपाध्याय और जे सी सेठ द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति मदन बी लोकुर की अध्यक्षता वाली पीठ ने केंद्र सरकार से कहा कि वह इस संबंध में दर्ज हुई याचिकाओं पर विचार करे। सुप्रीम कोर्ट ने याचिका का निपटारा करते हुये कहा कि यदि याचिकाकर्ता केंद्र सरकार के निर्णय से खुश नहीं हैं तो तीन महीने बाद नई याचिका दायर कर सकते हैं।

अश्विनी उपाध्याय ने न्यायालय से अनुरोध किया है “वह मानव संसाधन विकास मंत्रालय, राष्ट्रीय शैक्षणिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद,राष्ट्रीय शिक्षक शिक्षण परिषद और केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड को पहली से आठवीं कक्षा के विद्यार्थियों के लिए योग एवं स्वास्थ्य शिक्षा की पाठ्यपुस्तक जारी करने का निर्देश दे।”

संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत स्वास्थ्य का अधिकार जीने के मौलिक अधिकार का आंतरिक हिस्सा है। कल्याणकारी राज्य की अवधारणा के अनुसार सरकार पर देश के सभी नागरिकों, विशेषकर बच्चों और किशोरों, को सम्पूर्ण स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराने का दायित्व होता है। उनके बेहतर स्वास्थ्य के लिए सकरात्मक कदम उठाना सरकार की जिम्मेदारी है।

याचिकाकर्ताओं ने दायर जनहित याचिका में कहा है कि सभी बच्चों को योग एवं स्वास्थ्य शिक्षा उपलब्ध कराये बिना अथवा बिना राष्ट्रीय योग नीति के स्वास्थ्य का अधिकार नहीं दिलाया जा सकता है।

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