कांग्रेस की हार का मतलब नकारात्मक राजनीति की हार, ममता की दो तिहाई जीत का मतलब, नीतीश-केजरीवाल के सपनों का अंत!

Posted On: May 19, 2016

धीरे-धीरे देश से कांग्रेस का सूपड़ा साफ होता जा रहा है! पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के नतीजों ने कांग्रेस को पत्ते की तरह उड़ा दिया है! असम में पिछले 15 वर्षों से सत्ता में रही कांग्रेस जिस तरह से साफ हुई, यह उसकी ताबूत का आखिरी कील साबित हो सकता है! यही नहीं, बंगाल में लेफ्ट-कांग्रेस और तमिलनाडु में डीएमके-कांग्रेस गठबंधन का भी बुरा हश्र हुआ! केरल में भी कांग्रेस सत्ता में थी, लेकिन वह भी उसके हाथ से निकल गया! यह नतीजे दर्शा रहे हैं कि केंद्र की सत्ता खोने के बाद पिछले दो साल में कांग्रेस नेतृत्व ने जिस तरह से नकारात्मक राजनीति की है, जनता ने उसे हर राज्य में नकार दिया है! इस नकारात्मक राजनीति को स्वयं सोनिया-राहुल गांधी ने लीड किया और जनता ने अपने वोट से इन दोनों को उनकी हैसियत दिखाने में जरा भी कोताही नहीं बरती!

कम से कम सोनिया गांधी को अपनी सास इंदिरा गांधी से सीखना चाहिए था। 1977 में करारी हार के बाद इंदिरा गांधी ने जन सहानुभूति के लिए भारत की जनता के समक्ष खुद को पीड़ित के रूप में पेश किया। वह एकदम से खामोश हो गई। जनता पार्टी की सरकार ने जब उन्हें जेल भेजा तो उनकी यही खामोशी, जनता के लिए दुख-दर्द बन गई और देश की जनता ने यह समझा कि इंदिरा गांधी के साथ अन्याय हो रहा है! भारत की जनता व्यक्तिपूजक है। वह अपने बच्चों का भविष्य खराब कर लालू जैसों के बच्चों का भविष्य बनाने के लिए उनके पक्ष में मतदान करती है! केवल तीन साल में इंदिरा फिर से सत्ता में लौट गई! इंदिरा इस व्यक्तिपूजक समाज की मनोदशा को समझती थी, इसलिए चुनाव हारने के बाद भी उन्होंने नकारात्मक राजनीति की राह नहीं पकड़ी।

16 मई 2014 को नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा की जीत आज तक इंदिरा की बहु सोनिया गांधी और उनकी कांग्रेस पार्टी नहीं पचा पाई है। पिछले दो साल से राज्यसभा में लगातार गतिरोध, जेएनयू में देशविरोधी नारे लगाने वाले छात्रों का समर्थन, याकूब मेनन के पक्ष में उतरने वाले हैदराबाद विवि के छात्र रोहित वेमुला के पक्ष में राहुल गांधी का दो-दो बार जाना, झूठी असहिष्णुता का बबंडर खड़ा करना, सेक्यूलरिज्म के नाम पर अपने पक्ष में पुरस्कारी वापसी गैंग को उतारना, कोयला घोटाले में पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और अगस्ता वेस्टलैंड घोटाले में सीधे सोनिया गांधी नाम आने पर प्रधानमंत्री के आवास तक परिवार बचाओ मार्च निकालना, राहुल-सोनिया द्वारा पानी पी-पी कर हर बात में मोदी को कोसना, कांग्रेसी प्रवक्ताओं द्वारा देश के प्रधानमंत्री को स्टूपिड और न जाने किस-किस तरह के अपशब्दों का इस्तेमाल करना–आदि ने जनता की नजर से कांग्रेस को पूरी तरह से उतार दिया है। कांग्रेस यह नहीं समझ पा रही है कि वह जितना नरेंद्र मोदी पर पत्थर उछाल रही है, जनता की नजर से वह उतनी ही तेजी से गिरती चली जा रही है और उतनी ही तेजी से मोदी मजबूत होते जा रहे हैं।

देश की जनता को ऐसा लग रहा है कि नरेंद्र मोदी देश का विकास करना चाहते हैं, लेकिन कांग्रेस के नेतृत्व में चांडाल चौकड़ी उन्हें काम करते नहीं देखना चाहती है! जिस जनता के बैंक खाते में गैस सब्सिडी से लेकर मनरेगा तक का पैसा पहुंच रहा है, उसे कांग्रेस की चांडाल चौकड़ी आखिर कितना बेवकूफ बना सकती है! इस चौकड़ी में कांग्रेस के साथ वामपंथी लेखक व घोटाले में पार्टनर पत्रकार से लेकर दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, नीतीश कुमार, लालू यादव जैसे सभी स्वार्थीतत्व शामिल हैं!

पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की धमाकेदार जीत ने इन स्वार्थी तत्वों के बीच 2019 के लिए अभी से सिर फुटौव्वल की नौबत उत्पन्न कर दी है! ममता बनर्जी ने जीत के बाद यह संकेत दे दिया कि वह अगले लोकसभा चुनाव में दिल्ली की ओर कूच कर सकती हैं! वहीं, बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के राज में रोज हत्याएं, अपहरण, लूटपाट हो रही है, लेकिन वह प्रधानमंत्री बनने का सपना पाले देश भर में कभी संघ मुक्त, कभी भाजपा मुक्त, कभी शराब मुक्ती के नाम पर प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ गठबंधन बनाने के लिए घूम रहे हैं।

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को तो देश की जनता रोज मोदी पर हमला करते हुए देख ही रही है! इन सारे पाखंडियों के पीछे खड़ी कांग्रेस को जनता देख भी रही है और सुन भी रही है! भाजपा ने बंगाल से लेकर केरल तक अपना खाता भी खोला और जम्मू-कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक व गुजरात से लेकर आसाम तक अपना विस्तार भी कर लिया! कांग्रेस जितनी जल्दी यह समझ जाए कि सकारात्मक राजनीति देशहित में है, उतना ही उसकी सेहत के लिए अच्छा होगा। वर्ना देश की जनता इन नकली गांधियों व उनकी पार्टी को जिस तेजी से खारिज करती जा रही है, उससे लगता तो नहीं कि 2019 में यह आज जितनी 44 सीट भी ला पाएगी!

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