समाजवादियों की अवसरवादिता को राममनोहर लोहिया ने पहले ही पहचान लिया था।

Posted On: June 29, 2015
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समाजवादी पार्टी में टिकट बंटवारे को लेकर घमासान जारी है। जहाँ अखिलेश यादव ने 235 उम्मीदवारों की अपनी अलग लिस्ट जारी की उसके तुरंत बाद बाद शिवपाल यादव ने 68 और नाम घोषित कर विवाद को और बड़ा दिया आज भी शिवपाल ने तीन और नामों की घोषणा की। दोनों गुट लखनऊ में अलग-अलग बैठकें कर आगे की रणनीति बनाती दिख रही हैं। रामगोपाल यादव के इस बयान ने स्पष्ट कर दिया है कि पाटी में तनाव चरम पर है और समझौते की गुंजाइश कम है।

दरअसल समाजवादी पार्टी ने समाजवाद के नाम पर केवल परिवार वाद की राजनीती की है इसलिए समाजवाद के नायक रामप्रकाश लोहिया ने पहले हे चेता दिया था की समाजवाद अवसरवादिता की राजनीति से प्रेरित है। समाजवाद के नाम पर देश की जनता को गुमराह करने वाले मुलायम-लालू-नीतीश- कम्‍यूनिस्‍ट भले ही राममनोहर लोहिया का नाम ले-ले कर राजनीति करते रहे हों, लेकिन समाजवादियों की अवसरवादिता और इनके व्‍यक्तित्‍व में बसी सत्‍ता लोलुपता पर राममनोहर लोहिया ने जो प्रहार किया था, उसे टेस्‍टबुक का हिस्‍सा बनने ही नहीं दिया गया, क्‍योकि फिर बच्‍चे बचपन से इनके चरित्र की गंदगी को समझ जाते और इनकी जातिवादी, परिवारवादी, सामंतवादी और अवसरवादी राजनीति देश में पनप ही नहीं पाती।

राममनोहर लोहिया ने अपनी पुस्‍तक ‘भारत विभाजन के अपराधी’ में लिखा है,”भारत के सोशलिस्‍टों (समाजवादियों) ने अपने पूर्ववर्ती और गुरु कांग्रेस (ध्‍यान दीजिए, लोहिया उस जमाने में लिख रहे थे कि समाजवादियों के गुरु कांग्रेसी हैं। और आज आप देख ही रहे हैं कि कांग्रेस विरोध के नाम पर वोट बांटने के बाद ये लोग सत्‍ता में उसी कांग्रेस के साथ मलाई खाने में जुट जाते हैं) पार्टी के नेताओं की तरह अपने ही हाथों प्रशासनिक भला करना और पद से आनंद उठाना चाहा है (यहां समाजवादियों के पद लोलुपता का जिक्र है)।”

उन्‍होंने लिखा, “समाजवादियों ने राजनीतिक अखाड़े के दांव-पेंच (लालू-नीतीश को याद कीजिए कि कैसे उन्होंने राजनीतिक करतब दिखाया था) दिखाने की कोशिश की। उनके पास कोई गांधी नहीं था जो उन्‍हें घोर पतित होने से बचा लेता और न उनमें किसी नेहरू या पटेल जैसा हुनर ही था। उनकी अवसरवादिता (लोहिया बार बार समाजवादियों को अवसरवादी कह रहे हैं, बिहार के सुशासन बापू और जंगलराज दोनों की अवसरवादिता इसका ताजा उदाहरण है) का उन्‍हें कोई फल नहीं मिला, जैसा कि अपने हुनरमंद पूर्ववर्तियों को मिला था! गुनाह-बे-लज्‍जत वे करते रहे।”

इसी पुस्‍तक में लोहिया एक अन्‍य जगह लिखते हैं, “भारतीय सोशलिस्‍टों के मानस में क्रांति की मात्रा के बनिस्‍पत राजनीति की मात्रा अधिक रही है।” (समजावादी, पिछडों व वंचितों को अधिकार दिलाने और सर्वहारा की बात करने वाले इन लोगों के लिए इनके ही गुरु कह रहे हैं कि इनमें क्रांति अर्थात बदलाव की नहीं, केवल राजनीति की चाह रही है)।

लोहिया आगे लिखते हैं,”कांग्रेस नेता कम से कम बुढापा आने तक तो रुके रहे, किंतु ये तो अधेड़ होते होते ही चित्‍त हो गए।” लोहिया वैसे आजादी के संदर्भ में कह रहे हैं कि कांग्रेस बुढापा आने तक तो सत्‍ता का इंतजार करते रहे लेकिन ये समाजवादी तो उससे पहले ही सत्‍ता के लिए अवसरवादी हो गए। अब समझिए कि लालू जैसे लोगों ने सत्‍ता के लिए किस तरह नेहरू की तरह बूढे होने का भी इंतजार नहीं किया, उससे पहले ही समाज को बांटने का खेल रच दिया!

अब इसी खेल को मुलायम के पुत्र ने आगे बढ़ाया है जिन्होंने लालू-मुलायम की थाती को आगे बढ़ाते हुए उन्ही के नक़्शे कदमों पर चलना स्वीकार किया है। मुलायम उम्र भर सपा के सुप्रीमो बन कर रहे और अपनी शर्तों पर जीते रहे लेकिन उनके एकाधिकार को उनके पुत्र अखिलेश यादव तोड़ने जा रहे है! सच ही तो है आदमी की हारने की शुरुवात अपने ही घर से होती है! तो क्या यह मान लिए जाए कि समाजवाद में मुलायम यादव का सूर्य अस्त होने को है।

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