कुरान क्या है? और क्या है इसे लेकर मुसलमानों का विचार?

Posted On: March 2, 2016

कुरआन अरबी भाषा का शब्द है। इसका अर्थ है— अक्षरों और शब्दों को सार्थक क्रम के साथ जोड़ कर जबान से अदा करना, जिसे पढ़ना कहते हैं। इस्लाम के मानने वालों का कहना है कि कुरआन किसी खास जाति या क्षेत्र के लिए नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के लिए अवतरित हुआ है। उसका संबोधन पूरी मानव जाति से है। कुरआन में हैः

बड़ी बरकतवाला है वह जिसने फुरकान (सत्य—असत्य का अंतर स्पष्ट करने वाली किताब) अपने बंदे पर अवतरित किया, ताकि वह सारे संसार के लिए सावधान करने वाला हो।(25:1)

कुरआन ने बार—बार कहा है कि अल्लाह ने मेरे लाने वाले पैगाम को सारे इंसानों का पैगंबर बनाकर भेजा है। ( 34:28 और 7: 158)

मुसलमानों का मानना है कि कुरआन सारे इनसानों के मार्गदर्शन के लिए अवतरित हुआ है। उनका मानना है कि कुरआन हर पहलू से एक मुकम्मल हिदायतनामा और पूर्ण मार्गदर्शन है। वह एक ऐसा दीन और एक ऐसी शरीअत प्रस्तुत करता है, वह एक ऐसी आचार—विचार संहिता और ऐसा संविधान है, जिसमें मनुष्य के विचार और व्यवहार, बाहरी और आंतरिक, व्यक्तिगत और सामूहिक, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय अर्थात् जीवन के एक—एक अंग के बारे में हिदायतें और आदेश मौजूद है। कुरान में अल्लाह ने कहा हैः आज मैंने तुम्हारे लिए तुम्हारे ट्टधर्म’ को पूर्ण कर दिया और तुम पर अपनी नेअमत पूरी कर दी। (कुरआन— 5:3)

मुसलमानों का मानना है कि कुरआन की शिक्षाएं हर जमाने के आदमी के लिएए है। वह किसी विशेष युग की प्रमुख आवश्यकताओं या किसी विशेष जाति के प्रमुख गिरोही तकाजों से आबद्ध होकर नहीं रह गया है। पवित्र कुरआन की यह प्रमुख विशेषता है, जिसके कारणण् उसने अपने लाए हुए दीन को स्वाभाविक धर्म कहा है। (सुराः 30 आयतः 30)
कुरआन ने संसार के सामने खुले शब्दों में ऐलान किया है कि ट्टवास्तव में यह कुरआन वह मार्ग दिखाता है जो सबसे सीधा है! ( कुरआन— 17:9)

इस्लाम के अनुयायियों का मामनना है कि पवित्र कुरान ईश्वर की आखिरी किताब है। कुरआन अपने लाने वाले पैगंबर के बारे में ईश्वर का यह फैसला सुनाता है कि बल्कि वे ईश्वर के रसूल और नबियों के समापक (आखिरी नबी) हैं।(कुरआन— 33:40)

इस्लाम मानता है कि कुरआन पर ईमान लाना और उसका पालन करना निजाद ( मुक्ति) की शर्त है। कोई व्यक्ति भी इसका इनकार कर के आखिरत में घाटे और तबाही से नहीं बच सकता।

मुसलमान मानते हैं कि इस समय केवल पवित्र कुरान ही एक ऐसी ईश्वरीय किताब है जो पूरी तरह से सुरक्षित रह गई है, जिसमें न कोई कमी हुई है और न कोई ज्यादती और न ही किसी प्रकार का कोई परिवर्तन हुआ है। यह जिस भाषा में, जिन शब्दों में, जिन वाक्यों में और जिस क्रम के साथ ईश्वर के पास से उसके लाने वाले पैगंबर का अपना भी कोई शब्द या अक्षर उसमें दाखिल नहीं हुआ है।

कुरआन 114 हिस्सों में बंटा हुआ है, जिसे सूरा (सूरह) कहा जाता है। सुरा को आप अध्याय की तरह समझ सकते हैं अर्थात कुरआन में 114 अध्याय है। सूरा के खास—खास टुकड़ों और वाक्यों को आयत कहा गया है। मुसलमान मानते हैं कि आयतों की हदबंदी भी स्वयं अल्लाह ने ही की है।

आयत का शाब्दिक अर्थ निशानी और चिन्ह होता है। वह प्रकट वस्तु जो किसी छिपी हुई सच्चाई की ओर रहनुमाई कर रही हो, अरबी भाषा में आयत कहलाती है।
कुरआनी आयतें अपने अवतरित होने के समय की दृष्टि से दो प्रकार की हैं— मक्की और मदनी । मक्की वे आयतें हैं, जो हिजरत (पैगंबर मोहम्मद के मक्का से मदीना की ओर प्रस्थान से पूर्व) से पहले उतरी हैं। मदनी उन आयतों को कहा जाता है, जो हिजरत के बाद उतरी हैं।

नोटः कुरआन से जुड़ी यह सभी जानकारियां अनूदित कुरआन मजीद— मौलाना मुहम्मद फारुख खां ( हिंदी अनुवादक), अल—कुरआन इंस्टीट्यूट, लखनऊ (उप्र) से ली गई हैं।

Web Title: know about quran-1

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