महिलाओं के प्रति समाज के दोहरे मानदंड को उघाड़ती फिल्म ‘पिंक’ को अमिताभ के अभिनय ने जबरदस्त बना दिया है!

pink movie

परसों रात सांसद मनोज तिवारी जी के यहां एक प्रीति भोज में सांसद शत्रुध्न सिन्हा आए। यह भोज दिल्ली में मेरे अभिभावक तुल्य अजीत दुबे जी के छोटे भाई अरविंद दुबे जी की भारतीय विमान पत्तन प्राधिकरण से सेवानिवृत्त होने के उपलक्ष्य में रखी गई थी। शत्रुघ्न सिन्हा ने आते ही कहा, एक फिल्म देखकर आ रहा हूं- पिंक! क्या फिल्म है! जबरदस्त! फिर उन्होंने कहा- इस फिल्म की आन, बान और शान है कोई तो वह अमिताभ बच्चन है। क्या अभिनय किया है? उस आदमी में गजब की आग है!

मैं थोड़ा आश्चर्यचकित हो गया कि मीडिया ने तो हमेशा अमिताभ और शत्रुघ्न सिन्ना के बीच एक लड़ाई को प्रदर्शित किया है। फिर यहां तो अभिताभ हैं भी नहीं और न ही मीडिया है! फिर एक घरेलू भोज में यदि शत्रुघ्न सिन्हा पिंक फिल्म में अमिताभ बच्चन की जी खोलकर तारीफ कर रहे हैं तो फिर जरूर यह फिल्म देखने लायक होगी! वैसे अमिताभ महानायक हैं। हर फिल्म में उनका अभिनय लाजवाब होता है, लेकिन पिंक की तो बात ही कुछ और है! पिंक फिल्म देखकर आए फेसबुक पर मेरे एक मित्र ने पिंक का रिव्यू भी जबरदस्त लिखा है, वही आपके लिए यहां प्रस्तुत हैः

विपुल रेगे । मैं ये कतई नहीं कहूंगा कि शुजीत सिरकार की फ़िल्म ‘पिंक’ नारी सशक्तिकरण के नारे को बुलंद करती है। ये उससे भी ज्यादा एक इंसान के अधिकारों की रक्षा की बात करती है। निर्देशक अनिरुद्ध राय चौधरी की पिंक दरअसल एक ‘ब्लैक’ फ़िल्म है जो समाज के छुपे नंगे सवालों को सामने रखती है। शुजीत ने जितने साहस से ये फ़िल्म बनाई है, उतना दम इसे देखने के लिए भी चाहिए।

तीन लड़कियां पार्टी में लड़कों के साथ शराब पीती हैं। उनको शराब पीते देख लड़के ‘ऑफर’ कर देते हैं। इनमे एक दबंग लड़की लड़के का सिर फोड़ देती है। अब मंत्री का भतीजा वो लड़का बदला लेने के लिए लड़की को फिरफ्तार करवा देता है। आरोप है कि तीनों लड़कियां वैश्यावृति करती हैं। लड़कियों की मदद के लिए आगे आता है एक वक्त का मशहूर एडवोकेट दीपक। दीपक अब बूढ़ा हो चूका है लेकिन इन लड़कियों के लिए रक्षक की भूमिका निभाता है। फ़िल्म कई गंभीर सवाल उठाती है। अमिताभ बच्चन के संवाद चुभते से दिल में उतर जाते हैं। जैसे ‘हमारे देश में कैरेक्टर घडी का कांटा देखकर तय होता है’ या फिर रात को लड़की को सड़क से जाते देख कारों के शीशे उतर जाते हैं लेकिन दिन में यही सोच कहां चली जाती है’।

अमिताभ बच्चन ने बूढ़े वकील के किरदार को पल-पल जिया है। इस किरदार को उन्होंने अपने तजुर्बे से तराशा है। कोर्ट रूम ड्रामा ने सबसे जीवंत अमिताभ ही लगे। पीयूष मिश्रा ने भी जबर्दस्त अभिनय दिखाया लेकिन महानायक की विविधता के आगे टिक नहीं पाएं। बड़े अरसे बाद हमें वास्तविक बच्चन के दर्शन हुए हैं। ये फ़िल्म ही अलग है यारा, दिल से बनाई है अनिरुद्ध राय चौधरी ने। फ़िल्म की ओपनिंग धीमी है लेकिन स्पीड पकड़ेगी ये तय है। तापसी पन्नू। उफ़ क्या कहूँ इस लड़की में कितनी ऊर्जा है। पिंक से उसने दिखा दिया है कि उसके भीतर आग भरी हुई है। मेरे कुछ समीक्षक मित्र कह रहे हैं कि फ़िल्म में स्क्रीनप्ले क़ी गलतियां है। यदि कोई फ़िल्म सशक्त ढंग से एक सार्थक सन्देश दे रही हो तो गलतियों को माफ़ कर देना चाहिए।

कई मित्र पूछ रहे हैं कि फ़िल्म का नाम ‘पिंक’ क्यों रखा गया। तो उसका जवाब ये है कि पिंक सीधा-सीधा महिलाओं का प्रतिनिधित्व करता है। फ़िल्म का लोगो देखें तो उसमे सींखचों से बाहर आते दो हाथ दिखाई देंगे। इसे ध्यान से देखना होगा, इसमें ही निर्देशक का सन्देश छुपा हुआ है।

साभार: पत्रकार विपुल रेगे के फेसबुक पेज से.

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