मुख्य न्यायाधीश टी.एस ठाकुर के पिता डीडी ठाकुर इंदिरा-शेख समझौते के तहत जज के पद से इस्तीफा देकर बने थे जम्मू-कश्मीर में मंत्री!

भारत के मुख्य न्यायाधीश माननीय टी.एस. ठाकुर जी का सम्मान करते हुए लोकतंत्र को बचाने के लिए यह कहना जरूरी है स्वतंत्रता दिवस के दिन उन्होंने जो किया, उससे विशुद्ध राजनीति की ध्वनि उत्पन्न होती है! सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीशों की नियुक्ति का मसला सचमुच गंभीर है, इसलिए इस पर माननीय मुख्य न्यायाधीश महोदय को प्रधानमंत्री या काूनन मंत्री के साथ बंद कमरे में बात करनी चाहिए थी, जिससे कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच का विश्वास और सम्मान बचा रह जाता! लेकिन मुख्य न्यायाधीश महोदय के उद्गार से कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच टकराहट की ध्वनि जनता के कानों तक पहुंच रही है, जिससे लोकतंत्रात्मक व्यवस्था का संतुलन डगमगा रहा है!

भारत की स्वतंत्रता दिवस का खास महत्व है! सार्वजनिक रूप से भारत के स्वतंत्रता दिवस के दिन प्रधानमंत्री के भाषण को जनता, मीडिया या विपक्ष निशाना बनाए तो इसे लोकतंत्र की मजबूती के रूप में देख सकते हैं, लेकिन जब इस दिन न्यायपालिका प्रमुख देश के प्रधानमंत्री पर हमला करें इसे लोकतंत्र के लिए किसी भी तरह से शुभ नहीं कहा जा सकता है! मुख्य न्यायाधीश महोदय ने यह कह कर प्रधानमंत्री पर हमला किया कि उन्होंने अपने भाषण में इंसाफ के लिए कुछ नहीं बोला, जो अर्धसत्य है!

माननीय मुख्य न्यायाधीश जी ने प्रधानमंत्री के भाषण में यह तो अवश्य नोट किया होगा कि प्रधानमंत्री के भाषण में न्याय के क्षेत्र की भी चर्चा की गई थी! प्रधानमंत्री मोदी ने कहा था- ‘‘हमने कानूनों के जंजाल का बोझ कम करने का भी काम किया है। हमने ऐसे 1700 कानून ढूंढ निकाले हैं जिसे निरस्त करने का काम किया जा रहा है।’’ इंसाफ कानूनों में जकड़ा है और यदि प्रधानमंत्री इस जकड़न को हटा रहे हैं तो इससे आम आदमी और उससे जुड़ा इंसाफ ही जुड़ा है, न कि कुछ और!

क्षमा के साथ कहना चाहता हूं कि शायद मुख्य न्यायाधीश टी.एस.ठाकुर जी का ध्यान प्रधानमंत्री के भाषण में न्याय से जुड़े इस मसले पर नहीं गया! माननीय न्यायधीश जी ने कहा- ‘‘प्रधानमंत्री देश से जुड़े हर विषय पर बोलते हैं, जो अच्छी बात है, लेकिन उन्हें न्यायपालिका की समस्याओं पर भी बोलना चाहिए।’’ अब कानूनों का मकड़जाल न्याय से जुड़ी समस्या नहीं है तो फिर यह किससे जुड़ी समस्या है? मुख्य न्यायाधीश ने कहा- ‘‘अंग्रेजों के जमाने में दस साल में फैसले आ जाते थे, लेकिन अब न्यायपालिका की दिक्कतों की वजह से देरी होती है।’’

आखिर देश का सर्वोच्च न्यायालय देरी से हो रहे फैसले पर केवल उस सरकार को दोष कैसे दे सकती है, जो केवल 2 साल पहले सत्ता में आई है? न्यायपालिका की दिक्कतें केवल इस दो साल में तो उत्पन्न नहीं हुई, बल्कि 68 साल से सरकारें भी थीं और न्यायपालिका भी! फिर केवल दो साल पुरानी सरकार को इसके लिए दोषी कैसे ठहराया जा सकता है? माननीय मुख्य न्यायधीश या उनसे पूर्व के मुख्य एवं अन्य न्यायधीशों ने पूर्व की सरकारों के समय यह मुद्दा कितनी बार उठाया था? यह सवाल तो बनता है?

आज एक प्रधानमंत्री जो कानून के डिग्री होल्डर नहीं हैं, यदि उनकी सरकार कानून समाप्त करने की दिशा में कदम उठा रही है तो यह सवाल भी उठता है कि कानून के सर्वोच्च शिखर ने इस बारे में अब तक क्या प्रयास किया है ? मुख्य न्यायाधीश महोदय को इस पर भी कुछ बोलना चाहिए था! इसलिए यह कहना कि लाल किले के भाषण में इंसाफ के लिए कुछ नहीं बोला गया, माननीय मैं ससम्मान कह रहा हूं कि आपका यह कथन पूर्णतया सत्य नहीं है!

अब आते हैं मूल बात पर! दरअसल निचली अदालतों में जजों की नियुक्ति के लिए परीक्षाएं होती हैं, लेकिन उपरी अदालत में जज ही जजों को नियुक्त करते हैं! और यह जानकार आपको आश्चर्य होगा कि पूरा न्याय तंत्र भाई-भतीजा वाद की जकड़न में फंसा हुआ है! एक अनुमान के मुताबिक इस देश की उच्च अदालतों पर केवल 70 से 80 परिवारों का कब्जा है और यह 70-80 परिवार ही, भारत की जनता के भाग्य विधाता बने बैठे हैं!

जनता त्रस्त होकर पांच साल में अपने वोट का प्रयोग कर सरकारें तो बदल सकती हैं, लेकिन माननीय न्यायाधीशों की नियुक्ति में उसका कहीं कोई प्रतिनिधित्व नहीं है! क्या लोकतंत्र में न्यायपालिका में ‘लोक’ को जगह नहीं मिलनी चाहिए?

अभी मैं यह लेख लिख रहा हूं, लेकिन माननीयों को यदि इस पर आपत्ति हो जाए तो वह इसे अवमानना का मामला बता कर मुझे जेल में ठूंस सकते हैं! मुझ पर जुर्माना लगा सकते हैं! मुझे जेल में सड़ा सकते हैं! देश तोड़ने वाले ज्युडिशियल कीलिंग शब्द का प्रयोग कर सकते हैं, उन सभी पर आज तक कार्रवाई नहीं हुई, लेकिन मैंने अपनी आंखों से पार्किंग निषिद्ध क्षेत्र में एक जज की गाड़ी पार्क होने की तस्वीर व रिपोर्ट छापने वाले अखबार के संपादक को जेल में जाते देखा है! अभी एक न्यूज चैनल पर 100 करोड़ की मानहानि का मुकदमा भी चल रहा है! आम जनता की तो हैसियत ही क्या? यदि किसी ने कोई सवाल उठा दिया तो उसे अवमानना में जेल जाना पड़ सकता है! भारत में इसके अनेकों उदाहरण भरे पड़े हैं! न्यायपालिका व जजों की अवमानना के लिए कोई तय मानक नहीं है और यही इन्हें लोकतंत्र में सबसे बड़ा और ताकतवर बनाती है!

18 करोड़ जनता के मत से चुने गए प्रधानमंत्री के प्रति भारत के मुख्य न्यायाधीश सार्वजनिक रूप से निराशा तो प्रकट कर सकते हैं, लेकिन प्रधानमंत्री से लेकर उनके मंत्री और उन्हें वोट देने वाली जनता तक मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ बोलने का अधिकार नहीं रखती! यही भारत की न्यायपालिका का सच है! यह लोकतंत्र है, जहां अभिव्यक्ति की आजादी को तय करने वाली अदालतें, अपने खिलाफ किसी को अभिव्यक्ति की आजादी नहीं देतीं! तभी तो भाई-भतीजावाद और वंशवाद से भरी राज्यों की उच्च न्यायालयों और देश की सर्वोच्च अदालत पर कोई भी प्रश्न उठाने का साहस आज तक नहीं कर पाया है? यह उस अंग्रेज जमाने के हुकूमत जैसा है, जिसका जिक्र माननीय मुख्य न्यायाधीश महोदय ने अपने भाषण में किया है!

मोदी सरकार ने वंशवाद की जकड़न की शिकार न्यायलयों को थोड़ा लोकतांत्रिक बनाने का प्रयास किया है, जिसके कारण माननीय नाराज हैं! हालांकि ऐसा नहीं है कि मोदी सरकार ने इसकी पहल की, बल्कि काॅलोजियम व्यवस्था को समाप्त करने की पहल कांग्रेस ने की थी, लेकिन चूंकि अब मोदी सरकार बनाम अदालत यह मामला बन रहा है, इसलिए कांग्रेस अब अदालत की ओर से बयानबाजी कर रही है! काॅलोजियम व्यवस्था को रद्द करने के लिए संसद में लाए व्यवस्था से कांग्रेस ने भी सहमति जताई थी!

माननीय मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली काॅलोजियम ने जिन जजों का नाम सुप्रीम कोर्ट का न्यायाधीश बनाने के लिए भेजा है, मोदी सरकार ने उसे फिलहाल रोक रखा है। दशकों से चली आ रही इस बंद परंपरा को सरकार पारदर्शी बनाना चाहती है, इसलिए छह माह पहले संसद ने सर्वसम्मति से कालोजियम व्यवस्था को समाप्त करने की संस्तुति दी थी, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने बाद में उस पर रोक लगा दिया! अब सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित संवैधानिक पीठ इस पर सुनवाई कर रही है। इसमें स्वयं मुख्य न्यायाधीश सहित पांच जजों का पैनल शामिल है।

ज्ञात हो कि जजों की नियुक्ति के लिए संसद ने जिसे पास किया था, वह जजों की काॅलेजियम व्यवस्था से कहीं अधिक पारदर्शी व्यवस्था है। जजों के कालेजिमय में जहां केवल जज होते हैं, वहीं संसद द्वारा पारित व्यवस्था में जजों की नियुक्ति करने वाले पैनल में मुख्य न्यायाधीश सहित देश के प्रधानमंत्री, कानून मंत्री, नेता विपक्ष एवं दो वकील होना तय किए गए थे। इसके अलावा इस पैनल में एक कानूनी सलाहकार को भी शामिल करने का प्रावधान है, जो भारत के राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत होंगे। यह जजों के काॅलोजियम से कहीं अधिक पारदर्शी और जनता को प्रतिनिधित्व देती व्यवस्था जान पड़ती है!

यह पूरी बहस पारदर्शिता और अपारदर्शिता का है! मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली जजों के पैनल ने भविष्य के सुप्रीम कोर्ट जज के लिए जिन नामों की संस्तुति दी है, उनमें कोई सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश का बेटा है तो कोई किसी वरिष्ठ जज का कनिष्ठ है! यही व्यवस्था चलती चली आ रही है!

जानकार बताते हैं कि स्वयं माननीय टी.एस.ठाकुर भी कई वरिष्ठों को पार कर देश के मुख्य न्यायाधीश बने हैं! माननीय मुख्य न्यायाधीश के पिता स्वर्गीय श्री डी डी ठाकुर का कश्मीर की राजनीति में अच्छा दखल रहा है। इंदिरा गांधी और कांग्रेस के साथ उनके राजनीतिक संबंध थे। स्वर्गीय देवी दास ठाकुर जम्मू-कश्मीर में उप मुख्यमंत्री और वित्त मंत्री रह चुके हैं! श्री देवी दास ठाकुर जम्मू-कश्मीर उच्च न्यायालय में 1973 में जज नियुक्त हुए थे, लेकिन उन्हें राजनीति पसंद था, इसलिए जज के पद से इस्तीफा देकर उन्होंने शेख मोहम्मद अब्दुल्ला की सरकार को ज्वाइन कर लिया। उस समय जम्मू-कश्मीर में मुख्यमंत्री नहीं, प्रधानमंत्री का पद होता था और शेख अब्दुल्ला जम्मू-कश्मीर के प्रधानमंत्री थे। इंदिरा गांधी और शेख अब्दुल्ला के बीच हुए समझौते के बाद 1975 में डीडी ठाकुर अब्दुल्ला सरकार में वित्त मंत्री बने। यही नहीं, जम्मू-कश्मीर में जब जी.एम.शाह सरकार बनी तो श्री ठाकुर 1984-86 तक राज्य के उपमुख्यमंत्री भी रहे। 1989 में जब वी.पी सिंह प्रधानमंत्री बने तो डीडी ठाकुर को आसाम का राज्यपाल नियुक्त किया। बाद में उनके पास अरुणाचल प्रदेश का अतिरिक्त प्रभार भी रहा। उन्होंने राज्यपाल के पद से 1991 में इस्तीफा दे दिया था। इसके अलावा स्वर्गीय डीडी ठाकुर उत्तर-पूर्व राज्यों के इकोनोमी काउंसिल के अध्यक्ष भी रहे। उनकी जीवनी ‘मााई लाइफ- ईयर्स इन कश्मीर पोलिटिक्स’ सभी को जरूर पढ़ना चाहिए।

श्री देवी दास ठाकुर के दूसरे बेटे और वर्तमान मुख्य न्यायाधीश श्री टी.एस ठाकुर के भाई जस्टिस धीरज सिंह ठाकुर भी जम्म्मू-कश्मीर उच्च न्यायालय में जज हैं! यही वर्तमान काॅलेजियम व्यवस्था है, जिसे समाप्त करने के लिए संसद ने प्रस्ताव पारित किया था, लेकिन फिलहाल जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा दिया है! जजों की नियुक्ति इसी संग्राम में फंसी हुई है, जिसे लेकर सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश अप्रसन्नता जाहिर करते हुए प्रधानमंत्री से नाखुश हैं! देश को तय करना है कि जनता से चुन कर आए प्रतिनिधियों वाली संसद की दी गई व्यवस्था सही है या फिर दशकों से चली आ रही जजों की एकाधिकारवादी काॅलेजियम सिस्टम! अब वक्त आ गया है कि इस विमर्श को जनता के बीच ले जाया जाए ताकि जो न्याय उसके पूरे जीवन को प्रभावित करता है, उसमें पारदर्शिता लाया जा सके और उसे बनाने वाली व्यवस्था में उसकी सहभागिता को भी सुनिश्चित किया जा सके!

नोट- इस लेख में वर्णित विचार लेखक के हैं। इससे India Speaks Daily का सहमत होना जरूरी नहीं है।

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