आइडिया ऑफ इंडिया वह नहीं है जो नेहरू ने दिया, बल्कि वह है जिसकी चर्चा पीएम मोदी ने लाल किले से किया!

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यह एक सेतु है! इसका अर्थ समझे बिना इस पर नहीं चल पाएंगे! इस सेतु के एक किनारे को सेक्यूलरिज्म ने काट कर अलग कर दिया था! आज लाल किला से उसे फिर से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने यह कह कर जोड़ दिया- “वेद से विवेकानंद तक, सुदर्शनधारी मोहन से लेकर चरखाधारी मोहन तक, महाभारत के भीम से लेकर भीमराव तक हमारी एक लंबी विरासत है।”

इस लंबी विरासत को पंडित नेहरू के ‘आइडिया ऑफ इंडिया’ में जगह नहीं दी गई थी! वहां वेद के लिए जगह नहीं थी, वहां विवेकानंद से अधिक लेनिन की चर्चा थी, वहां गांधी को उनके राम से काट कर जगह दी गई, वहां आदिवासी हिडिम्बा से शादी करने वाले भीम को केवल इसलिए मिथक माना गया ताकि भारतीय समाज में मुगलों व अंग्रेजों द्वारा रोपित जातिवादी विभाजन को ठोस ठहराया जा सके…!

मोदी ने इस दूरी को पाटने का प्रयास किया है! सेक्यूलर नेहरूवादी इसे हिन्दुत्व ठहरा कर इसकी आलोचना कर सकते हैं, लेकिन इससे वे नजर कैसे चुराएंगे कि केवल हिन्दू ही एक ऐसी जाति है, जो सह-अस्तित्व को स्वीकारता है! इस स्वीकार भाव ने ही भारतीय समाज का ताना-बाना बुना है! आइडिया ऑफ इंडिया वह नहीं है, जिसे सोवियत संघ से चुरा कर नेहरू ने भारतीय समाज पर थोपा और जिसकी ब्रांडिंग पुस्तक लिख-लिख कर वामपंथी- नेहरूवादी इतिहासकारों ने की, बल्कि आइडिया ऑफ इंडिया वह है, जिसकी चर्चा आज नरेन्द्र मोदी कर रहे हैं!

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