रवीश कुमार करते पक्षकारिता हो और रोना रोते हो पत्रकारिता का, बड़े शातिर हो यार!

मनीष ठाकुर। खुद को पत्रकार कहते हैं, नाम रविश कुमार बताते है। जनाब, कभी फेसबुक ट्र्यूटर पर बहुत सक्रिय थे। वो सिर्फ खुद बोलना चाहते हैंं,किसी को सुनना नहीं। एनडीटीवी में नौकर हैे ,पक्षकारिता का धंधा करते हैं। जानते होगें आप, टीवी पर जो मर्जी बोलते है। लाला ने आजादी दे रखी है। वहां सामने से सवाल जवाब की सुविधा तो है नहीं तो आंय बांय बकते थे। फेसबुक ट्यूयर पर यही धंधा करने लगे तो लोगो की लात पड़ने लगी। फिर क्या जनाब, मैदान छोड़कर भाग गए। और लग गए सोशल मीडिया को मवालियों का अड्डा बताने। लेकिन ब्लाग लिखते है इसलिए की वहां, सार्वजनिक मंच की तरह उन्हें कोई ठोंक नहीं सकता। जनाब फेसबुक के बिना जी नहीं सकते तो अपने ब्लाग के ज्ञान को अपने चेेल चपाटों से लगातार फेसबुक पर शेयर करवाते हैं। कुछ दिनो से एक लड़की कैैमरे में उनके साथ घुमती है इस बार ज्ञान उसी के माध्यम से फेसबुक पाठकों तक भेजा है।

देखिए कैसे विक्षिप्त हो गया है एक नामचीन पक्षकार। सचमुच उस पर दया आती है। उसे कल देखा था। मोदी पक्ष और विरोध की पक्षकारिता तो जमकर चल रही है लेकिन ऐसे बीमार कोई नहीं दिख रहा। खुद बोलना चाहता है। जो उसके मुताबिक बोलो वो ठीक जो उसके पक्षकारिता पर सवाल करे वो गुंडे। रिपोर्टिंग के दौरान ऐसी असमान्य हरकतर करते आप ने कभी किसी को नहीं देखा होगा। अब बेचारे को फिल्ड रिपोर्टिंग में कई जगह खदेड़ कर भगाया गया। तो पत्रकारिता का रोना रो रहे हैं। अरे भाई करते पक्षकारिता हो फिर रोते पत्रकारिता के नाम पर क्यो हो? पढिए फिर अनुमान कीजिए… एक सलाह है उसे दौडाईए नहीं, इलाज की सलाह दीजिए…

RAVISH VANI; कौन है जो अचानक आकर पत्रकार और भीड़ को डरा कर चला जाता है – सर्वप्रिया सांगवान

इस बीच जब ये खबर आ रही है कि यूपी सरकार ने कल रवीश कुमार की प्राइम टाइम रिपोर्ट का संज्ञान लेते हुए खोड़ा के एसबीआई बैंक में काउंटर बढ़ा दिए और मोबाइल एटीएम का इंतज़ाम किया है तब मैं पिछले दो दिन की ग्राउंड रिपोर्टिंग के अनुभव को लिखने बैठी हूँ। बुधवार को खोड़ा में रवीश कुमार के साथ मैं भी रिपोर्टिंग पर गयी थी। वहां हमने देखा और रवीश ने भी कई बार दोहराया कि जैसे ही कोई नोटबंदी की वजह से आ रही परेशानियों पर कुछ कहता है तो कहीं से एक दबंग आवाज़ आती है कि क्या हो गया परेशानी है तो, मोदी जी ने ठीक किया। लोग अपनी बात फिर से संकोच के साथ शुरू करते हैं कि हां, हम भी साथ हैं लेकिन खाने को पैसे नहीं हैं।

कल जब शूट खत्म हुआ तो दो बाइक सवार आये और रवीश से बोले कि आप ही के चैनल पर भीड़ दिख रही है बैंकों के सामने, कुछ और भी दिखाइए। उसका बोलना आरोप जैसा लग रहा था। 93% गाँवों में बैंक ही नहीं है, देश की बैंकिंग सिस्टम की हालत साफ़ नज़र आ रही है और फिर भी पता नहीं कौनसे सुहाने सपने दिखाने की उम्मीद कर रहे हैं ऐसे लोग। क्या मीडिया जनता का माइक नहीं होनी चाहिए? क्या वो सिर्फ सरकार और राजनीतिक दलों को प्रेस कांफ्रेंस दिखाने के लिए है? मैं नहीं जानती कि ऐसे लोग एक न्यूज़ चैनल पर और क्या देखना चाहते हैं। शायद, बागों में बहार, वो भी बेमौसम।

आज बुलंदशहर पहुंचे। जिस बैंक में गए, वो 16 गाँवों में अकेला बैंक था, लोग शिकायत करने लगे। हमारी गाड़ी के पीछे एक गाड़ी आकर खड़ी हुई जिस पर वीआईपी का स्टीकर लगा था। लोग अपनी समस्या कह ही रहे थे तभी एक व्यक्ति वहां आया जो पहले से उस भीड़ में मौजूद नहीं था। उसने रवीश को कहा कि परेशानी है तो क्या हुआ, बॉर्डर से ज़्यादा नहीं है, बॉर्डर पर 80% जाट मरते हैं और मैं भी जाट हूँ। कल आरोप की तरह बात की गयी और आज ये व्यक्ति धमकाने लगा, अपने साथ कुछ लड़कों को लाया था और उनके साथ मिलकर मोदी मोदी चिल्लाने लगा। बाकी लोग उन नारों की आवाज़ से चुप हो गए जैसे किसी ने सावधान की मुद्रा में खड़े रहने को कहा हो। हम बिगड़ते हालात को देख कर वहां से निकल गए और ये व्यक्ति भी बिना पैसा लिए या बैंक की लाइन में लगे वहां से अपनी स्कूटी पर चला गया।वक़्त कुछ ऐसा ही है कि जान कोई दे रहा है और उसकी जान की कीमत उसकी जाति के लोग घर बैठे वसूल रहे हैं। बिना कुछ किये। गुंडागर्दी करते हुए आप बता रहे हैं कि जाट हैं तो क्या आप उस जाति की इज़्ज़त को बढ़ा रहे हैं या घटा रहे हैं?

फिर हम एक अनाजमंडी पहुंचे, जहाँ लोग यूरिया खरीदने के लिए लाइन लगाये हुए थे,किसी ने बताया कि उसने अभी धान बेचा और नकद मिला जिसमें पुराने 500 और 1000 के नोट हैं लेकिन यूरिया इन पैसों से नहीं मिल रहा। मुझे उन लोगों में पीछे खड़ा हुआ एक 22-23 साल का एक लड़का दिखा जो उस भीड़ से अलग ही लग रहा था। Leather jacket, चश्मा लगाया हुआ था। उसने जाकर किसी को फ़ोन मिलाया, मैं उसे नोट कर रही थी। हमारी कोशिश किसानों की तकलीफ दिखाने की थी। किसी तरह का स्टिंग हम लोगों ने कभी नहीं किया। अचानक उस मंडी का कोई पल्लेदार आया और रवीश के ऊपर चिल्लाने लगा कि आप किसलिए 500 के नोट दिखा रहे हैं, हमने तो दिए नहीं, आप खुद दे रहे हैं। बिना किसी वजह के इस तरह का हमला औचक था। शायद मंडी के कथित ठेकेदारों को अपनी पोल खुलने का डर था। रवीश को और कैमरामैन को घेरने की कोशिश की, लेकिन वो और टीम के लोग गेट से पैदल बाहर निकल गए, पल्लेदार ने अपने लोगों के साथ मिलकर गेट बंद कर दिया और हमारी गाड़ी अंदर ही रह गयी। मैं पहले ही थोड़ा अलग हो गयी थी और एक छोटे गेट से निकल आई। हम कुछ मीटर पैदल चले जब तक गाड़ी बाहर नहीं निकली। कई बाइक सवार सड़क पर आ गए। हम गाड़ी में बैठे और वो लड़का जो मंडी में दिखा था, वो अपने साथी के साथ बाइक पर लगातार पीछा कर रहा था। हमने पुलिस को बुलाया। मैं बाइक का नंबर नोट कर चुकी थी और पुलिस को दे दिया। पुलिस ने हमारी मदद की और बहुत जल्दी मदद के लिए पहुंची। उसके बाद भी जब हम दिल्ली की तरफ निकले तो एक और वीआईपी स्टीकर वाली गाड़ी ने काफी दूर तक पीछा किया। लग रहा था मानो हम किसी निगरानी में हैं।

मैं फैसला नहीं कर पा रही हूँ कि ग्राउंड रिपोर्टिंग करनी चाहिये या नहीं। आज भीड़ की आड़ में कुछ भी किया जा सकता था। मौका ढूँढा जा रहा है कि किसी तरह उस आवाज़ को ख़त्म कर दें जो आपको गवारा नहीं। कभी पत्रकारों के साथ वकील के भेस में गुंडे कोर्ट परिसर में मार-पीट करते हैं, कभी बैन लगाने की कोशिश होती है, कभी किसी ट्विटर पर ट्रेंड करा गिराना चाहते हैं तो कभी देशद्रोही का सर्टिफिकेट बांटने में देरी नहीं लगाते। ये किसी एक के साथ नहीं हो रहा। और ऐसा चाहने वालीे जनता नहीं है। क्योंकि रवीश कुमार ने खोड़ा पर रवीश की रिपोर्ट पहले भी की है, दिल्ली के कई इलाकों में कांग्रेस सरकार के दौरान रिपोर्ट की है, तब भी तो यही जनता थी। हां, राजनीतिक दलों के आईटी सेल नहीं बने थे तब। आज हैं और बड़े आराम से सोशल मीडिया का अपने लिए इस्तेमाल कर रहे हैं। योजनाएं तो इस देश में पहले भी बनीं और विपक्ष में रहते हुए आज की सरकार ने खूब सवाल किये।

अगर आज किसी योजना के लागू होने में दिक्कतें आ रही हैं और लगातार कई दिन से आ रही हैं तो क्या किया जाना चाहिये,एक कीर्तन मंडली बैठा देनी चाहिए चैनल पर जो भजन गाती रहे। काफी ‘कंस्ट्रक्टिव’ होगा देश के लिए। सिस्टम की हालत तो पहले भी यही थी, लेकिन क्या सरकार को इसलिए बदला गया था कि सिस्टम को ज्यों का त्यों रखे?होना तो यही चाहिए कि एक सरकार मीडिया रिपोर्ट का संज्ञान लेकर सुधार करे लेकिन कुछ सरकारें ऐसी भी होती हैं जो सारे संसाधन ऐसी रिपोर्ट को बंद करवाने में खपा देती हैं। खैर, तुहमतें चन्द अपने ज़िम्मे धर चले..जिस लिए आये थे हम, सो कर चले।

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