सोनिया-राहुल गांधी के राजतंत्रात्मक व्यवहार को छुपाने के लिए मीडिया ने नरेंद्र मोदी व अमित शाह की कठोर छवि गढ़ी, जबकि वो ऐसे बिल्कुल भी नहीं हैं!

Posted On: June 17, 2016

भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की सार्वजनिक छवि अलग है-धीर, गंभीर और तानाशाह जैसा कठोर! मीडिया ने उनकी छवि कुछ इसी प्रकार की बना रखी है! अभी ‘इंडिया टुडे’ ने उन पर कवर स्टोरी छापी है। कवर में उनकी ऐसी तस्वीर प्रदर्शित की गई, जिसमें वो बेहद कठोर और थोड़े-बहुत अहंकार में डूबे दिख रहे हैं! कमोबेश अमित शाह की यह छवि गुजरात में उनके गृृहमंत्री रहने के बाद से ही मीडिया ने लगातार बना रखी है!

मैं खुद मीडिया से हूं, इसलिए मीडिया द्वारा किसी की बनाई छवि कभी मुझे सही प्रतीत नहीं होती है। नरेंद्र मोदी जी की छवि भी प्रधानमंत्री बनने से पूर्व एक तानाशाह के रूप में गढ़ने की कोशिश मीडिया ने की थी, और यह सब एक Agenda के तहत किया गया है! गांधी परिवार को संवेदनशील और भाजपा नेताओं को अहंकांरी-तानाशाह दिखाने की यह होड़ Agenda journalism का हिस्सा है! अमित शाह चाहे मीडिया को कितनी ही बार साक्षात्कार दे दें और सोनिया गांधी ने आज तक भले ही एक भी साक्षात्कार न दिया हो, तो भी मीडिया सोनिया गांधी को देशी संवेदनशील बहु और अमित शाह को कठोर तानाशाह के रूप में ही पेश करती आई है! यह मीडिया का वह एजेंडा है, जो अपने खास राजनेताओं को जनता के बीच अच्छा बताने के लिए दूसरे पक्ष को बुरा बताने का खेल-खेलती रही है!

आपने कभी यह देखा है कि मीडिया ने गांधी परिवार की छवि एक कठोर और तानाशाह के रूप में प्रदर्शित की हो? सोनिया गांधी की ममतामयी छवि, प्रियंका की फैशनेबल छवि और राहुल गांधी को जननेता की छवि देने की मीडिया की कोशिश शुरू से ही चल रही है, और वह आज भी जारी है! पंडित नेहरू, इंदिर गांधी, राजीव गांधी, किसी की छवि उस रूप में प्रदर्शित नहीं की गई, जिस रूप में नरेंद्र मोदी और अमित शाह की की गई! कभी आपने अपने आप से पूछा कि ऐसा क्यों? जबकि पंडित नेहरू ने सबसे पहले अखबारों को सेंसर किया था! इंदिरा गांधी ने तो पूरे देश पर आपातकाल थोपा था! और राजीव गांधी के समय पूरे देश में सर्वाधिक दंगे हुए थे! अखबारों में नौकरी के दौरान मैं खुद इन चीजों को नजदीक से देख और अपने ब्यूरो चीफ, संपादक के दबाव में ऐसा कर भी चुका हूं! इसलिए मैं इनकी पूरी असलियत को अपने अनुभव के कारण जानता-समझता हूं! आम जनता तो भोली है। वह वही देखती और सुनती है, जो मीडिया उसे दिखाना और सुनाना चाहती है!

मैं अपने मित्र विकास प्रीतम जी के सहयोग से जब अपने प्रकाशक और मित्र प्रवीण तिवारी जी के साथ भाजपा अध्यक्ष अमित शाह जी से मिला तो मुझे महसूस हुआ कि मीडिया की बनाई छवि और वास्तविक अमित शाह के बीच बहुत बड़ा अंतर है। हम करीब 30 से 35 मिनट अमित शाह जी के साथ रहे और ढेर सारी बातें भी की, लेकिन जो बात नोट करने वाली थी, वह उनकी पढ़ने की प्रवृत्ति, उनकी विषयों के प्रति संवेदनशीलता और हर घटना के प्रति सजगता थी!

मैं अपनी पुस्तक भेंट करने के सिलसिले में कई नेताओं से मिला हूं। नेता आपके पुस्तक की कवर देखते हैं, कुछ पेज उलट-पुलट कर देखते हैं और आप उनके साथ तस्वीर खिंचवा लेते हैं, बस हो जाती है इतिश्री! अमित शाह ऐसे बिल्कुल नहीं है। उन्होंने सबसे पहले मेरी पहली पुस्तक ‘निशाने पर नरेंद्र मोदीः साजिश की कहानी-तथ्यों की जुबानी’ अपने हाथ में ली और उसे खोलकर देखा। वह उसे पढ़ने लगे और पढ़ते गए। काफी देर तक उसे पढ़ते रहे और फिर पूछा, कब लिखी? इस पुस्तक की कितनी प्रति जनता के बीच गई? कैसे जनता तक पहुंचाया? वह बात करने के दौरान भी पुस्तक में ही सिर गड़ाए रहे और उस पुस्तक को अपने पास ही रखा कि इसे बाद में पूरा पढेंगे।

फिर मेरी दूसरी पुस्तक ‘स्वामी रामदेवः एक योगी-एक योद्धा’ को लिया और उसमें बाबा रामदेव के बचपन के हिस्से को निकाल कर पढ़ने लगे। काफी देर बात मुझसे पूछा, तो बाबा रामदेव व आचार्य बालकृष्ण बचपन से ही मित्र हैं? फिर उन्होंने मुझसे उन दोनों की मित्रता की कहानी सुनी। मेरी तीसरी पुस्तक ‘आशुतोष महाराजः महायोगी का महारहस्य’ को भी देखा और बीच से पढ़ने लगे। उन्होंने आशुतोष महाराजा जी के बारे में ज्यादा से ज्यादा जानना चाहा और जब प्रवीण जी ने यह बताया कि इसे उज्जैन कुंभ में लोगों ने इस पुस्तक को हाथों-हाथ लिया था तो कुंभ में उसकी पूरी मार्केटिंग प्रक्रिया के बारे में जानने की उत्सुकता उनमें दिखी!

फिर ब्लूम्सबेरी द्वारा नरेंद्र मोदी, हिलेरी क्लिंगटन जैसे राजनेताओं पर प्रकाशित पुस्तकों को उन्होंने देखा और यह पूछा कि इन पुस्तकों की कीमत किस आधार पर तय होती है, यह पूरी दुनिया में पहुंचती कैसी है? हर भाषाओं में प्रकाशन का आधार क्या होता है? पूरी दुनिया में इसकी मार्केटिंग किस प्रकार से होती है आदि? अंत में उन्हें जब प्रवीण तिवारी जी ने ब्लूम्स की पुस्तक ‘आखिरी मुगल’ दी तो वह उसे पढ़ने में जैसे खो से गए! बोले- यह मुगल बहादुर शाह जफर पर है न? हम तब तक खड़े हो चुके थे। खड़े-खड़े ही करीब 10 मिनट तक वह ‘आखिरी मुगल’ को पढ़ते रहे। अंत में उन्होंने अपने सहयोगी से कहा, यह सारी पुस्तक ठीक से मेरी गाड़ी में रखवाना!

पुस्तकों के अलावा हमने उनसे काफी देर तक हल्की-फुल्की बातें की। चूंकि मैं न तो किसी के लिए पत्रकारिता करता हूं और न ही उनका कोई साक्षात्कार लेने गया था तो हमारी बातचीत का विषय इतना सामान्य था कि जैसे हमारे-आपके बीच की बातचीत! हंसते, मुस्कुराते हुए उनकी बातचीत के ढंग से वह एक संवेदनशील इनसान के रूप में नजर आए, जो न जाने कितनी ही बार सभी पत्रकारों ने नोट भी किया हो, लेकिन वह आम जनता को ‘इस अमित शाह’ से मिलाना कभी नहीं चाहते! दलितों को लेकर अमित शाह जो कर रहे हैं, वह आप चुनावी राजनीति कह सकते हैं, लेकिन यह आरएसएस का संस्कार है, जिसमें राजनीति से अधिक सदभावना पर जोड़ है! बिना सर्वण-दलित एक किए आप मजबूत हिंदू समाज की कल्पना भी नहीं कर सकते, यही आरएसएस ने अन्य स्वयंसेवकों की तरह स्वयंसेवक अमित शाह को भी सिखाया है!

मैं नरेंद्र मोदी जी से भी मिल चुका हूं और शर्त के साथ कह सकता हूं कि आप किसी भी बड़े राजनेता से मिलकर इतने सहज नहीं रह सकते, जितने कि नरेंद्र मोदी जी के साथ रहते हैं! वह अपने-से लगते हैं। मुझे याद आ गया जब चुनाव से पूर्व नरेद्र मोदी जी से मैं मिलने गया था तो किस तरह से उन्होंने मुझे सभी के सामने गले लगा लिया था! आप उम्मीद कर सकते हैं कि सोनिया गांधी आपसे मुस्कुराते हुए बात करें और राहुल गांधी बिना फोटो अपर्चुनिटी के आपसे गले मिलें! गांधी परिवार तो गरीब जनता के साथ बैठकर मिनरल वाटर पीने वालों में शामिल रहे हैं!

वास्तव में पत्रकारिता की एक पूरी पीढ़ी गांधी परिवार को राजा और खुद को उनकी प्रजा मानकर जीती रही है, इसलिए उसे अन्य राजनेताओं की संवेदनशीलता नजर ही नहीं आती है! अमित शाह और प्रधानमंत्री नरेद्र मोदी बिल्कुल भी वैसे नहीं हैं, जैसा कि मीडिया ने पिछले 15 साल से इन दोनों के बारे में प्रचारित कर रखा है!

और हां, मैं कोई पत्रकार नहीं हूं कि मेरे समक्ष उन्हें राहुल गांधी की तरह नाटक कर दूसरा वर्ताव करना पड़ा हो ताकि मैं वहां से निकल कर इसे छापूं! मैं एक सामान्य इनसान हूं और सामान्य इनसान से ऐसे बड़े नेता जब इतने सहृदयता से मिल रहे हों तो समझिए कि राजनीति बदल रही है! शुतुर्मुर्ग पत्रकार बिरादरी इस बदल रही राजनीति को न समझने पर आमदा है, क्योंकि फिर इससे गांधी-नेहरू राजतंत्र के ढहने का खतरा है, जो पिछले 60 साल से जनता को हांकने में यकीन करती हुई सत्तासीन रही है!

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