जेटली को साधने के लिए सुब्रमण्यम स्वामी के कंधे पर मोदी की बंदूक !

Posted On: June 23, 2016

अनुजअग्रवाल (संपादक, डायलॉग इंडिया)

रघुराम राजन के बाद सरकार के आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमणियम पर जिस प्रकार सुब्रमणियन स्वामी ने वार किया है वह आकस्मिक या व्यक्तिगत नहीं है। मोदी 26 जून को मंत्रिमंडल विस्तार करने जा रहे हें। सरकार बनाने के बाद पहली बार। अपने प्रधानमंत्री बनने के समय मोदी किसी हद तक अरुण जेटली पर निर्भर थे और जेटली कहीं न कहीं मुक्त बाजार समर्थक लॉबी का हिस्सा जिसका मतलब फॉर्च्यून फाइव हंड्रेड कम्पनियों के दर्शन से सहमति और उनके हितो को ध्यान में रखते हुए नीतियों के निर्माण के समर्थक।

जेटली पश्चमी देशो के मॉडल के अनुरूप मोदी को ऐसे लोकप्रिय जननेता के रूप में ढालना चाहते हें जो अंदर से फार्च्यून फाइव हंड्रेड कंपनियो के सीइओ के रूप में काम करता रहे और बाहर से जनप्रिय बना रहे। वो मानते हें कि पिछली यूपीए सरकार की नीतियां ठीक थी पर नीयत ख़राब थी और मोदी सरकार को मात्र नीयत ठीक रखने की जरुरत है नीतियां नहीं। जेटली गुट मोदी के सरकार बनाने से लेकर आज तक सरकार पर हावी रहा है। जेटली अपना वर्चस्व बनाये रखने हेतू और अपनी लॉबी के हितो की रक्षा हेतू मोदी सरकार पर दबाब बनाये रखे हें। माना जाता है कि बिहार में नितीश की सरकार बनाने और दिल्ली में केजरीवाल की सरकार बनाने में जेटली केम्प की परोक्ष रूप से बड़ी भूमिका है वही पंजाब में आम आदमी पार्टी की बढत के पीछे भी जेटली कैम्प ही है।

दबाब की राजनीति के तहत जेटली ने सूचना प्रसारण मंत्रालय पर पकड़ ढीली की हुई है और वित्त मंत्रालय की निर्णय प्रक्रिया को भी उलझा रखा है। वित्त, दूर संचार व अन्य मंत्रालयों में उनकी लॉबी के मंत्री-अफसरों का कब्ज़ा है और वे योजनाओ की मंजूरी और किर्यान्वयन, फंड के आबंटन आदि में जानबूझकर देरी करते रहे हें। इसी कारण अर्थव्यवस्था पटरी पर नहीं आ पा रही और न ही महंगाई नियंत्रण में। जेटली अब अन्तर्राष्ट्रीय लॉबी के इशारे पर रघुराम राजन के स्थान पर अरविन्द सुब्रमण्यम को रिजर्व बैंक का गवर्नर बनाना चाहते हें ताकि भारत की मौद्रिक एवं वित्तीय नीतियों पर उनकी पकड़ बनी रहे और उनके हित सुरक्षित रहें।

मोदी अब इस जाल और खेल को समझ चुके हें और इससे बाहर आना चाहते हें , साथ ही जेटली और उनकी लॉबी की मुश्कें कसना चाहते हें या फिर उनसे निजात पाना चाहते हें। इसी कारण पहले डीजीसीए विवाद के बहाने जेटली- केजरीवाल में झगड़ा कराया गया और फिर जेटली के दुश्मन सुब्रमणियम स्वामी को राज्यसभा भेजा गया। स्वामी के माध्यम से गांधी परिवार, रघुराम राजन और जेटली केम्प के मंत्रियो व अफसरों को घेरा जा रहा है जो वास्तव में पिछली कोंग्रेस सरकार की नीतियों के अनुरूप ही अर्थव्यवस्था को चला रहे हें न की देश के हितों के अनुरूप। इस पलटवार से घबराये और मंत्री पद छिनने के डर से जेटली केम्प ने हड़बड़ाहट में काफी समय से लंबित ऍफ़डीआई, स्पेक्ट्रम नीलामी, टेक्सटाइल पालिसी आदि की घोषणा कर दी है और जीएसटी पर जरुरी बहुमत जुटाने का दावा किया है। जरुरी नहीं के इन सब निर्णयों से मोदी कैंप पूर्णतः सहमत हो। इन कारण इनमें बड़े बदलाब की पूरी संभावनाएं हें।

जेटली कैम्प को लगता है के एक बार फिर वह मोदी केम्प की आँखों में धूल झोंकने में कामयाब हो जायेगा और अपना एजेंडा लागू रखेगा। इस बात का परीक्षण 26 जून के मंत्रिमण्डल विस्तार में हो जायेगा। गहराई से देखें तो लगता है अगले 3 से 4 महीनो में जेटली केम्प के लोगो की सरकार से सफाई तय है अगर मोदी ऐसा नहीं कर पाये तो उनके और देश के बुरे दिन तय हें।

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