आतंकवाद नामक ज़ख्म के लिए दवा की नहीं, सर्जरी की आवश्यकता है ! मानें या ना मानें

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Posted On: July 6, 2016

पिछले एक महीने में जो हुआ वह सबने देखा ! इस्लाम के नाम आतंकवाद का नंगा नाँच दुनिया भर में चर्चा का विषय रहा, इस्ताम्बूल से लेकर बग़दाद तक और ढाका से लेकर फ्रांस तक मानवता लहूलुहान हुई. समाचार पत्रों से न्यूज़ चैनल तक और सोशल मीडिया से लेकर ब्लॉग तक सबने पन्ने काले किये ,सांत्वनाएं दी गयी विरोध भी प्रचण्ड हुए,लेकिन कब तक? कुछ दिन में सब शांत हो जायेगा! दुनिया भूल जाएगी और फिर से सब कुछ पहले जैसा. आखिर क्यों? और कब तक ?

आतंकवाद से समूचा विश्व जूझता आया है! लेकिन पिछले एक महीने में आतंकवाद ने जिन पराकाष्ठाओं को पार कर दहशत का माहौल बनाया है वह सचमुच समूचे मानव जाति के लिए खतरे की घंटी है! केवल ब्लॉगों पर लिखने से और समाचार पत्रों के पन्ने काले करने से काम नहीं चलने वाला समय आ गया है जब आतंकवाद के लिए किसी ठोस क़ानून को समूचे विश्व में लागू किया जाना चाहिए ! कहीं ऐसा न हो की ये पूरे संसार को अपनी जद में ले ले और हम हर पहर इस डर में जीते रहे कि अगला पल हमारा आखिरी होगा!

विकसित देशों ने आतंकवाद की जो कहानी लिखनी शुरू की वह अब अपनी चरम सीमा पर है ! उनकी बोई फसल अब पूरी दुनिया काट रही है! अपने निजी स्वार्थ और लोलुपता के लिए खड़ा किया साम्राज्य आज उनकी सीमाओं में प्रवेश कर चुका है! आश्चर्य की बात यह है की अभी तक उनकी तन्द्रा नहीं टूटी और न टूटती दिख रही है विकसित देश कुम्भकरणीय नींद से जागने के लिए किस धमाके का इंतज़ार कर रहे हैं पता नहीं? उनके अपने द्वारा लगाई गई विष बेल उनको आकंठ अपने आगोश में ले चुकी है ! उन्हें जकड़न महसूस तो रही है पर विरोध नहीं कर पा रहे क्योंकि इस आतंकववाद रूपी जहाज के कप्तान यही विकसित राष्ट्र है! आतंकवाद का दंश को भारत सदियों से झेल रहा है, कभी कश्मीर के नाम पर कभी बांग्लादेश के नामऔर कभी पंजाब ने नाम पर ! भारत इसका दर्द समझता है तथा आतंकवाद को सदैव विश्व मंच पर रखता आया है कि आतंकवाद वैश्विक समस्या बन चुकी है!

आतंकवाद का समाधान मिल कर ढूंढना होगा ! यह समस्या अब सुरसा के मुंह समान बड़ी हो चुकी है और इसका समाधान भी बड़े मंच पर ही हो सकता है! इसके लिए शांतिप्रिय समाज को आगे आना ही पड़ेगा इससे पहले की देर हो जाये और आतंकवाद रुपी जख्म के लिए दवा नहीं सर्जरी की आवश्यकता पड़े इस मर्ज का समाधान ढूंढना ही पड़ेगा !

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