क्या मीडिया को इसलिए आजादी चाहिए कि वह इंडियन एक्सप्रेस की तरह हथियार दलालों के पक्ष में रिपोर्टिंग करे और एनडीटीवी की तरह भारतीय सेना की सुरक्षा से जुड़ी सूचनाओं को लीक करे!

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विकास प्रीतम। 4 अप्रैल 2012 को इंडियन एक्सप्रेस अखबार के पहले पन्ने पर बड़े-बड़े अक्षरों में शेखर गुप्ता की एक स्टोरी छपती है कि 16 जनवरी 2012 को भारतीय सेना ने बिना इजाजत दिल्ली की तरफ कूच किया था। इस खबर का लब्बोलुआब यह था कि भारत की सेना दिल्ली में लोकतान्त्रिक सरकार का तख्तापलट करने के इरादे से दिल्ली आ रही थी। यह खबर छपते ही देश भर में तहलका मच गया था। जनरल वी.के. सिंह उस समय थल सेना अध्यक्ष थे।

हालांकि यह खबर छपने के कुछ घंटों के भीतर ही बोगस, निराधार और षड्यंत्रों का पुलिंदा साबित हो गई। तत्कालीन रक्षा मंत्री श्री ए.के. एंटनी ने स्वयं इसका खंडन किया । बाद में एक और अंगरेजी अखबार सन्डे गार्जियन ने इस खबर के पीछे की खबर का जो खुलासा किया वो चौंकाने वाला था। जिसके अनुसार इस पूरे घटनाक्रम में यूपीए सरकार के एक वरिष्ठ मंत्री का हाथ था जिसका एक करीबी रिश्तेदार रक्षा सौदों की दलाली का काम करता था लेकिन जनरल वी.के. सिंह की पारदर्शी और ईमानदार कार्यशैली से उनके काम में अड़चनें आ रही थीं जिस कारण हथियार दलालों की लॉबी ने उक्त मंत्री के साथ मिलकर जनरल वी.के. सिंह को पद से हटाने, उन्हें बदनाम करने के लिए तख्तापलट की खबर रचने का षड्यंत्र किया और जिसके लिए मोहरा भी वह समाचार पत्र बना जिसकी निष्पक्षता और निर्भीकता की खबर जगत में कसमें खाई जाती हैं।

दरअसल ये उस कहानी और पटकथा का एक छोटा सा हिस्सा है जहाँ हमारे देश में लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ के दम्भ और पवित्रता का पर्दाफाश होता है। अपने निहित स्वार्थों के लिए पत्रकारिता इन दिनों राष्ट्र और उसकी अहम् संस्थाओं की सुरक्षा और इकबाल को भी दांव पर लगा देती हैं। कल रात हिन्दी न्यूज चैनल के एक एंकर ने उसके चैनल को सरकार द्वारा एक दिन के लिए ऑफ एयर करने के आदेश के विरोध स्वरुप पौन घंटे की खूब मसखरी की। जिन दो मेहमानों को उन्होंने इस घटना पर बोलने के बुलाया था उनकी बोलती पहले से ही बंद थी और केवल एंकर ही अपनी बात, निष्कर्ष, इलज़ाम और निर्णय सुनाता रहा। उस एंकर ने रोने के अतिरिक्त अभिनय के सभी भावों का अतिरेक प्रदर्शन किया लेकिन मुद्दे की बात नहीं की।

याद कीजिये 2 जनवरी 2016 की सुबह। पठानकोट एयर बेस पर जैश-ए-मुहम्मद के आतंकी हमला करते हैं। जवाब कारवाई के लिए चले सेना के ऑपरेशन में हमारे 7 जवान शहीद हो जाते हैं और वहां मौजूद सारे आतंकी भी मार दिए जाते हैं। 5 दिन तक चले इस ऑपरेशन की पल पल की खबर 24 घंटे चलने वाले न्यूज चैनलों के माध्यम से देश के लोगों तक पहुँचती है और खबरों के इसी खेल में कुछ चैनल और उनके कारिंदे ऐसी रिपोर्टिंग को अंजाम देते हैं जिससे उस ऑपरेशन और देश के सामरिक ठिकानों को सुरक्षा को गंभीर खतरा पैदा हो सकता था।

पठानकोट हमले में सेना का ऑपरेशन कवर करे रहे एक न्यूज चैनल के रिपोर्टर ने कैमरे पर लाइव होकर कहा कि “जहाँ आतंकी छुपे हुए हैं उसके बिलकुल नजदीक हथियारों का डिपो भी है जहाँ भारी मात्र में मोर्टार और रॉकेट लॉन्चर रखे हैं, अगर ये आतंकियों के हाथ लग जाते हैं तो भयंकर तबाही मचा सकते हैं इसलिए सेना आशंकित है और कड़ी कारवाई करने से परहेज कर रही है।” अंदाजा लगाइए कि इस रिपोर्टिंग का दूर सीमा पार बैठे आतंकियों के आकाओं के लिए क्या मायने हैं? सोचिये अगर सेटेलाइट फ़ोन से लैस आतंकियों के पास यह सूचना पहुंचा दी जाती तो तबाही का क्या मंजर होता?

उस चैनल की इसी निहायत लापरवाही से भरी और देश के रक्षा प्रतिष्ठान को खतरे में डालने वाली रिपोर्टिंग की वजह से सरकार को निर्धारित नियमों के अंतर्गत 24 घंटे के लिए ऑफ एयर करने का फैसला लेना पड़ा जो महज एक सांकेतिक कार्रवाई भर है ताकि इस विषयक बनाये गए नियमों का सख्ती से पालन हो सके, ताकि न्यूज चैनल देश की रक्षा और सेना से जुडी खबरों को प्रसारित करने में संयम बरतें । ताकि एक नजीर बने, एक लक्ष्मण रेखा बने। लेकिन इस कार्रवाई से जिन लोगों को अघोषित आपातकाल या उसकी आहट सुनाई दे रही है उनके लिए ईश्वर से प्रार्थना है कि उन्हें आपातकाल की वास्तविकता को खुली आँखों और दिमाग से देखने तथा समझने की सद्बुद्धि प्रदान करे । बहरहाल इतना तय है कि यह देश क़ानून के राज से ही चलेगा स्टूडियो की सतही भावुकता से कतई नहीं।

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Vikash Preetam
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