हम दिखने में तो आधुनिक हैं, लेकिन हमारी सोच मध्ययुगीन!

Posted On: July 15, 2016
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हाल ही मेें अखबार में एक खबर पढ़ी. द्वारका सेक्टर-एक के रिहायशी इलाके में दिनदहाड़े एक बुजुर्ग को एक व्यक्ति ने पीट-पीट कर मार डाला. उन बुजुर्ग की गलती यह थी कि उनकी स्कूटी हल्के से एक गाड़ी से टकरा गई. गाड़ी वाले ने उम्र का लिहाज किए बिना उन बुजुर्ग को पीटना शुरू कर दिया, जिससे उनकी मृृत्यु हो गई।

यह खबर पढ़ कर मैं बेहद बेचैन हो गया. मैंने अपने पापा से कहा कि मुझे द्वारका की वह सोसायटी दिखाने ले चलिए, जहां इनसान नहीं, मुर्दे बसते हैं! ऐसे मुर्दे जो एक बुजुर्ग को बचाने के लिए अपने घर तक से नहीं निकल सके! वहां केवल उस एक बुजुर्ग की हत्या नहीं हुई थी, बल्कि चमचमाती गाड़ियों और बड़े मकानों में रहने वाले वहां के हर तथाकथित आधुनिक दिखने वाले व्यक्ति के जमीर की भी हत्या हुई थी! एक भी व्यक्ति उस बजुर्ग को बचाने नहीं आया! आखिर हम किस समाज में जी रहे हैं? कहने को आधुनिक, लेकिन व्यवहार में बिल्कुल मध्ययुगीन! शर्म आती है कि हम ऐसे समाज को आधुनिक समाज कहते हैं.

उस सोसायटी में रहने वाले केशव अरोड़ा अंकल से मेरे पापा ने मुझे मिलवाया। उन्होंने बताया कि सरदार अवतार सिंह जिस समय अपनी स्कूटी से आईओसी पेट्रोल पंप के सामने स्थित द्वारका सेक्टर-एक की सोसाइटी से बाहर निकल रहे थे, उसी वक्त उनकी स्कूटी एक गाड़ी से हल्के से टकरा गयी. टक्कर लगते ही अपनी गलती का एहसास कर अवतार सिंह जी माफी मांगने लगे. मगर सरदार अवतार सिंह जी के दुर्भाग्य से वो लंबी-सी महंगी गाड़ी, पैसे के नशे में चूर एक ऐसा व्यक्ति चला रहा था, जिसके अंदर बड़े-छोटे, सम्मान-नैतिकता, इंसानियत आदि का एहसास शायद कब का मर चुका था? उसने गाड़ी से बाहर निकलते ही बिना कोई बात सुने सरदार अवतार सिंह के चेहरे पर कई मुक्के मारे, जिससे वह बेहोश होकर गिर पड़े.

मैंने सोसाइटी के चौकीदार से बातचीत की, जो उस घटना का गवाह था. चौकीदार ने शायद खुद को बचाने की गरज से कहा कि वह इस बारे में बच्चों से बात नहीं करना चाहता है! वह अपना बयान पहले ही पुलिस को दे चुका है! साथ ही मौजूद केशव अंकल ने बताया कि सुनने में तो यही आया है कि घटना के वक्त चौकीदार सहित काफी लोग वहां इकट्ठे हो गए थे, लेकिन किसी ने न तो बीच-बचाव किया और न ही उस दबंग को बुजुर्ग पर हाथ उठाने से रोका!

आधुनिकता की चकाचौंध का खोखलापन देखिए कि उस सोसायटी में हर व्यक्ति के पास अपनी गाड़ियां हैं-बड़ी गाड़ियां हैं, लेकिन कोई उस बुजुर्ग को अपनी गाड़ी में उठाकर अस्पताल नहीं ले गया! सभी तमाशबीन बने रहे! वहां से गुजर रहा एक रिक्शावाला घायल अवतार सिंह जी को पास के निजी क्लीनिक में ले गया, जहाँ से उन्हें पुलिस की पीसीआर बड़े हॉस्पिटल ले गयी। सरदार अवतार सिंह को उस दिन शाम करीब पांच बजे मृत घोषित कर दिया गया. देश की राजधानी और दुनिया के आधुनिकतम शहरो में शुमार दिल्ली की पुलिस और अस्पताल की संवेदनहीलता देखिए कि अवतार सिंह जी के परिवार वालों को उनकी मृत्यु की जानकारी, उनकी मौत के करीब चार घंटे बाद रात नौ बजे दी गई!

मैं जब उस सोसायटी से लौटा तो मन दुखी था। सोचता हूं मैं दिल्ली जैसे शहर में रहता ही क्यों हूं? जो कहने में तो आधुनिक है, लेकिन जहां किसी के हृदय में किसी तरह की संवेदना नहीं है! मेरी नजर में तो वह रिक्शावाला उन करोड़ों के मालिकों से अधिक आधुनिक है! उसके लिए इंसान की जान की कीमत है, लेकिन उंची अट्टालिकाओं में रहने वालों के लिए इंसान की जान की कोई कीमत नहीं, जब तक उनके घर से किसी की अर्थी न निकल जाए!

आधुनिकता बड़ी गाड़ी में चलने, बड़े मकान में रहने, सप्ताह के आखिर में माॅल से फैशनेबल कपड़े खरीदने, मल्टीप्लेक्स में सिनेमा देखने या फैशन के अंधानुकरण का नाम नहीं है, आधुनिकता तो उस सोच का नाम है, जिसमें मानव ही नहीं, पशु और प्रकृति सबके लिए समानता का भाव हो.

‘वसुधैव कुटुंबकम‘ और ‘सर्वे भवंतु सुखिनः’ का ज्ञान देने वाली हमारी सनातन परंपरा पूरी दुनिया को अपना कुटुंब मानती है और सभी के सुख में अपना सुख ढूंढ़ती है। दूसरी तरफ आज का तथाकथित चकाचौंध वाली भौतिकवादी, एकल परिवार आधारित उपभोग की परंपरा में जीने वाला समाज, कहने को तो आधुनिक है, लेकिन सच तो यह है कि यह मध्ययुगीन स्याह काल से भी अधिक काली है! आज हर ओर किसी न किसी अवतार सिंह जी की मौत इस तथाकथित आधुनिक समाज और आधुनिक लोगों की उपेक्षा के कारण हो रही है! इसके बावजूद कोई खुद को आधुनिक कहता है तो उसे अपने अंदर झांकना चाहिए, निश्चित रूप से वह पाएगा कि उसके फैशनेबल कपड़े के पीछे कितना बड़ा स्वार्थी इंसान छुपा है.

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