नाम को उड़ने दो,खुद जमीन पर रहो



Vipul Rege
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सुबह एक वीडियो पर निगाह ठहर गई और उससे एक विचार का पौधा उग आया। लोकप्रियता कैसी भी हो ‘आभासी’ होती है। वास्तविक लोकप्रियता भी ‘आभासी’ ही होती है। लोकप्रियता की जो उड़ान भरता है, वह आपका नाम होता है आप नहीं होते।

सचिन तेंदुलकर मुम्बई की एक व्यस्त सड़क पर जागरूकता अभियान के लिए निकलते हैं। कार के भीतर ही बैठे हुए वे टू व्हीलर्स चालकों को समझाइश देते हैं कि भैया हैलमेट पहनो। बड़ी विनम्रता से हाथ जोड़कर वे निवेदन कर रहे हैं। तभी एक युवक उनके पास से क्रॉस होता है। वे उससे भी हैलमेट पहनने के लिए कहते हैं। अब जो होता है, बहुत शॉकिंग है। युवक लहजे से हरियाणवी लगता है। वह कहता है ‘ ओ भाई ज़्यादा लेक्चर मत झाड़। काहे का मास्टर है तू। राज्यसभा में क्यों नहीं जाता। इस तरह की बातें बोलकर वह निकल जाता है। सचिन उसकी बात चुपचाप सुनते हैं और उसे हाथ हिलाकर विदा करते हैं।

यदि उस वक्त सचिन के चार प्रशंसक कार के आसपास मौजूद होते तो युवक निश्चित ही पीट दिया जाता। लेकिन सचिन खामोश रहे, उन्होंने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। क्रिकेट का भगवान एक उजड्ड से अपमानित हो गया। मुझे नहीं लगता सचिन को इससे ज़रा भी फर्क पड़ा होगा। वे उन लोगों में से हैं जिनका नाम उड़ान भरता है लेकिन वे जमीन पर ही रहते हैं। जिनकी जड़ें जमीन के भीतर गहरी पैबस्त हो, वे अपने नाम के साथ नहीं उड़ते।

ऐसे ही एक लेखक हैं रस्किन बॉन्ड। उनकी लेखनी की दुनिया मुरीद है। उनकी कहानियों पर फिल्में बनती हैं। ब्रिटिश मूल के रस्किन 84 के हो चुके हैं। वे देहरादून में रहते हैं। इतना लोकप्रिय व्यक्तित्व वास्तविकता में बहुत आम आदमी है। कसौनी की सड़कों पर पैदल चलता है। आज भी उनको लेखनी से होने वाली आमदनी के मनीआर्डर का इंतज़ार रहता है। वे चाहते तो बहुत पैसा बना लेते लेकिन वे भी ये तथ्य भलीभांति जानते हैं कि लोकप्रियता आभासी होती है। इसका आनंद लिया जाए न कि सिर पर ढोकर जीवन जिया जाए।

सोशल मीडिया की लोकप्रियता का मर्म भी यही है। यहां आप अपनी बात रखने आते हैं। विचारों को साझा करते हैं। कई अनुपम लेखक इस माध्यम के द्वारा देश दुनिया मे पढ़े जा रहे हैं। इनकी ख्याति भी कुछ कम नहीं है। अब देखने मे आ रहा है कि लोग यहां विचारों को आदान प्रदान करने के साथ यहां ‘रहने’ लगे हैं। उन्होंने अपने नाम को स्थूल रूप में पकड़ लिया है। यहां भी किले खड़े होने लगे हैं। देखा जाए तो फेसबुक को एक अदद ‘रस्किन बॉन्ड’ की आवश्यकता है।

 


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Vipul Rege
Vipul Rege
पत्रकार/ लेखक/ फिल्म समीक्षक पिछले पंद्रह साल से पत्रकारिता और लेखन के क्षेत्र में सक्रिय। दैनिक भास्कर, नईदुनिया, पत्रिका, स्वदेश में बतौर पत्रकार सेवाएं दी। सामाजिक सरोकार के अभियानों को अंजाम दिया। पर्यावरण और पानी के लिए रचनात्मक कार्य किए। सन 2007 से फिल्म समीक्षक के रूप में भी सेवाएं दी है। वर्तमान में पुस्तक लेखन, फिल्म समीक्षक और सोशल मीडिया लेखक के रूप में सक्रिय हैं।