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सनातन की भावनाएं आपके स्टैंड जितनी सस्ती नहीं हैं

उनका जब मन होता है तब वन सनातन धर्म पर हमला करते हैं, जब मन होता है तब खेलते हैं और जब मन होता है तब सनातन के प्रतीकों को ठोकर मार देते हैं। सनातन को गाली देना, उनका प्रिय शगल है। कहीं भी दो चार वामपंथी प्रगतिशील इकट्ठे होते हैं, वह सनातन के प्रतीकों को गाली देने लगते हैं। दो तीन दिन पहले फिर से सनातन को अपमानित करता हुआ एक वीडियो ऑनलाइन हुआ। यह वीडियो शेमारू के प्रोडक्शन में सुरलीन कौर ने सारी हदें पार करते हुए पोर्न को इस्कोन और कृष्ण जी से जोड़ दिया। हालांकि यह वीडियो कल सामने आया, पर यह शो वर्ष 2019 में हुआ था। और तब से वह कपिल शर्मा के शो के साथ ही कई और कार्य कर रही होंगी। वीडियो की पहली लाइन ही है कि –

बेशक हम सब इस्कॉन वाले हैं, लेकिन अंदर से हम सब हरामी पोर्न वाले हैं’।

यह एक पंक्ति है जिस पर इस्कॉन की तरफ से आपत्ति आई है। परन्तु उनकी आपत्ति इससे कहीं अधिक है, उनकी आपत्ति इस पर भी है  कि सनातन पर आखिर इतना वार क्यों होता है? आखिर क्यों इन दो कौड़ी के जोकरों ने सनातन को इतना सस्ता समझ लिया है कि कोई भी आए और आकर उस पर अश्लील टिप्पणी कर जाए।

काम और पोर्न के विषय में शून्य न जानने वाली अनपढ़ पीढ़ी आज कामसूत्र पर टिप्पणी करती है। इस पीढ़ी ने राम और कृष्ण और हमारे प्रतीकों को गाली देना अपना मज़हब बना लिया है।  यह इतनी फूहड़ और बदतमीज़ पीढ़ी है, कि क्या कहा जाए? इसे न अपनी परम्पराओं का ज्ञान है, न ही सनातन धर्म का ज्ञान है।  न जाने क्यों उसे हिन्दू  धर्म से चिढ है, न जाने क्यों संतों से उसे चिढ है, वह भगवे से चिढती है, वह सीता से चिढ़ती है, उसे आज़ादी चाहिए, मगर किससे आज़ादी चाहिए, यह नहीं पता। यह भ्रमित पीढ़ी आम बोलचाल में इतने अश्लील शब्द प्रयोग करती है कि उन्हें बोलने में शर्म आए।

फक ऑफ, शिट, बास्टर्ड जैसे शब्द उनकी जुबान पर चढ़े रहते हैं। और जब वह साधारण बोलचाल में मेट्रो आदि में खड़े होकर फक ऑफ कह सकते हैं और खुले आम चुम्बन और चुम्बन से भी आगे बढ़कर के कार्य मेट्रो में कर सकते हैं, तो वह भारतीय कामशास्त्र को समझ पाएंगे, इसकी कल्पना करना ही बेकार है।

यह इतनी भ्रमित पीढ़ी है कि इसे यह नहीं पता कि भारतीय दर्शन में काम को जितना पवित्र और आवश्यक माना गया है, उतना किसी और पंथ में नहीं। पसली से औरत बनाने वाले लोग रिलिजन इन्हें सबसे आधुनिक लगते हैं। जड़ों और इतिहास से कोसों दूर यह पीढ़ी यह समझती है कि हिन्दुओं पर कुछ भी कहकर यह लोग बच जाएंगे। यह परले दर्जे की बेशर्मी है। और हैरानी तो इस बात पर है कि श्रोताओं में से भी लोग उतना ही आनन्द उठाते हैं। जब वह पोर्न पर अपना ज्ञान बांच रही थी, अपनी तेजाबी वर्षा कर रही थी, तब श्रोताओं में से किसी ने यह नहीं कहा कि ऐसा नहीं करना चाहिए। यह गलत है। आखिर यह लोग हंस कैसे लेते हैं? क्या कॉमेडी का मतलब भी नहीं पता है इन्हें?

खैर अब सुरलीन पर इस्कोन ने एफआईआर दर्ज कराई है। वैसे तो हर कृष्ण भक्त को यह करना चाहिए, मगर संस्थागत हुआ तो यह ठीक ही है। जितने भी स्टैंडअप कॉमेडियन हैं वह बहुसंख्यक भावनाओं का मजाक उड़ाने में खुद की विजय क्यों समझते हैं? भारत में तो विमर्श और प्रतिविमर्श की लम्बी परम्परा रही है। राम भी कईयों के हैं और कृष्ण भी। शिव भी हैं और हनुमान भी। और हनुमान तो ऐसे हैं जैसे दोस्त! यह रिश्ता है। और इस रिश्ते को कोई तब तक नहीं समझ सकता जब तक वह स्वयं इस व्यवस्था का हिस्सा नहीं बनेगा।

अब समस्या यह होती है कि बोलने की आज़ादी के नाम पर यह जड़ों से कटी कूपमंडूक पीढ़ी केवल सनातन पर ही वार कर पाएगी, वह इस्लाम पर नहीं बोलेगी। उनकी भाषा में कहें तो उनकी फट कर हाथ में आ जाएगी! सही में,  और इन जैसों की फट कर हाथ में आ ही गयी थी, जब साल 2015 में ईसाई समुदाय से आल इंडिया बकचोद, कॉमेडी शो वाले तन्मय भट्ट को माफी मांगनी पड़ी थी। और कपिल शर्मा के शो में एक कॉमेडियन को बाबा राम रहीम के बारे में उलटा सीधा बोलने पर जेल तक जाना पड़ा था। इस्लाम के खिलाफ तो बोलने का गूदा किसी के पास नहीं है, कम से कम इनकी भाषा में कहें तो यह फट्टू हैं, और इनकी फटकर हाथ में आ जाएगी जब यह लोग इस्लाम के खिलाफ बोलेंगे। पेरिस में शार्ली हेब्दो को तो भूले नहीं होंगे न आप? और कमलेश तिवारी? वह तो यहीं का था, भारत का, आपके बगल का!

जो इन जैसों की जुबां कामशास्त्र पर चलने लगती है, वह कभी इस्लाम में मौजूद लौंडेबाजी पर नहीं चलती। भारतीय दर्शन तो समलैंगिक समुदाय को मान्यता देता है, मगर इनका पसली से औरत पैदा करने वाला रिलिजन या औरत को हलाला के माध्यम से दर्द की एक खाई में फेंकने वाला मज़हब समलैंगिकों के बारे में क्या कहता है, यह नहीं जानते होंगे! आईएसआईएस ने समलैंगिकों को सरे आम मार दिया था, यह भी उन्हें नहीं पता होगा।

मगर अपने ही खोल में लिपटे हुए यह चूजे और परजीवी चूजे कुछ नहीं बोलते हैं, इन सभी के खिलाफ, क्योंकि उन्हें पता है कि अगर उन्होंने इस्लाम या ईसाइयत के खिलाफ कुछ भी बोला तो उन्हें उसी तरफ फ्राई करके खा लिया जाएगा, जैसा मुर्गे को खा जाते हैं। हालांकि यह बात सही है कि अपनी जान सभी को प्यारी होती है, परन्तु सनातन में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अर्थ यह नहीं है कि आप हर समय समाज के सबसे वर्ग को निशाना बनाते रहें। जिस प्रकार एकतरफा सेक्युलरिज्म नहीं होता, एकतरफ़ा अभिव्यक्ति की आज़ादी नहीं होती और उसी तरह एकतरफा स्टैंडअप कॉमेडी नहीं होती। इस्कॉन इस बार अडिग है कि वह माफी स्वीकार नहीं करेगा, अंजाम तक पहुंचाएगा. मगर इसके साथ दिल में एक कसक है कि काश इस्कॉन जैसा संस्थान सनातन के ऋषि मुनियों के लिए भी होता क्योंकि उस वीडियो में केवल एक ही पंक्ति है जो इस्कॉन के खिलाफ है, बाकी तो पूरा वीडियो हिन्दू संतों के खिलाफ है.

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Sonali Misra

Sonali Misra

सोनाली मिश्रा स्वतंत्र अनुवादक एवं कहानीकार हैं। उनका एक कहानी संग्रह डेसडीमोना मरती नहीं काफी चर्चित रहा है। उन्होंने पूर्व राष्ट्रपति कलाम पर लिखी गयी पुस्तक द पीपल्स प्रेसिडेंट का हिंदी अनुवाद किया है। साथ ही साथ वे कविताओं के अनुवाद पर भी काम कर रही हैं। सोनाली मिश्रा विभिन्न वेबसाइट्स एवं समाचार पत्रों के लिए स्त्री विषयक समस्याओं पर भी विभिन्न लेख लिखती हैं। आपने आगरा विश्वविद्यालय से अंग्रेजी में परास्नातक किया है और इस समय इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय से कविता के अनुवाद पर शोध कर रही हैं। सोनाली की कहानियाँ दैनिक जागरण, जनसत्ता, कथादेश, परिकथा, निकट आदि पत्रपत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं।

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2 Comments

  1. Avatar Varun says:

    Surlen Kaur (kaun hai pata nai) apne Sikh dharam par koi joke maare ke dekhe fir pata chalega isko

  2. Avatar Shikha says:

    हिंदू युवापीढ़ी को पहले धर्मनिरपेक्षता का पाठ पढ़ाया जाता है… दसरे पायदान पर इन्हें हिंदू धर्म की बुराई दिखाकर एथिस्ट बनाया जाता है… तीसरी पायदान है हिंदू धर्म के प्रतीकों और देवताओं का अपमान.. और चौथा पायदान इस्लाम की गोद में बैठकर घर के अंदर ही सबकी हवस का खिलौना बनना…..
    इन सबके लिए उत्तरदायी हमारे समाज की पैसा और पावर प्राप्त करने की महत्वाकांक्षा है…. इसपर हमें सोचना है और सामूहिक रूप से मिलकर हिंदुत्व की और अपनी स्वतंत्रता की रक्षा करना है
    शिखा

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