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54 साल का सलमान पेप्सी पिलाता हुआ अच्छा नहीं लगता

अस्सी के दशक में दूरदर्शन पर जब विज्ञापन आते थे तो उनमे फ़िल्मी कलाकारों और क्रिकेटरों की हिस्सेदारी बहुत कम हुआ करती थी। सन 1983 में भारत ने क्रिकेट विश्वकप जीता और भारतीय क्रिकेटर भी विज्ञापन मॉडलों के रूप में दिखाई देने लगे।अब बॉलीवुड के साथ क्रिकेटर्स भी इस बाजार का हिस्सा बन गए थे। कपिल देव, संदीप पाटिल और सुनील गावस्कर शुरूआती दौर के मॉडल थे। सवाल ये उठता है कि विज्ञापन फिल्मों में काम करने वाले नियमित मॉडल्स को इनके मुकाबले कम ही काम मिलता है। विज्ञापन के बाज़ार में भारतीय क्रिकेटरों और अभिनेताओं ने छोटे कलाकारों को इस दौड़ से बाहर कर दिया है।

उज्ज्वला राऊत, कैंडिस पिंटो, दीपानिता शर्मा, सिद्धांत गुप्ता, लक्ष्मी मेनन, ज्योत्स्ना चक्रबर्ती, रोहित खंडेलवाल, प्रतीक जैन का आपने नाम तक नहीं सुना होगा। ये सारे नाम भारत की एडवरटाइज़िंग इंडस्ट्री के सुपर मॉडल्स के नाम हैं, जिनकी अधिकांश उपस्थिति फैशन शो के मंचों पर दिखाई देती है।

ये लोग विज्ञापनों में कम ही दिखाई देते हैं, जबकि विज्ञापनों पर इनका हक पहले बनता है। ये लोग क्रिकेटर या फिल्म स्टार नहीं है और इनके कमाने का जरिया केवल मॉडलिंग है। इनकी जगह पर भारत में सुपर मॉडल की भूमिका कौन निभाते हैं, उनके नामों पर गौर कीजिये। सलमान खान, अक्षय कुमार, विराट कोहली, महेंद्र सिंह धोनी, अमिताभ बच्चन, आलिया भट्ट अब सुपर मॉडल्स की श्रेणी में आने लगे हैं।

2019-20 में अक्षय कुमार विज्ञापनों से सबसे अधिक कमाई करने वाले सितारे बन गए। फिल्मों से इतर विज्ञापनों से उनकी कमाई सालाना 400 करोड़ पार कर जाती है। हर साल टीवी पर आने वाले विज्ञापनों के बाजार पर चालीस प्रतिशत से अधिक कब्ज़ा फिल्म स्टार्स का है। इक्कीस प्रतिशत हिस्से पर क्रिकेटर काबिज हैं।

सोचिये इनमे सुपर मॉडल्स कहाँ आते हैं। एक मॉडल बनना आसान काम नहीं होता। अपना व्यक्तित्व बनाना पड़ता है। तमाम तरह की ट्रेनिंग लेनी पड़ती है। मुंबई में संघर्ष करना पड़ता है, तब जाकर छोटी सी सफलता इनके हिस्से में आती है। विज्ञापन फिल्मों के लिए इन्हें कई साल चक्की पीसनी पड़ती है लेकिन फ़िल्मी सितारे और क्रिकेट खिलाडियों को घर बैठे करोड़ों की फीस के विज्ञापन आसानी से मिल जाते हैं।

अमिताभ बच्चन ने एक बार कहा था ‘अभिनेता सेल्समैन नहीं है।’ उनका कटाक्ष इस बात को लेकर था कि कलाकारों को खुद अपनी फिल्मों का प्रमोशन क्यों करना पड़ता है। जबकि देखा जाए तो विज्ञापन की दुनिया में सबसे अधिक सामान बेचते वे ही नज़र आते हैं। शाहरुख़ ख़ान हर डील का दस करोड़ चार्ज करते हैं, जबकि उनकी सुपरस्टार की छवि अब डाउन हो चुकी है।

 इनके पास नोकिया, वीडियोकॉन, बायजूस, पेप्सोडेंट, सोना-चांदी च्यवनप्राश जैसे ब्रांड हैं। करीना कपूर जैसी आउटडेटेड कलाकार एक विज्ञापन का लगभग तीन करोड़ रुपया पा रही हैं। अमिताभ बच्चन का रेट आठ करोड़ है। विराट कोहली के हिस्से में बड़े इक्कीस ब्रांड हैं। उनकी कमाई भी प्रतिवर्ष करोड़ो में होती है।

विज्ञापन का बाज़ार मशहूर लोगों की डिमांड करता है। इस कारण भारत के विज्ञापन बाज़ार पर फिल्म स्टार्स और क्रिकेटरों का कब्ज़ा हो गया। जो परंपरा पत्रिकाओं, रेडियो और अख़बारों से शुरू हुई थी, उसने अब बड़ा रूप धारण कर लिया है। इसका सबसे अधिक नुकसान उन युवाओं को हो रहा है, जो बाकायदा मॉडल बनने की तैयारी करके इस फील्ड में आते हैं।

बड़े ब्रांड के विज्ञापन उनके लिए एक सपना है और विराट कोहली के टेबल पर विज्ञापन अनुबंध उनके हस्ताक्षर की प्रतीक्षा करते हैं। विज्ञापनों के बाज़ार में विविधता नहीं रही। जो कलाकार अभी तेल बेच रहा था, वह दूसरे विज्ञापन में इंश्योरेंस पॉलिसी बेचता दिखाई देता है। फिल्मों से आउट होने या फ्लॉप होने के बावजूद विज्ञापन के बाजार में इनकी क़ीमत कम नहीं होती।

 सलमान खान, शाहरुख़ खान और आमिर खान की ब्रांड वैल्यू ख़त्म हो चुकी है लेकिन एड फिल्मों में ये तीनों अब भी दिखाई देते हैं। अमिताभ बच्चन अब केवल केबीसी की बनाई इमेज के सहारे इस बाज़ार में टिके हुए हैं। करीना कपूर की कई साल से कोई फिल्म नहीं आई लेकिन उनके पास विज्ञापनों की कोई कमी नहीं है। सचिन तेंदुलकर और धोनी के पास अब भी विज्ञापन हैं, जबकि क्रिकेट से ये दोनों अब आउट हो चुके हैं।

 दरअसल विज्ञापन के इस अरबों-खरबों के बाज़ार में ये नापने की कोई मशीन नहीं है, जिससे पता चल सके कि किस सितारे की लोकप्रियता घट गई है। ये बाजार अब विविधतापूर्ण नहीं रहा है। अपने प्रोडक्ट की गुणवत्ता बताने के बजाय एक चिकना-चुपड़ा चेहरा चाहिए, जिसे देख पब्लिक उनका माल खरीद ले। बाकी उज्ज्वला राउत को बड़े ब्रांड नहीं मिलने वाले, क्योंकि वे न सेलेब्रेटी हैं और न उनकी कोई फिल्म फ्लोर पर है।  हम विज्ञापनों में नए चेहरे देखना चाहते हैं।  हम ताज़गी चाहते हैं। 54 साल का सलमान पेप्सी पिलाता हुआ अच्छा नहीं लगता।  

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Vipul Rege

Vipul Rege

पत्रकार/ लेखक/ फिल्म समीक्षक पिछले पंद्रह साल से पत्रकारिता और लेखन के क्षेत्र में सक्रिय। दैनिक भास्कर, नईदुनिया, पत्रिका, स्वदेश में बतौर पत्रकार सेवाएं दी। सामाजिक सरोकार के अभियानों को अंजाम दिया। पर्यावरण और पानी के लिए रचनात्मक कार्य किए। सन 2007 से फिल्म समीक्षक के रूप में भी सेवाएं दी है। वर्तमान में पुस्तक लेखन, फिल्म समीक्षक और सोशल मीडिया लेखक के रूप में सक्रिय हैं।

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