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गुलामी के चाबुक और युद्ध के नश्तर सहे तब जाकर बना आज का समर्थ भारत!

1962 का साल भारत भूमि की देह पर बड़ी सी खरोंचे छोड़ गया था। पड़ोसी ने पीछे से वार किया। देश का तत्कालीन प्रधानमंत्री चीन की मक्कारी भांपने में नाकाम रहा। नाकामी ऐसी कि आखिरी वक्त तक देश की सक्षम वायुसेना को आगे बढ़ने का आदेश ही नहीं दिया। देश की सेना ने कभी आत्मसमर्पण नहीं किया लेकिन देश का प्रधान कर चुका था। नागरिक इस धोखे का उचित जवाब न दिए जाने के कारण नाराज़ थे। हज़ारों सुहागनों की चूड़ियां टूटी थी। इस युद्ध में भारतीय शौर्य की अनेक गाथाओं ने जन्म लिया। उनमे से एक कहानी पर हिन्दी सिनेमा की सबसे पहली ‘युद्ध फिल्म’ बनी। इस फिल्म का नाम था ‘हकीकत’ और निर्देशक थे चेतन आनंद।

फिल्म से जुड़ी कहानी जानने से पहले युवा पाठकों को उस लड़ाई के बारे में जानना जरुरी है, जिसमे भारतीय वीरों ने चीनियों को दिखाया था कि हम हिमालय का सिर कभी झुकने नहीं देंगे। 18 नवंबर 1962 को चीन ने लद्दाख की अठारह हज़ार फ़ीट की ऊंचाई पर स्थित रेजांग-ला पोस्ट पर घातक हमला किया था। हमारे 124 जवानों का मुकाबला करने के लिए चीन ने 1500 से अधिक सैनिक भेजे। उनके पास आधुनिक हथियार थे। ऑटोमेटिक मशीनगनों के अलावा चीन मोर्टार लेकर आया था। सरकार की मेहरबानी से हमारे सैनिकों के पास द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बेकार घोषित हो चुकी बंदूके थी। ये बंदूके एक बार में एक ही फायर कर सकती थी। इन बेकार बंदूकों से हमारे शेरों ने 1300 चीनी मार गिराए थे। 17 नवम्बर की रात तूफ़ान के बाद रेजांग-ला पोस्ट पर तैनात ‘कुमाऊं बटालियन’ का सम्पर्क मुख्यालय से टूट गया। मुख्यालय को लम्बे समय तक पता ही नहीं चल पाया कि रेजांग-ला पर हमला हुआ है।

18 हजार फुट ऊंची पोस्ट पर हुए युद्ध में वीरता के सामने चीनी सेना कांप उठी। पोस्ट पर सैनिकों का प्रतिनिधित्व कर रहे मेजर शैतान सिंह पूरी तरह से घिर गए थे। वे बटालियन का हौंसला बढ़ाते रहे जब तक कि एक गोली उनकी बाह में आकर न धंस गई। इसके बाद चीनी मशीनगन से निकली एक गोली उनके पैर को घायल कर गई। कुछ ही देर में वे शहीद हो गए। मेजर के शहीद होते ही बचे हुए सैनिकों ने दुगने जोश के साथ चीनियों को जवाब देना शुरू कर दिया। धीरे-धीरे हमारा एक-एक सैनिक शहीद होता गया लेकिन रणभूमि में न उन्होंने समर्पण किया और न पीठ दिखाई। बर्फ से ढ़के रण क्षेत्र में मेजर शैतान सिंह का मृत शरीर तीन महीने बाद पाया गया। अदम्य वीरता के लिए उन्हें मरणोपरांत परमवीर चक्र प्रदान किया गया।

रेजांगला युद्ध में शहीद हुए वीरों में मेजर शैतान सिंह जोधपुर के भाटी राजपूत थे। नर्सिंग सहायक धर्मपाल ¨सह दहिया (वीर चक्र) सोनीपत के जाट परिवार से थे। कंपनी का सफाई कर्मचारी पंजाब का था। शेष सभी जवान वीर अहीर थे व इनमें अधिकांश यहां के रेवाड़ी, महेंद्रगढ़ व सीमा से सटे अलवर के रहने वाले थे। सेना के इतिहास में इतने पदक एक साथ किसी बटालियन को आज तक नहीं मिले हैं। उस रात राजनीतिक नेतृत्व चाहता तो सैनिक बचाए जा सकते थे।हकीकत फिल्म में चेतन आनंद ने इस ओर इशारा भी दिया है। सही समय पर मदद न मिलने के कारण हमारे 114 सैनिक शहीद हो गए।

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चेतन आनंद युवा फिल्मकार थे। वे बहुत हुनरमंद थे और एक अच्छी फिल्म बनाना चाह रहे थे। चेतन के पास एक स्क्रिप्ट थी, जिस पर तीस हज़ार रुपयों में एक फिल्म बनाई जा सकती थी। हालांकि ये पैसा भी वे जुटा नहीं पा रहे थे। चेतन आनंद की पत्नी के जरिये चेतन पंजाब के तत्कालीन मुख्यमंत्री प्रताप सिंह कैरो के पास पहुंचे। उन्होंने अपनी परेशानी बताई और पैसों की मांग की। कैरो ने उनसे कहा कि 62 के युद्ध में बहुत से सैनिक शहीद हो गए हैं। उन पर फिल्म क्यों नहीं बनाते। चेतन ने कहा इस पर तो उम्मीद से ज्यादा पैसा लग सकता है। चेतन उनसे दूसरे दिन आने का बोलकर चले आए।

उन दिनों मेजर शैतान सिंह की शहादत की चारो ओर चर्चा थी। चेतन को आयडिया मिल गया था। दूसरे दिन वे कैरो से मिले और ये कहानी सुनाई। कैरो ने इसका बजट पूछा तो चेतन ने बताया दस लाख से कम में ये फिल्म नहीं बन सकती। चेतन को लग रहा था अब उनसे जाने को कह दिया जाएगा। लेकिन अगले ही पल कैरो ने अपने वित्त सचिव को बुलाकर चेतन को दस लाख का चेक सौंप दिया। ‘हकीकत’ बनने की कल्पना वाकई हकीकत बन चुकी थी। बहुत कम लोग जानते हैं कि देश में सबसे पहले भ्रष्टाचार के खिलाफ मशाल प्रताप सिंह कैरो ने ही जलाई थी। पंजाब को ‘भ्रष्टाचार मुक्त’ बनाने के लिए उन्होंने बड़ा अभियान चलाया था। बाद में एक व्यक्ति ने बदला लेने के लिए गोली मारकर उनकी जान ले ली थी।

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फिल्म बनकर 1964 में प्रदर्शित हुई। वे इसकी सफलता के प्रति आशंकित थे। उन्हें लगता था कि प्रेम-मोहब्बत पसंद करने वाले दर्शक सैनिकों की शहादत देखना पसंद नहीं करेंगे। फिल्म प्रदर्शित हुई और पहले शो के बाद जब दर्शक बाहर आए तो उनकी आँखें नम थी। महिलाएं पल्लू से भीगी आँखें पोंछ रही थी। ऐसा लग रहा था कि सन 62 के धोखे का जमा हुआ मवाद चेतन आनंद के चीरे ने फोड़ दिया हो। भारत की वेदना को ये फिल्म सतह पर ले आई थी। फिल्म कामयाब रही थी। चेतन आनंद की आशंकाएं निर्मूल सिद्ध हुई थी। फिल्म के गीतों ने इतिहास बना दिया। जब दर्शक इन गीतों को परदे पर देखते तो हँसते-रोते, आंसू छुपाने का प्रयास करते। फिल्म का सबसे ख्यात गीत ‘कर चले हम फ़िदा, जान-ओ-तन साथियों’ यू ट्यूब पर अब तक दस लाख से अधिक बार देखा जा चुका है। इसका एक अन्य गीत ‘होके मजबूर मुझे उसने भुलाया होगा’ भी बहुत देखा जाता है।

‘होके मजबूर मुझे उसने भुलाया होगा’ मास्टरपीस है ये गीत। फौजी अपने अपनों को याद कर रहे हैं। कल्पना कर रहे हैं कि उनकी लाश जब घर जाएगी तो पत्नी या प्रेमिका का क्या हाल होगा। किसी की चूड़ियां टूट कर फर्श पर बिखरी होगी, मांग सूनी हो जाएगी। किसी की फोटो मेज से हमेशा के लिए हटा ली जाएगी। ये गीत देखते समय दर्शक रो पड़ते थे। युद्ध के घाव ताज़ा थे। गुलामी की याद अब भी गई नहीं थी। आज़ाद होते ही पड़ोसी देश ने युद्ध थोप दिया था। नाकाम प्रधानमंत्री के होते ये घाव लम्बे समय तक टीस देते रहे।

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आज स्वतंत्रता दिवस पर कुमाऊं बटालियन को याद करने के साथ हम इस फिल्म को याद करें। याद करें चेतन आनंद के महान प्रयासों को। प्रताप सिंह कैरो की उदारता को याद करें। याद करें उन नागरिकों को जो गुलामी और युद्ध के चाबुक अपनी पीठ पर सह गए। अयोग्य प्रधानमंत्रियों को सह गए लेकिन आज का मजबूत भारत उसी घायल पीठ पर खड़ा कर दिया। जय हिन्द

URL: 72nd independence day-2018 remembering great sacrifices indian armed forces

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Vipul Rege

Vipul Rege

पत्रकार/ लेखक/ फिल्म समीक्षक पिछले पंद्रह साल से पत्रकारिता और लेखन के क्षेत्र में सक्रिय। दैनिक भास्कर, नईदुनिया, पत्रिका, स्वदेश में बतौर पत्रकार सेवाएं दी। सामाजिक सरोकार के अभियानों को अंजाम दिया। पर्यावरण और पानी के लिए रचनात्मक कार्य किए। सन 2007 से फिल्म समीक्षक के रूप में भी सेवाएं दी है। वर्तमान में पुस्तक लेखन, फिल्म समीक्षक और सोशल मीडिया लेखक के रूप में सक्रिय हैं।

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