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भारत सरकार के एक कमज़ोर मंत्री को आराम की सख़्त ज़रुरत है

इस बात की समीक्षा आवश्यक हो गई है कि ऐतिहासिक स्थानों पर शूटिंग की अनुमति दिए जाने पर उन स्थानों के साथ किस तरह खिलवाड़ किया जाता है। मध्यप्रदेश सरकार ने महेश्वर के महत्वपूर्ण प्राचीन स्थलों पर शूटिंग के लिए एक नया नियम जारी किया है। महेश्वर में किसी फिल्म/सीरियल/डाक्यूमेंट्री की शूटिंग के समय शासकीय कैमरा तैनात रहेगा।

सरकार की ओर से नियुक्त कैमरामैन शूटिंग के लिए आए क्रू मेम्बर्स की निगरानी करेगा ताकि ‘ए सूटेबल बॉय’ जैसी दुर्घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो। ये निर्णय स्वागत योग्य है। इसका अनुसरण देश की समस्त राज्य सरकारों को करना चाहिए। देश के एक वर्ग तो इस बात की वकालत कर रहा है कि ऐतिहासिक और धार्मिक स्थलों को शूटिंग के लिए दिया ही नहीं जाए तो अच्छा होगा।

इस मत पर भी सरकार को विचार करना चाहिए। अतीत में हम देख चुके हैं कि हमारे प्राचीन महत्व के स्थानों पर शूटिंग तो की जाती है लेकिन साथ ही क्रू मेम्बर्स उन स्थानों को कूड़ाघर बनाकर चले जाते हैं। बड़े निर्माता फिल्मों की शूटिंग के लिए मध्यप्रदेश के प्राचीन स्थलों पर आते हैं तो ऐसा लगता है कि वह स्थान एक माह के लिए बंधक बना लिया गया हो।

प्राचीन स्थलों के इस अपहरण में आमतौर पर स्थानीय जिला प्रशासन की मूक सहमति होती है। वैसे भी देशभर में राज्य सरकारें ऐतिहासिक स्थानों को शूटिंग के लिए उदार नीति अपनाए हुए हैं। ये नीति इतनी उदार है कि जिला प्रशासन की ओर से ऐसी कोई समीक्षा नहीं की जाती कि शूटिंग के दृश्य किस प्रकार के हैं। वहां धार्मिक स्थलों का सम्मान किया जा रहा है या नहीं।

वहां कोई आपत्तिजनक अश्लील दृश्य तो नहीं फिल्माया जा रहा है। इस तरह की कोई निगरानी सरकारों द्वारा करवाए जाने की कोई व्यवस्था नहीं है। फिल्म, फिल्म निर्देशकों और उनकी नीयत के बारे में राज्य सरकारें और नेता सर्वथा अज्ञानी हैं। उनके शक्तिशाली कुनबे में कोई फिल्मों की समझ रखने वाला नहीं होता। यदि होता तो मध्यप्रदेश सरकार विवादित फिल्म निर्देशक मीरा नायर को महेश्वर में शूटिंग की आज्ञा कभी नहीं दे सकती थी।

मध्यप्रदेश सरकार को कोई बताने वाला नहीं था कि जिस किताब पर मीरा नायर ने ये फिल्म बनाई थी, उसके लेखक विक्रम सेठ भारत और यहाँ के धर्म के प्रति एक दूषित सोच रखते हैं। महेश्वर का जिला प्रशासन तो इतना उदार है कि जब शूटिंग चलती है तो क्रू मेम्बर्स पुलिस की भूमिका में आ जाते हैं। घाट पर आने वाले आम नागरिकों को ये फ़िल्मी पुलिस डंडा दिखाकर भगाती है।

घाट पर स्थापित शिवलिंगों के बीच ये मेम्बर्स जूते पहनकर चलते हैं। जब तक शूटिंग चलती है, घाट उनकी निजी प्रॉपर्टी हो जाता है। और जब ये लोग वापस जाते हैं तो पीछे कूड़े का ढेर छोड़ जाते हैं। महानगरीय सोच हमारे धार्मिक स्थलों को भी नहीं छोड़ रही है।  ये लोग सिर्फ कचरे का ढेर ही नहीं छोड़ते बल्कि पुरातात्विक सामग्री को भी बहुत नुकसान पहुंचाते हैं।

मध्यप्रदेश सरकार ने एक अच्छी पहल की है लेकिन आगे जाकर इसमें भी घालमेल संभव है। मात्र एक वीडियोग्राफर के भरोसे पर जिला प्रशासन कैसे रह सकता है।  केंद्र सरकार को अविलंब एक कानून लाना चाहिए। इस कानून के तहत केवल उन फिल्मों को प्राचीन स्थलों पर शूटिंग की आज्ञा दी जाए, जो किसी पौराणिक कथा पर बनाई गई हो या किसी धार्मिक ग्रन्थ पर आधारित हो।

ऐसे निर्माता-निर्देशकों को आज्ञा न दी जाए, जिनका ट्रेक रिकार्ड मीरा नायर और संजय लीला भंसाली जैसे दाग से भरा हुआ हो। राज्य सरकार की ओर से एक टीम गठित की जाए। ये टीम शूटिंग की निगरानी करे और सारी रिपोर्ट राज्य सरकार को सौंप दे। हालांकि ये तभी संभव हो सकेगा, जब देश के सूचना व प्रसारण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर को बदल कर किसी अन्य व्यक्ति को लाया जाए।

ए सूटेबल बॉय के प्रकरण में ही देख लीजिये। मध्यप्रदेश के गृहमंत्री नरोत्तम मिश्रा अपने स्तर पर नेटफ्लिक्स पर कार्रवाई के प्रयास कर रहे, जबकि नेटफ्लिक्स भारत के नियंत्रण से बाहर है। नरोत्तम मिश्रा को तो मीरा नायर पर कार्रवाई करनी चाहिए। कितनी बेचारगी का वातावरण है। प्रकाश जावड़ेकर को जो कार्य करना चाहिए, उसे करने के लिए मध्यप्रदेश के गृहमंत्री को जूझना पड़ रहा है। देश के प्रधानमंत्री को इस ओर चिंतित होना चाहिए कि उनकी शक्तिशाली टीम में एक कमज़ोर सदस्य है, जिसे आराम की अत्यंत आवश्यकता है।

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Vipul Rege

Vipul Rege

पत्रकार/ लेखक/ फिल्म समीक्षक पिछले पंद्रह साल से पत्रकारिता और लेखन के क्षेत्र में सक्रिय। दैनिक भास्कर, नईदुनिया, पत्रिका, स्वदेश में बतौर पत्रकार सेवाएं दी। सामाजिक सरोकार के अभियानों को अंजाम दिया। पर्यावरण और पानी के लिए रचनात्मक कार्य किए। सन 2007 से फिल्म समीक्षक के रूप में भी सेवाएं दी है। वर्तमान में पुस्तक लेखन, फिल्म समीक्षक और सोशल मीडिया लेखक के रूप में सक्रिय हैं।

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