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दीपावली और पटाखे! फिर से हिंदूवादी सरकार में “सन्नाटे से भरी दीवाली”

दीपावली आते ही एक बार फिर से शोर शुरू हो गया है पटाखों से होने वाले प्रदूषण का। विज्ञापन भी बनने लगे हैं और मी लार्ड और आम आदमी पार्टी के नेता भी जागने लगे हैं। दिल्ली में कोई ग्रीन क्रैकर्स भी नहीं मिलेंगे। ऐसा अब न्यायालय और आम आदमी पार्टी की सरकार स्पष्ट कर दिया है। हर वर्ष हिन्दुओं को त्यौहार मनाते समय एक अपराध बोध अनुभव कराया जाता है, परन्तु क्या केवल आम आदमी पार्टी और न्यायालय ही इसके लिए जिम्मेदार है? फिर और कोई भी है? केंद्र सरकार भी कहीं इस सूनी दीपावली के लिए जिम्मेदार नहीं है? हिन्दू हितों का दावा करने वाली इसी सरकार के मंत्री तो कहीं हिन्दुओं के बच्चों के त्यौहार को सूना करने के लिए ज़िम्मेदार नहीं थे?

यह ट्वीट काफी हद तक तस्वीर साफ़ करता है, कि वर्ष 2014 से ही कैसे इस त्यौहार पर डॉ। हर्षवर्धन की नज़र पड़ गयी थी!

अब प्रश्न यह भी उठता है कि जो याचिकाएं पटाखों पर प्रतिबन्ध लगाने के लिए दायर की गयी थीं, वह किसने दायर की थीं, कौन था उनके पीछे? क्या कोई कांग्रेस का व्यक्ति था या फिर वामपंथी? या फिर कौन? यह जानना बहुत रोचक है क्योंकि जब उच्चतम न्यायालय ने पटाखों पर प्रतिबन्ध लगाया था तब सबसे पहले प्रसन्नता व्यक्त करने वाले व्यक्ति थे डॉ. हर्षवर्धन सिंह! वर्ष 2017 में जब उच्चतम न्यायालय ने दिल्ली और एनसीआर में पटाखों के खरीदे और बेचे जाने पर प्रतिबन्ध लगाया था, तो तत्कालीन पर्यावरण मंत्री डॉ. हर्षवर्धन ने प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा था कि बच्चे पटाखों से बहुत अधिक प्रभावित होते हैं, इसलिए हमने वैज्ञानिकों से शून्य प्रदूषण वाले पटाखे बनाने के लिए कहा है।

परन्तु उसके बाद जब ग्रीन क्रैकर्स बन गए तो भी नाटक चलता रहा और अभी भी चल रहा है।

जबकि आईआईटी की एक रिपोर्ट में यह कहा गया है कि पटाखे दिल्ली का प्रदूषण बढाने वाले शीर्ष पंद्रह कारकों में से भी नहीं हैं। इसी रिपोर्ट का हवाला लेकर पटाखे व्यापारियों ने उच्चतम न्यायालय में याचिका दायर की थी, जिसे कोर्ट ने ठुकरा दिया और कहा कि पटाखों का परिणाम जानने के लिए आईआईटी की रिपोर्ट की जरूरत नहीं है।

https://www.amarujala.com/india-news/supreme-court-ask-delhiites-the-effect-of-firecrackers-on-health-refuses-to-interfere-with-the-ngt-order-of-ban

और जीने के अधिकार के नाम पर हिन्दू त्योहारों को आँखें भीं न्यायपालिका के द्वारा दिखाई जा रही है.  जीने के अधिकार के नाम पर न्यायालय ने हाल ही में फिर से एक बार पटाखों के व्यापारियों द्वारा दायर की गयी याचिका खारिज कर दी. न्यायालय ने कहा कि रोजगार का अधिकार जीने के अधिकार से बढ़कर नहीं है. उच्चतम न्यायालय ने कहा कि हमारा मुख्य फोकस निर्दोष नागरिकों को जीवन जीने का अधिकार कायम रखने पर है। यदि हम पाएंगे कि ग्रीन पटाखे मौजूद हैं और विशेषज्ञों की समिति उन्हें मंजूरी देती है तो हम उचित आदेश पारित कर सकते हैं।

वर्ष 2015 से ही हरे पटाखों की बातें हो रही हैं, और यही बात न्यायालय की ओर से भी कही गयी है. हालांकि इस बार न्यायालय ने जैसे एक बैलेंस सा बनाते हुए कहा कि हम नहीं चाहते कि न्यायालय में बम फोड़े जाएं, इसलिए निर्धारित मानकों में पटाखे बनाए जाएं. इससे पहले नाडकर्णी की तरफ से दलील दे रहे शंकरनारायण को रोकने पर पीठ ने मजाक में कहा, हम नहीं चाहते कि अदालत कक्ष के अंदर कोई पटाखा फूटे। हर किसी को बात कहने का मौका मिलेगा। हम भी पटाखों से डरता हूं। इस पर शंकरनारायण ने कहा, मीलॉर्ड, हम यकीन दिलाते हैं कि अदालत में कोई पटाखा नहीं फूटेगा, केवल काम होगा।

https://www.amarujala.com/india-news/supreme-court-angry-with-fireworks-said-rights-of-life-of-other-citizens-cannot-be-crossed-under-the-guise-of-employment

परन्तु यहाँ पर यह जानना आवश्यक है कि रोजगार पर इस प्रकार सुनियोजित आक्रमण किया किसने? क्यों ऐसा नहीं हुआ कि दीपावली में पटाखों को लेकर जो मापदंड बनाए गए उन्हें समय पर लागू किया जाए, जिससे न ही रोजगार पर कोई विपरीत प्रभाव पड़े और न ही स्वास्थ्य पर?

और दीपावली का त्यौहार मात्र एक सनातनी त्यौहार ही नहीं हैं, अपितु यह पूरी भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ है. हिन्दुओं की खरीददारी भी इसी त्योहारों के मौसम में होती है! लोग पूरे वर्ष इसी एक माह की प्रतीक्षा करते हैं, पूरे वर्ष इस इस माह के लिए धन की बचत करते हैं और इस पूरे माह में बाज़ार ही नहीं बल्कि पूरी की पूरी अर्थव्यवथा में रौनक आ जाती है.

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दशहरे के मेले, मातारानी के व्रत, और फिर धनतेरस, दीपावली यह पूरी श्रृंखला है, दीपावली के आते ही घर की पुताई होती थी, जिससे हर वर्ग के पास रोजगार जाता था! परन्तु धीरे धीरे पर्व पर होने वाले उल्लास को मात्र थकान तक सीमित कर दिया गया. और हर त्यौहार को स्त्री विरोधी घोषित करने के लिए एक ब्रिगेड मैदान में आ गयी. इस पर बात फिर कभी! यह भी दीपावली का उल्लास कम करने का एक कारण हैं.

हालांकि डॉ. हर्षवर्धन द्वारा पटाखों पर प्रतिबन्ध के प्रयास केंद्र में मोदी सरकार के आते ही आरम्भ हो गए थे. और उन्होंने वर्ष 2014 में ही पटाखों पर प्रतिबन्ध को लेकर कहा दिल्ली के तत्कालीन उपराज्यपाल नजीब जंग से पटाखों पर प्रतिबन्ध लगाने के लिए अनुरोध किया था।

हालांकि नजीब जंग इस बात पर सहमत नहीं हुए तो हर्षवर्धन ने उच्चतम न्यायालय का रुख किया और जब केंद्र सरकार द्वारा यह अनुरोध उच्चतम न्यायालय से किया गया तो उच्चतम न्यायालय ने इस बात को माना और फिर सभी को पता है कि डॉ. हर्षवर्धन ने इस निर्णय का स्वागत किया।

जबकि यह एक नहीं कई अध्ययनों ने प्रमाणित किया है कि पटाखों से प्रदूषण में जरा भी अंतर नहीं होता है। वर्ष 2020 में उच्चतम न्यायालय में जो याचिका दायर की गयी थी वह थी एक लगभग अज्ञात गैर सरकारी संगठन द्वारा, और जिसमें भाजपा के ही सदस्य थे। यह संगठन था आईएसआरएन अर्थात इंडियन सोशल रेस्पोंसिबिलिटी नेटवर्क। इसका शासन चलाने वाले लोगों में मुख्य लोग थे ओम प्रकाश सकलेचा, विनय सहस्त्रबुद्धे, संतोष गुप्ता, ललिता कुमार मंगलम, सुमीत भसीन,  रविन्द्र साथे, संजय चतुर्वेदी, बसंत कुमार, इंदुमती राव और मल्लिका नड्डा!

सकलेचा मध्य प्रदेश से भाजपा जुड़े है,  विनय सहस्त्रबुद्ध ओ भाजपा से राज्यसभा सदस्य हैं एवं वर्तमान में पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं,  कुमारमंगलम भाजपा की नेता है और पूर्व में राष्ट्रीय महिला आयोग की प्रमुख रह चुकी हैं, सुमीत भसीन पब्लिक पॉलिसी रिसर्च से जुड़े और वह वर्ष  2019 के लोकसभा चुनावों के लिए भाजपा के सोशल मीडिया कमिटी से भी जुड़े थे, और सबसे  महत्वपूर्ण नाम था मल्लिका नड्डा जो भाजपा  अध्यक्ष जेपी नड्डा की पत्नी हैं।

जब हम इन दिनों पटाखों पर पूर्णतया प्रतिबन्ध की ओर बढ़ रहे हैं, तब भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी का वर्ष 2014 का ट्वीट याद करना चाहिए, जिसमें उन्होंने शिवाकाशी में पटाखा उद्योग के सामने चीन का डर दिखाया था।

https://twitter.com/narendramodi_in/status/456671154501976064?

यह कैसा उनका वादा था, जिसने उस पूरे उद्योग को ही तहस नहस नहीं किया बल्कि साथ ही बच्चों से त्यौहार की खुशी ही छीन ली!

क्या यह माना जाए कि भाजपा के नेता, भाजपा की सरकार में भाजपा के समर्थक हिन्दुओं से उनके त्योहारों की खुशी छीन रहे हैं? यहाँ पर कोई भी यह बात नहीं है कि उनकी खुशी छीनने की कोशिश हो रही है, क्योंकि खुशी तो छीनी जा चुकी है, इस बार दीपावली पर दिल्ली में वैसे ही पटाखे प्रतिबंधित हो गए हैं, ग्रीन क्रैकर्स भी नहीं बिक रहे है, सरकार और न्यायालय दोनों ही हिन्दुओं के त्योहारों को नष्ट करने के लिए आमदा है, जिसमें हिन्दुओं के वोट लेने वाली भाजपा सरकार भी उतनी ही जिम्मेदार है जितने कि न्यायालय क्योंकि याचिका लगाने वाले संस्थान में और कोई नहीं बल्कि भाजपा के ही लोग थे।

हालांकि याचिका दायर करने वाले संतोष गुप्ता को लेकर संस्थान ने सफाई दी थी कि वह व्यक्तिगत क्षमता के आधार पर दायर की गयी थी, मगर जल्द ही यह स्पष्ट हो गया था कि पटाखों पर याचिका संस्थान की ओर से ही दायर की गई थी

https://twitter.com/ISRNnewdelhi/status/1323288400309309440

दिल्ली की देखादेखी आज राजस्थान सरकार ने भी पटाखों को चलाना प्रतिबंधित कर दिया है, जिसमें कोविड 19 को कारण बताया गया है, परन्तु सभी जानते हैं कि यह कोविड नहीं है, यह वह हिन्दुओं के प्रति घृणा है, जो दिनों दिन बढ़ती जा रही है।

जले पर नमक छिडकने के लिए विज्ञापन हैं:

सबसे ज्यादा दुःख इस बात का होता है कि अपनी क्रिएटीविटी के नाम पर कूड़ा फैलाने वाले उत्पाद निर्माता, हिन्दू त्योहारों को अपने एक्टिविज्म का निशाना बनाते हैं। उनके लिए केवल और केवल हिन्दू त्यौहार या प्रतीक ही होते हैं।

हाल ही में हमने गुडगाँव में देखा कि कैसे सड़क को हथिया कर नमाज पढ़ी जा रही है, परन्तु सीएट टायर और आमिर खान क्रिकेट के बहाने यह कहने के लिए आ गए कि पटाखों को सडक पर नहीं, सोसाइटी में चलाना चाहिए।

आज जहाँ हर जगह से हमारी परम्पराएं समाप्त होती जा रही हैं, तो वहीं पर सीएट टायर और आमिर खान यह लेकर आ गए कि सड़कें नागिन डांस करने के लिए नहीं होतीं?

कन्यामान से अभी उबर भी नहीं पाए थे कि यह सीएट आ गया और एक बार फिर से हिन्दुओं को अपमानित किया गया। क्या आमिर खान यह देख नहीं पा रहे हैं कि एक एक करके प्रदेश पटाखों पर प्रतिबन्ध लगाते जा रहे हैं और बच्चों की मुस्कान और त्योहारों की खुशी तो वैसे ही एक्टिविज्म छीने ले रहा है, फिर चाहे वह कोई भी सरकार हो, तो ऐसे में बच्चों को एक बार फिर से अपराध बोध में धकेलने का क्या लाभ है?

न ही न्यायालय और न ही कोई भी कथित समाज सुधार वाला संगठन यह विज्ञापन बनाता है कि सड़कें चलने के लिए होती हैं, नमाज पढने के लिए नहीं! क्यों इस हरे रंग और सफ़ेद टोपी से विज्ञापन बनाने वाले भी खौफ खाते हैं? और हमारे बच्चों के मन में उनके त्यौहार और उनके अनुष्ठानों को लेकर अपराधबोध भरते रहते हैं?  कोई विज्ञापन वाला यह नहीं कहता कि सड़कें आन्दोलन करने के लिए नहीं होती हैं, चलने के लिए होती हैं! कोई भी विज्ञापन एक्टिविज्म किसान आन्दोलन के लिए नहीं कहता कि निर्धारित स्थानों पर ही आन्दोलन करना चाहिए! सड़कें चलने के लिए होती है?

क्यों हिन्दुओं के बच्चों को बार बार विज्ञापनों के माध्यम से अपराध बोध में धकेला जाता है फिर चाहे वह सर्फ़ एक्सेल हो या फिर सीएट और क्या कारण है कि हिंदूवादी सरकार के राज्य में भी हिन्दू अपने त्यौहार नहीं मना सकता है।

जैसे जैसे पटाखों पर राज्यों द्वारा प्रतिबन्ध लग रहा है, वैसे वैसे सेक्युलर पत्रकारों के चेहरे की खुशी बढ़ती जा रही है! और बच्चों के चेहरे लटकते जा रहे हैं।

मगर हिन्दुओं का यह दुर्भाग्य है कि वह यह भी नहीं कह सकते कि हमारी ही सरकार हमारे त्योहारों पर हमारी नहीं सुन रही है और उससे ही जुड़े लोग हमारे त्यौहार पर आक्रमण कर रहे हैं।

डॉ. हर्षवर्धन भी हमारे त्योहारों को निशाना बनाते हुए हाल तक केन्द्रीय मंत्रीमंडल में थे, आईएमए का पक्ष लेने के कारण उपजे विवाद के बाद वह स्वास्थ्य मंत्री नहीं रहे थे। परन्तु हिन्दुओं के इतने बड़े त्यौहार पर बार बार प्रहार करने के बाद भी वह मंत्री रहे थे।

जब पटाखा निर्माताओं द्वारा ग्रीन क्रैकर बनाए और बेचे जा रहे हैं, जैसा कि आदेश था, तो फिर कम आवाज़ वाले और हल्की फुल्की आतिशबाजी क्यों नहीं बेची जा सकती है? परन्तु हिन्दुओं के जले पर नमक छिड़कने के लिए कथित राष्ट्रवादी विचारक भी आगे आ जाते हैं। राकेश सिन्हा ने कहा था कि पूरे उद्योग पर ही ब्लैंकेट बैन लगा दिया जाए,

https://twitter.com/CNNnews18/status/917748532227874816

प्रदूषण की समस्या पर काम न करके, उद्योग को निशाना बनाना कहाँ का न्याय है और फिर प्रश्न यही है कि हिन्दुओं के इतने बड़े त्यौहार को निशाना बनाना बार बार और हर बार क्यों? आखिर इसका अंत कब होगा?

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Sonali Misra

सोनाली मिश्रा स्वतंत्र अनुवादक एवं कहानीकार हैं। उनका एक कहानी संग्रह डेसडीमोना मरती नहीं काफी चर्चित रहा है। उन्होंने पूर्व राष्ट्रपति कलाम पर लिखी गयी पुस्तक द पीपल्स प्रेसिडेंट का हिंदी अनुवाद किया है। साथ ही साथ वे कविताओं के अनुवाद पर भी काम कर रही हैं। सोनाली मिश्रा विभिन्न वेबसाइट्स एवं समाचार पत्रों के लिए स्त्री विषयक समस्याओं पर भी विभिन्न लेख लिखती हैं। आपने आगरा विश्वविद्यालय से अंग्रेजी में परास्नातक किया है और इस समय इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय से कविता के अनुवाद पर शोध कर रही हैं। सोनाली की कहानियाँ दैनिक जागरण, जनसत्ता, कथादेश, परिकथा, निकट आदि पत्रपत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं।

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