जहां प्रवेश मात्र से तत्क्षण पाप का नाश हो जानिए उस प्रयागराज का इतिहास!

जगत की रचना करने वाले ब्रह्मा की प्रथम यज्ञस्थली के रूप में आकार लेने वाले प्रयाग का सरकारी नाम समय-समय पर जो भी रखा गया हो लेकिन लोगों की जेहन में प्रयाग उसी रूप में बसा रहा। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने तो पिछले मंगलवार को लोगों के हृदय में अंकित प्रयाग का नाम सरकारी दस्तावेज में चढ़ाया है। यही वह ऐतिहासिक और पौराणिक शहर है जो सैकड़ों साल पहले नाम बदले जाने के बावजदू अपने मूल नाम से कट नही पाया। प्रयागराज ही वह शहर है जिसका नाम सिद्ध मंत्र के रूप में जपा जाता रहा है। तभी तो कहा जाता है “प्रयागस्य प्रवेशाद्धै पापं नश्यति: तत्क्षणात्” अर्थात प्रयाग में प्रवेश मात्र से तत्क्षण सभी पापों का नाश हो जाता है। तभी तो इसे तीर्थों का राजा प्रयागराज कहा जाता है।

मुख्य बिंदु

* अल्लाह का घर बनाने के लिए ही मुगल बादशाह अकबर ने 1575 में प्रयाग का नाम बदलकर इलाहाबास किया था

* मुगलों की बादशाहत खत्म होते ही अंग्रेज शासकों ने प्रयाग का नाम इलाहाबास से बदल कर इलाहाबाद कर दिया

* करीब तीन सौ साल पहले नाम बदले जाने के बावजूद लोगों के हृदय में प्रयाग नाम ही अंकित रहा

सरकारी दस्तावेज में प्रयागराज का नाम अंकित करना कोई छोटी बात नहीं है, इसके लिए आंतरिक सामर्थ्य चाहिए। देश के कई ऐसे शहर हैं जिसे बड़े-बड़े हिंदू हृदय सम्राट कहे जाने वालों को नाम बदलने की हिम्मत तक नहीं हो पायी, लेकिन योग आदित्यनाथ ने अपने दो साल के कार्यकाल के दौरान न सिर्फ मुगलसराय का नाम बदल कर पंडित दीनदयाल उपाध्याय किया बल्कि मदन मोहन मालवीय के समय से इलाहाबाद का नाम बदलने की मांग को साकार करते हुए उसे प्रयागराज कर दिया। जबकि बाला साहेब ठाकरे जैसे हिंदू हृदय सम्राट कहे जाने वाले बाला साहब ठाकरे भी अपने राज्य में औरंगाबाद को संभाजी नहीं कर पाए। इस संदर्भ में इंडिया स्पीक्स के प्रमुख संपादक संदीप देव ने अपनी किताब “राज-योगी, गोरखनाथ से आदित्यनाथ तक” के हवाले से अपने फेसबुक पोस्ट में “आखिर इलाहाबाद को प्रयागराज करने की ताकत योगी को कहां से मिली”? पर विस्तार से लिखा है।

प्रयागराज जितना पौराणिक है उतना ही महात्म्य भी जुड़ा है। यह वही सिद्ध नगरी है जहां के जल से देश-विदेश के राजाओं का अभिषेक हुआ करता था। यह ऋषि भारद्वाज, दुर्वाशा की नगरी रही है। यह पुराने समय में कोशल और अवध की राजधानी रही है। लेकिन मुगल आक्रांताओं ने इस विशेष नगरी प्रयागराज की आध्यात्मिकता और पौराणिकता पर हमला किया। तभी तो हिंदुओं का तीर्थराज कहे जाने वाले प्रयागराज में मुगल सम्राट अकबर ने अपने अल्लाह को बसाने का प्रयास किया। अकबर ने इसे अल्लाह का बास बताकर इसका नाम इलाहाबास कर दिया। जिसे बाद में अंग्रेजों ने इसे इलाहाबाद कर दिया। इस धर्म नगरी का नाम जो भी रखा गया हो लेकिन लोग इसे प्रयाग ही बुलाते रहे। लेकिन मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने 160 साल के इतिहास को एक बार फिर इतिहास बताते हुए प्रयागराज नाम की घोषणा कर उसकी पौराणिकता तथा आध्यात्मिकता लौटा दी है।

प्रयाग के बारे में कहा जाता है कि सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा ने अपना प्रथम यज्ञ यहीं किया था इसलिए इसका नाम प्रयाग पड़ा। प्रयागराज ऋषि भारद्वाज, दुर्वासा और पन्ना की ज्ञानस्थली रही है। लेकिन 1575 में प्रयाग को सामरिक दृष्टि के साथ ही धार्मिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण मानकर मुगल बादशाह अकबर ने इसका नाम बदल दिया। उन्होंने इस नगरी को अपने अल्लाह का बास (घर) बनाना चाहता था। इसलिए उसने प्रयाग का नाम बदल कर इलाहाबास कर दिया। जिसका मतलब होता है जो अल्लाह का बास हो। इसलिए उन्होंने यहां एक किला भी बनवाया जो अकबर का सबसे बड़ा किला माना जाता है। लेकिन मुगलों की बादशाहत खत्म होने बाद 1858 में अंग्रेज शासक ने प्रयागराज का नाम को इलाहाबास से बदल कर इलाहाबाद कर दिया। तथा इसे आगरा-अवध संयुक्त प्रांत की राजधानी भी बना दिया।

मुगलबादशाह ने भले ही प्रयाग का नाम बदलकर इलाहाबास कर दिया और फिर अंग्रेज शासकों ने इलाहाबाद कर दिया हो। लेकिन उसी समय से समय- समय पर इसका मूल नाम प्रयाग करने की मांग उठती रही है। लेकिन अधिकांश समय तक देश की सत्ता पर कायम कांग्रेस ने मुसलिम वोट बैंक के डर या तुष्टीकरण के कारण कभी इस पर विचार तक नही किया। कांग्रेस के ही पुराने नेता महामना मदनमोहन मालवीय ने अंग्रेजी शासनकाल में ही सबसे पहले प्रयाग नाम रखने के लिए अपनी आवाज उठायी थी। उन्होंने तो इलाहाबाद नाम हटाकर प्रयागराज करने की मुहिम भी चलाई थी।

उनके बाद अखाड़ा परिषद अध्यक्ष महंत नरेद्र गिरी भी इलाहाबाद का नाम बदल कर प्रयाग करने की मुहिम को आगे बढ़ाया। देश को स्वतंत्रता मिलने के बाद भी जवाहरलाल नेहरू से लेकर इंदिरा गांधी तक के सामने यह मांग उठती रही। बाद के कांग्रेसी प्रधानमंत्री के सामने यह प्रस्ताव ले जाना भी लोगों ने मुनासिब नहीं समझा क्योंकि लोग उनकी फितरतों से वाकिफ हो चुके थे। लेकिन जैसे ही प्रदेश में योगी आदित्यनाथ की सरकार काबिज हुई, देश के साधु-संतों की आश जगी। उन्होंने योगी सरकार के सामने इलाहाबाद का नाम बदलकर प्रयागराज करने का प्रस्ताव दिया। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने न केवल उनके प्रस्ताव पर विचार किया बल्कि कैबिनेट की बैठक बुलाकर न केवल इलाहाबाद जिला को बल्कि यूनिवर्सिटी तथा हाईकोर्ट का नाम भी प्रयागराज पर करने की घोषणा कर दी।

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