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श्री राम को मृत्यु से बचाने वाले गुरु वशिष्ठ जी का अद्भुत प्रसंग और सनातन गुरु परंपरा के कुछ विशिष्ट पन्ने!

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आदित्य जैन। महान वैज्ञानिक स्टीफन हॉकिंग ने A Brief History of Time नामक पुस्तक लिखी । क्या आपने यह पुस्तक पढ़ी है ? इस महान वैज्ञानिक से हज़ार साल पहले आचार्य कुंदकुंद ने Essence of Time अर्थात् समयसार नामक पुस्तक लिख दी थी। आपको यह दोनों ही पुस्तकें अवश्य ही पढ़नी चाहिए। क्या आपने बाहुबली मूवी देखी है ? क्या आपको पता है कि दक्षिण भारत में बाहुबली एक ऐतिहासिक चरित्र हैं, जिन्हें वहां की भाषा में गोम्मट कहा जाता है। उनके ऊपर भी एक ग्रंथ लिखा गया है, जिसे Essence of Bahubali या गोम्मटसार कहते हैं।

यह भी अद्भुत ग्रंथ है । इसे आचार्य नेमिचन्द्र ने लिखा है । सच तो यह है कि अभी न तो हम भारत को जानते हैं और ना यहां की संस्कृति और परंपरा को । और यदि हम भारत की संस्कृति को जानना चाहते हैं तो यहां की गुरु परंपरा और आचार्य परंपरा को समझना पड़ेगा। भारत में ईश्वर, भगवान, प्रभु , पालनहार, गॉड आदि शब्दों के अर्थ अलग – अलग है। और इनमे सबसे महत्वपूर्ण शब्द गुरु है।

भारत में कभी भी ईश्वर भक्ति की परंपरा नहीं रही है । इस देश ने सदा से उन व्यक्तित्वों को पूजा है , जिन्होंने जन्म मनुष्य के रूप में लिया लेकिन अपने जीवन में तप , त्याग , साहस , शौर्य को शामिल करके वे समाज के पूज्य बन गए । राम, कृष्ण, आदिनाथ, बुद्ध, महावीर, कबीर, गुरुनानक देव जी का जन्म भगवान या संत पुरुषों के रूप में नहीं हुआ था। समाज ने सर्वजन को प्रेरणा देने के लिए इन ऐतिहासिक व्यक्तित्वों को भगवान या पूज्य के रूप में मान्यता दी। इस देश में अगर किसी की भक्ति की परंपरा है तो वह है – गुरु भक्ति । गुरु भक्ति का प्रचलन हज़ारों वर्षों से भारतवर्ष में है ।

श्रीराम संपूर्ण भारत का भ्रमण करके लगभग 15 या 16 वर्ष की आयु में अयोध्या वापस आए । बहुत अधिक व्याकुल और परेशान थे । खाना – पीना छोड़ दिया । कई दिनों से उदास ही महल में पड़े हुए थे । मां, पिता, स्वजनों में से किसी की भी बात नहीं मान रहे थे । अपना प्राणान्त करना चाहते थे । अर्थात सुसाइड । सब लोग बड़े परेशान हो गए । महल में हाहाकार मच गई ।

तब वशिष्ठ ऋषि आए , उनसे रामचंद्र जी ने सैंकड़ो प्रश्न किए , उनके उत्तर ब्रह्मऋषि वशिष्ठ ने श्लोक , मंत्र , कहानी , दर्शन , उपमा आदि से दिए । कई दिन बीतने के बाद राम संतुष्ट हुए तथा कर्मयोग में प्रवृत्त हुए । राम अगर राम हैं तो इसका कारण उनके गुरु वशिष्ठ हैं । यह पूरी घटना व संवाद ग्रन्थ योग वशिष्ठ में वर्णित हैं। आज भी कई युवा भ्रमित हैं , तनावग्रस्त हैं। यदि युवाओं को सही दिशा देनी है और उनकी शक्ति जागृत करनी है तो यह भूमिका केवल गुरु ही निभा सकता है ।

आप सभी भारत की गुरुकुल परंपरा से अवश्य ही परिचित होंगे। महर्षि वशिष्ठ के भाई प्रचेता के पुत्र आदि कवि वाल्मीकि का गुरुकुल हो , या महामंत्र गायत्री के रचनाकार विश्वामित्र का गुरुकुल हो, जहां पर मर्यादा पुरुषोत्तम श्री रामचंद्र ने शिक्षा पाई थी या फिर विमान शास्त्र ग्रन्थ के रचनाकार प्रयागराज के तट पर स्थित भरद्वाज मुनि का गुरुकुल हो। गुरु धौम्य हो या सांख्य दर्शन के प्रवर्तक कपिल मुनि हो या राजा दुष्यंत और शकुंतला के पुत्र भारत के पालन पोषण व शिक्षा स्थल वाला महर्षि कण्व का गुरुकुल हो। भारत भूमि को बनाने वाले हर एक महापुरुष या साधारण व्यक्ति का नाम, गुरुकुल परंपरा से अवश्य ही जुड़ा रहता है ।

24 गुरुओं की परिकल्पना करने वाले भगवान दत्तात्रेय के पिता व अनुसूया के पति महर्षि अत्रि का गुरुकुल हो , जो चित्रकूट में स्थित था । या भारत की संगीत परंपरा के विभिन्न आयामों को सामवेद का रूप देने वाले ऋषि वामदेव का गुरुकुल हो। वामदेव न्याय दर्शन के प्रणेता महर्षि गौतम के पुत्र थे , जिन्होंने ग्रीक दार्शनिक व महामूर्ख सिकंदर के शिक्षक अरस्तु से बहुत पहले ही तर्क के विभिन्न सिद्धांतों का प्रतिपादन कर दिया था । वर्तमान नृत्य की विभिन्न विद्याओं को जन्म देने वाले ग्रंथ नाट्यशास्त्र के रचनाकार भरत मुनि ने ऋषि वामदेव से ही प्रेरणा प्राप्त की थी। ऋषि शौनक, ऋषि संदीपनी, ऋषि परशुराम, गुरु द्रोणाचार्य, कृष्ण द्वैपायन वेद व्यास के गुरुकुल भी बहुत प्रसिद्ध थे ।

मीमांसा दर्शन के प्रणेता जैमिनी को सामवेद महर्षि वेदव्यास ने ही पढ़ाया था। भारत की गुरुकुल परंपरा में एक विशिष्टता थी। निश्चित समयावधि, अनुशासन, प्रातः 4:00 बजे या ब्रह्म मुहूर्त से लेकर रात्रि 10:00 बजे तक मेहनत करने का अभ्यास , रोजगार के साथ जीवन जीने की कला को सिखाना, संघर्षों से जूझने की कला सिखाना, शास्त्र एवं शस्त्र का प्रशिक्षण, किशोरावस्था तथा युवावस्था की संभावनाओं का पूर्णतम विकास करवाने के लिए सभी मानकों को पूरा करना, गुरुकुल पद्धति की शिक्षण व्यवस्था में आ जाता था । विद्यार्थी समर्पण के साथ बिना लक्ष्य से भटके हुए अपने उद्देश्य की प्राप्ति में लगे रहते थे।

तक्षशिला, नालंदा, विक्रमशिला, वल्लभी, ओदंतपुरी, सोमपुर जगद्दल महाविहार, पुष्पगिरी, तेल्हारा, विक्रमपुर विहार आदि विश्वविद्यालयों और शिक्षण संस्थानों से आपका परिचय तो बहुत पहले से ही होगा । वर्तमान समय में जो स्थान ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी का है कैंब्रिज यूनिवर्सिटी का है , स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी का है, कभी प्राचीन काल में वही स्थान हमारे विश्वविद्यालयों को भी प्राप्त था ।

परंतु वर्तमान समय में अंग्रेजी भाषा को उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए माध्यम बनाने के कारण एवं नवाचार दृष्टिकोण को प्रोत्साहन न देने के कारण हमारे विश्वविद्यालय अभी भी वैश्विक मानदंडों से बहुत पीछे हैं। भारत भूमि के सभी महान व्यक्तित्वों ने गुरुकुल से ही शिक्षा प्राप्त की थी । राम, कृष्ण, भीम, अर्जुन, महर्षि दयानंद सरस्वती हो या वर्तमान समय में दुनिया का सबसे बड़ा वर्किंग फूड पार्क बनाने वाले पतंजलि योग पीठ के अध्यक्ष स्वामी रामदेव हो , इन सबने गुरुकुल से ही शिक्षा प्राप्त की हुई है ।

भारत में अंग्रेजी ईसाई साम्राज्य स्थापित करने के लिए व्यवस्थित रूप से भारत की गुरुकुल प्रणाली को तोड़ा गया है । जिसकी चर्चा प्रोफेसर धर्मपाल अपनी पुस्तक ” ब्यूटीफुल ट्री ” में करते हैं। आज भारतीय शिक्षा व्यवस्था को नए आयाम देने की आवश्यकता है । नई शिक्षा नीति 2020 के साथ हमें ऐसी पद्धति अपनाने की आवश्यकता है, जिसमे प्राचीनता और आधुनिकता का अद्भुत समन्वय हो। हरिद्वार में स्थित आचार्यकुलम स्कूल इस मानदंड पर खरा उतरता है । और सीबीएसई की रैंकिंग में भी अपने वार्षिक परिणाम के आधार पर टॉप फाइव स्कूल में आता है । इस तरह के स्कूल प्रत्येक जिले में खोले जाने की आवश्यकता है ।

आज इस कोरोना वायरस ने हमें गुरुकुल परंपरा तथा योग परंपरा की पुनर्स्थापना करने की योजना बनाने के लिए प्रेरित किया है । वर्तमान वैश्विक महामारी ने हमें योगासन , प्राणायाम , ध्यान , प्राकृतिक चिकित्सा , आयुर्वेद , सिद्ध मेडिसिन आदि की उपयोगिता को बता दिया है । यह सारी शिक्षा भारतीय गुरुकुल व्यवस्था में दी जाती थी ।

हमें भी कोशिश करनी चाहिए कि वर्तमान शिक्षा प्रणाली में इन सभी पक्षों को हम सम्मिलित करा सके। ये सारे पक्ष मनुष्य के शरीर, श्वास, मन, बुद्धि, स्मृति, अंहकार और चेतना को पुष्ट करते हैं, जिससे सर्वांगीण चिकित्सा तथा स्वस्थ जीवनशैली का विकास होता है। आज भारत में योग प्रशिक्षण के प्रामाणिक व दिव्य वातावरण वाले संस्थान स्थापित किए जाने की आवश्यकता है, जिसे भारतीय योग संस्थानों की ब्रैंड वैल्यू बढ़ सके ।

गुरु की अभिव्यक्ति ही उपनिषद कहलाई । यह अभिव्यक्ति पात्र शिष्य की जिज्ञासा से आती है। अब गुरु कौन हैं ? गुरु क्या हैं ? गुरु कहां हैं ? गुरु को कैसे पहचाने ? सद्गुरु के लक्षण क्या हैं ? आदि प्रश्नों के उत्तर भारतीय संस्कृत साहित्य , प्राकृत साहित्य और यहां तक पालि साहित्य में भरपूर मात्रा मिलते हैं। मेरे पास प्राकृत साहित्य के भी कुछ दुर्लभ ग्रंथ है। जिन्हें पढ़ना मेरे बस की बात नहीं है। मैं उनकी टीकाएँ पढ़ता हूं। जिसमें अन्वय अर्थ, भाव अर्थ और सार दिया रहता है । गुरु पद पाने के लिए पहले उपाध्याय बनना पड़ता है । फिर आचार्य बनना पड़ता है और इसके साथ ही कठिन साधना भी करनी होती है ।भारत की गुरु परंपरा को सादर नमन !

गुरु यदि आपको अपने आवास और परिसर में स्थान दे तो बहुत बड़ी बात होती थी । तब वह आपको अपने ” कुल ” का सदस्य मानता था । इसीलिए उस परिसर को गुरुकुल कहा गया । गुरु के कुल को उनका पुत्र नहीं , बल्कि शिष्य आगे बढ़ाता है । गुरु द्वारा शिक्षा के साथ दीक्षा भी दी जाती थी । गुरु का एक लक्षण ही यही है कि वह दीक्षा प्रदान करने की विधि से परिचित होगा । बिना दीक्षा लिए कोई शिष्य नहीं बन सकता ।

शिष्य होना , गुरु होना ; यह स्वयं में बहुत बड़ी बात है । आज हम एक कर्तव्यनिष्ठ छात्र और एक कर्तव्यनिष्ठ शिक्षक हो जाए , इसके भी आसार नजर नहीं आ रहे हैं। भारतीय शिक्षा व्यवस्था दीमक लगी हुई मेज़ की भांति है, जो अंदर से पूरी तरह चरमरा चुकी है। थोड़ा सा दबाव पड़ा कि टूट जाती है। कई मेज़ है, जो रोज ही टूट रही है। इस देश में कहीं भी कोई भी उपद्रव हो रहा है , वो लोग ही कर रहे हैं।

इन लोगों ने जो शिक्षा पाई है , वह इनके जीवन को बोध से नहीं भर पाई। इसीलिए कभी भ्रष्टाचार से मेज टूट रही है , कभी दंगों से , कभी हिंसा से , कभी सामाजिक अस्थिरता से तो कभी राजनीतिक उठापटक में देश के हित को भी तिलांजलि दी जाती है। जब – जब देश के हित की अनदेखी की गई , तब – तब यह मेज़ टूटी है ।प्रश्न है कि गुरु का लक्षण क्या है ?

गुरु का एक लक्षण उपचारक का है । गुरु शिष्य के देह , मन , बुद्धि , स्मृति , चेतना आदि में आ गई कमजोरी और रोग का उपचार करता है । गुरु समग्रता में कार्य करता है और शिक्षक केवल आपकी स्मृति व बुद्धि को ही पोषित करता है । अर्थात आपको कोई विषय पढ़ा देगा , स्मृति में रटा देगा और तर्क की सहायता से बुद्धि में तथ्य को बैठा देगा ।

इसके अलावा आपकी बुद्धि को सृजनात्मक बनाने का दायित्व भी शिक्षक के पास होता है , लेकिन आज कल इस कार्य को छुट्टी पर भेज दिया गया है । गुरु आपके सभी पक्षों का उपचार कर सकता है । इसीलिए मां को भी प्रथम गुरु कहा गया है । विष्णु , ब्रह्मा , शंकर को भी गुरु कहा गया है । यानि गुरु में ही ये सब हैं । इन सबमें ही गुरु हैं। इससे भारतीय संस्कृति में गुरु परंपरा का महत्व स्वयं सिद्ध है ।

इसीलिए भारत में ईश्वर भक्ति नहीं , बल्कि गुरु भक्ति प्रचलित थी और है । अब आप नहीं जानते , ये अलग पहलू है । जब ज्ञान अपनी पराकाष्ठा में पहुंचेगा तो भक्ति बन जाएगा और भक्ति जब अपनी पराकाष्ठा में पहुंचेगी तो कर्म को प्रेरित करेगी ।शंकराचार्य का जीवन इसका आदर्श उदाहरण है । भारत में तीन परंपराए सर्वाधिक प्रचलित हैं : देव – शास्त्र – गुरु की भक्ति की परंपरा ।

क्या आपको इसके विषय में पता है ? यदि पता है तो बधाई । भारत की पहचान इन तीन शब्दों से भी होती है । अब देव क्या है ? शास्त्र क्या है ? इसे भी तो समझना पड़ेगा । केवल टीवी में आ रहे सीरियल देखकर तो देव के बारे में पता चलेगा नहीं !!! इसीलिए आप सभी भारतीय संस्कृति के विशाल साहित्य को पढ़िए , समझिए तथा हृदयंगम कीजिए । मैं भी गुरु चरणों में मानव के मन का भाव निवेदित करता हूं :

न मिलते मोहे रामकृष्ण परमहंस !
न मिलते वसिष्ठ और ऋषि – मुनि के अंश !
न मिलता गुरुकुल मोहे !
न मिलता है चैन कहीं !
भारत भूमि की माटी को कैसे मस्तक पर लगाऊं मैं ?
जब मन ही बिखर चुका है तो मातृ भूमि पर कैसे रमाऊं मैं ?

यूं दिग्भ्रमित रही जवानी मेरी !
जिंदगी टूटते संकल्पों की कहानी मेरी !
पथ पर मिले , पत्थर और रत्न बहुत
किया आगे बढ़ते रहने का यत्न बहुत
दोनों को ही अपनी झोली में भरना चाहा
रत्न भी टूट गए , पत्थर भी चिटक गए
कई रिश्ते भी दूर – दूर होकर छिटक गए

किसी ने बड़े करुण स्वर में गीत गाया ,
तू अब तक अपने को न पहचान पाया ?
फंसा रहा , झुका रहा , दबा रहा , पड़ा रहा ,
संसार की माया में त्रिगुणों की कठपुतली बना रहा
मुझे कब आपने पास बुलाओगे गुरुदेव !
मुझे कब अपनी चरण – रज बनाओगे गुरुदेव !

पल – पल जिंदगी गुजर रही ,
शक्तियां यूं ही बिखर रही,
नियति भी मुझ पर बिफर रही ,
तो अब राग – द्वेष में क्यों खुद को फसाऊं मैं ?
गुरुदेव तेरे चरणों की ही रज क्यों न बन जाऊं मैं ?

कितने जन्मों की प्यास है !!
अब तो मन भी बड़ा उदास है !!
संसार की क्षणिकता व नश्वरता का अहसास है !
क्यों न महर्षि अरविंद जैसा चित्त पद्म को खिलाऊं मैं ?
तेरे ही चेतना के सरोवर के जल में सो जाऊं मैं ?

तूने वेद – उपनिषदों का भाष्य किया !
तूने गायत्री को भारत में पुन: जीवंत किया !
तूने ही तो अध्यात्म को नए सांचे में ढाला !
तू ही है महादेव – महाकाल के कंठ की वासुकी माला !
क्यों न तेरे उपनिषद भाष्य की
स्याही बन जाऊं मैं ?
क्यों न तेरे अमृत ज्ञान को धारण करने वाली सुराही बन जाऊं मैं ?

न जाने ये कैसा विज्ञान है !
तेरे आभारों के भार मेरे चित्त को हल्का करते हैं !
तेरे मुख से निकली हर एक पंक्ति मेरे चित्त को निर्मल करती है !
मुझसे भी 24 लक्ष गायत्री महा पुरश्चरण करा लो ना !
गुरुदेव अपनी चेतना की रश्मि
मुझे बना लो न !

गुरु परंपरा के मूर्त जीवंत रूप , चारों आश्रमों को प्रमाणिकता के साथ जीने वाले , उत्तर भारत में अध्यात्म की लौ को प्रज्ज्वलित रखने वाले तथा 21 वीं शताब्दी में होने वाले सभी श्रेष्ठ कार्यों की नींव तैयार करने वाले श्री राम शर्मा आचार्य जी को शत शत नमन । संपूर्ण गुरु परंपरा को नमन । जय हिन्द । जय भारत । जयतु जय जय आचार्य परंपरा । जयतु जय जय जय गुरु परंपरा।

( लेखक इलाहाबाद विश्वविद्यालय के दर्शन विभाग के गोल्ड मेडलिस्ट छात्र हैं । कई राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय सेमिनार में अपने शोध पत्रों का वाचन भी कर चुके हैं । विश्व विख्यात संस्था आर्ट ऑफ लिविंग के युवा आचार्य हैं । भारत सरकार द्वारा इन्हे योग शिक्षक के रूप में भी मान्यता मिली है । भारतीय दर्शन , इतिहास , संस्कृति , साहित्य , कविता , कहानियों तथा विभिन्न पुस्तकों को पढ़ने में इनकी विशेष रुचि है। )

लेखक आदित्य जैन
सीनियर रिसर्च फेलो
यूजीसी प्रयागराज
7985924709

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2 Comments

  1. Sandeep Singh says:

    बहुत ही श्रेष्ठ और उत्तम लेख । गुरु की महत्ता और महिमा को चित्त में पिरोहित करने वाला । आपको सादर प्रणाम 🙏

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