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लोकतंत्र की लाश पर रुदन करता अमेरिका

अनुज अग्रवाल – मुझे याद है कुछ वर्ष पूर्व मौलिक भारत के हमारे कार्यों से प्रभावित होकर रिपब्लिकन पार्टी के भारत आए एक प्रतिनिधिमंडल ने भारत में लोकतंत्र को मज़बूत करने के हमारे कार्यों को सहयोग व समर्थन के साथ आर्थिक सहायता देने का प्रस्ताव दिया था।

चूँकि विदेशी सहायता लेकर अपने देश में काम करना हमारी संस्था के सिद्धांतों के विरुद्ध था व भारत की हज़ारों वर्ष पुरानी लोकतांत्रिक पद्धतियाँ में हमारा विश्वास अधिक गहरा था , तो हमने उस प्रस्ताव को ठुकरा दिया था।

लोकतंत्र सामान्यत: किसी देश पर शासन की चाह रखने वाले दो या अधिक गुटों के बीच सत्ता संघर्ष का रक्तहीन रास्ता है व समवेधानिक तरीक़ों से शासन की पद्धति है।

मगर इतिहास गवाह है कि सत्ता की ललक का पौधे का बीज बिना रक्त की सिंचाई के पुष्पित – पल्लवित नहीं होता। चुनाव व लोकतांत्रिक तरीक़े मात्र इस रक्त संघर्ष को काम ही कर पाते हैं समाप्त नहीं।

भारत में बंगाल व केरल में इन दिनो इस खेल को आसानी से देखा व समझा जा सकता है तो वेश्विक पटल पर अमेरिका इसका ताज़ा उदाहरण है। अमेरिका के वास्तविक मालिक होने का दावा करने वाले मूलतः

सफ़ेद यूरोपियन व अनीर लोगों की रिपब्लिकन पार्टी से जुड़े अमेरिकन चुनाव हार चुके राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्र्म्प के नेतृत्व में , ग़ुलाम बनाकर लाए गए या प्रवासी बनकर आए बाहरी लोगों ( गोरे व काले दोनो) जो अब अमेरिका के नागरिक बन चुके हैं

व जिनका प्रतिनिधि डेमोक्रेटिक पार्टी व नव निर्वाचित राष्ट्रपति जो बाईडन करते है को सत्ता सौंपने को तैयार नहीं। यह प्रतिकार अब खूनी संघर्ष में बदल गया है। दुनिया भर में लोकतन्त्र का सबसे बड़ा प्रवक्ता होने का दावा करने वाला अमेरिका अब मज़ाक़ का पात्र बन रहा है

और ग्रहयुद्द की ओर बढ़ चुका है। हर दूसरे अमेरिकन ने हथियार ख़रीद लिए हैं व पिछले कुछ महीनो में दोनो धड़ों में आपसी संघर्षों की सेकड़ो वारदातें हो चुकी हैं।
डेमोक्रेट पार्टी में कुछ वर्षों पूर्व तक यूरोपियन मूल के लोगों का प्रभुत्व था , ऐसे में सत्ता हस्तांतरण आसानी से हो जाता था मगर पिछले कुछ दशकों में करोड़ों अप्रवासियों की नागरिकता देते जाने से समीकरण पूरी तरह बदल गए हैं।

पिछले तीन दशकों में अमेरिका अधिकांश ज़रूर्रत की चीजों के लिए चीन पर निर्भर होता गया है जिससे वहाँ बेरोज़गारी बढ़ती जा रही है। कोरोना संकट में यह विकराल रूप ले चुकी है।

अमेरिका की बहुराष्ट्रीय कंपनियों में भी चीन की कंपनियों की शेयर होल्डिंग बढ़ी है व चीन भी अमेरिका में चल रहे आंतरिक संघर्ष को बढ़ाने में लगा हुआ है , वह नहीं चाहता कि अमेरिका में मज़बूत व स्थिर सरकार आए।

क्योंकि मज़बूत व स्थिर सरकार चीन के ख़िलाफ़ कोरोना संक्रमण से तबाही फैलाने के आरोप में बड़ी कार्यवाही कर सकती है । चीन बदली परिस्थितियों में विश्व व्यवस्था को तहस नहस कर अमेरिका के स्थान पर दुनिया का पुलिसमेन बनना चाहता है।

जिसके कारण भी अमेरिकियो में असंतोष व आक्रोश है। अमेरिका में चल रहे इस संघर्ष के परिणाम पूरी दुनिया को झेलने पड़ेंगे। यह देखना दिलचस्प होगा कि आगे का घटनाक्रम क्या मोड़ लेता है।

हाँ अब पूरी दुनिया को अमेरिकन लोकतंत्र का खोखलापन अवश्य समझ आ रहा होगा । आज लोकतंत्र की लाश पर रुदन करता अमेरिका हमें डरा रहा है क्योंकि यह लाश लोकतंत्र के साथ साथ पूंजीवाद व बाज़ारवाद के उस माडल की भी है

जिसको दुनिया पर जबरन थोपा गया है। भारत के लिए यही समय है जब वह अपने हज़ारों वर्षों के परखे हुए अपने मौलिक सनातन माडल को दुनिया के सामने रखे व उसे पुनः स्थापित करे।


अनुज अग्रवाल
महासचिव, मौलिक भारत

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