अमिताभ एक ऐसी शख्सियत हैं, जिसका कद फिल्मों का कैमरा नहीं संभाल पाता!

सत्तर से अस्सी के दशक में जिन लोगों ने सिनेमा देखा है, वे एक दृश्य ताउम्र नहीं भूल सकते। फिल्म शुरू होने के बाद दर्शक अपने पसंदीदा अभिनेता की पहली झलक की प्रतीक्षा करता था। जैसे ही वह दिखाई देता, सिनेमा हॉल चीखों और सीटियों से गूंज उठता। परदे पर कुछ सेकंड तक कुछ दिखाई नहीं देता था। परदा पूरी तरह पचास और पच्चीस पैसों की चिल्लर से ढँक जाया करता था। जो लोग उस दौर में पचास पैसे की चिल्लर नहीं लुटा सकते थे, वे कैंटीन से कोल्ड ड्रिंक की चिब्बियां उठा लाते थे और परदे पर फेंका करते थे।

कुछ सेकंड बाद शोर थमने लगता, सिक्कों की बौछार कम होने लगती। फिर परदे पर छह फुट दो इंच लम्बे अमिताभ बच्चन की छवि उभरती थी। सिक्के फेंकने का ये रिवाज अमिताभ के साथ ही समाप्त हो गया। मुकुल आनंद की ‘हम’ वह आखिरी फिल्म थी, जिसमे महानायक पर सिक्कों की बौछार हुई थी। भाग्य कैसे काम करता है, ये जानना हो तो अमिताभ बच्चन का शुरूआती जीवन देखना चाहिए। ‘तुम्हारा एक कन्धा ऊँचा, एक नीचा है। ऊपर से घोड़े जैसे आवाज और ऊंट जैसा कद है। तुम्हे कौन फिल्मों में हीरो बनाएगा।’ अमिताभ को संघर्ष के दिनों में निर्देशकों के ऑफिस से ये ही बोलकर निकाल दिया जाता था।

जब वे फिल्मों में काम करने आए, उनके सामने बड़े सितारों की बड़ी सफलताएं थी। दिलीप कुमार, देव आनंद, राज कपूर और उनके बाद राजेश खन्ना की बादशाहत के बीच इतनी जगह ही नहीं बची थी कि फिल्म उद्योग एक और नायक के आगमन का स्वागत कर पाता। अमिताभ को कभी सिनेमा मटेरियल माना ही नहीं गया था। पहली फिल्म ‘सात हिंदुस्तानी’ में सशक्त उपस्थिति दिखाने के बाद भी उनको मनचाही सफलता नहीं मिल पा रही थी।अभिनेता प्राण की सिफारिश पर ‘जंजीर’ मिली। फिल्म पहले ही धर्मेंद्र, देव आनंद और राजकुमार ने ठुकरा दी थी। स्क्रीनप्ले पारम्परिक नहीं था। प्राण फिल्म के एकमात्र सितारे थे जो भीड़ खींच सकते थे।

1969 में सात हिंदुस्तानी प्रदर्शित होने के दस साल के भीतर अमिताभ सोलह फिल्मों में काम कर चुके थे लेकिन सफलता रूठी हुई थी। इन सोलह फिल्मों में ‘आनंद’, ‘गुड्डी’, ‘रेशमा और शेरा’ और ‘बॉम्बे टू गोआ’ जैसी फ़िल्में भी शामिल थी, जिनका अमिताभ को कोई फायदा नहीं मिल सका था। ‘जंजीर’ ऑफर होने तक अमिताभ की हिम्मत टूट गई थी। वे इस कॅरियर को विदा बोलकर इलाहाबाद जाने के बारे में सोचने लगे थे। लेकिन फिल्म बड़ी कामयाब रही। जिन सितारों ने ये फिल्म ठुकरा दी थी, वे भी पछता रहे थे। दुर्भाग्य के ब्लैक होल से निकलकर एक सितारे ने जन्म ले लिया था।

अमिताभ बच्चन के लिए भारत के जन मानस में क्या छवि है, ये जानना हो तो अनुराग कश्यप की ‘मुरब्बा’ देख डालिये। अस्सी के दशक में उत्तरप्रदेश में अमिताभ की बड़ी धूम हुआ करती थी। अनुराग कश्यप की फिल्म पिता के अमिताभ प्रेम पर आधारित है। वह अपने बेटे को आंवले का मुरब्बा देकर मुंबई भेजता है। उसका विश्वास है कि अमिताभ का खाया जूठा मुरब्बा खाकर उसकी लाइलाज बीमारी ठीक हो जाएगी। एक अनूठी फिल्म जो बताती है कि अमिताभ की फिल्म की एक रूपये साठ पैसे की एक टिकट तकलीफें बिसराने की रामबाण दवा थी।

आज वे 75 साल के हो चुके हैं। आर्थिक तूफ़ान झेलने के बाद पुनः खड़े हो चुके हैं और युवाओं जैसी चपलता दिखाते हुए अपने कर्म में लगे हुए हैं। एक जीवित किवंदती, जिन्हे हम अपनी आँखों से देख पा रहे हैं। एक बार उन्हें बहुत नजदीक से देखने का मौका मिला। जो उनके सामने आता है, खुद को भूल जाता है। एक ऐसी शख्सियत, जिसका कद फिल्मों का कैमरा नहीं संभाल पाता है। यदि आप उन्हें फिल्मों से बाहर देख लें तो जान जाएंगे कि उनके भीतर का सितारा लोगों को अपनी ओर क्यों खींच लेता है।

URL: Amitabh Bachchan- A living legend, which we can see with our eyes

keywords: Amitabh Bachchan, Amitabh birthday, amitabh birthday 11 October, supar star, supar star birthday, अमिताभ बच्चन, अमिताभ जन्मदिन, अमिताभ जन्मदिन 11 अक्टूबर, सुपर स्टार, सुपर स्टार जन्मदिन

आदरणीय पाठकगण,

ज्ञान अनमोल हैं, परंतु उसे आप तक पहुंचाने में लगने वाले समय, शोध और श्रम का मू्ल्य है। आप मात्र 100₹/माह Subscription Fee देकर इस ज्ञान-यज्ञ में भागीदार बन सकते हैं! धन्यवाद!  

 
* Subscription payments are only supported on Mastercard and Visa Credit Cards.

For International members, send PayPal payment to [email protected] or click below

Bank Details:
KAPOT MEDIA NETWORK LLP
HDFC Current A/C- 07082000002469 & IFSC: HDFC0000708  
Branch: GR.FL, DCM Building 16, Barakhamba Road, New Delhi- 110001
SWIFT CODE (BIC) : HDFCINBB
Paytm/UPI/Google Pay/ पे / Pay Zap/AmazonPay के लिए - 9312665127
WhatsApp के लिए मोबाइल नं- 9540911078
Vipul Rege

Vipul Rege

पत्रकार/ लेखक/ फिल्म समीक्षक पिछले पंद्रह साल से पत्रकारिता और लेखन के क्षेत्र में सक्रिय। दैनिक भास्कर, नईदुनिया, पत्रिका, स्वदेश में बतौर पत्रकार सेवाएं दी। सामाजिक सरोकार के अभियानों को अंजाम दिया। पर्यावरण और पानी के लिए रचनात्मक कार्य किए। सन 2007 से फिल्म समीक्षक के रूप में भी सेवाएं दी है। वर्तमान में पुस्तक लेखन, फिल्म समीक्षक और सोशल मीडिया लेखक के रूप में सक्रिय हैं।

You may also like...

Write a Comment

ताजा खबर