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Amnesty International, an Stooge of White West, i.e. London and USA तो अंग्रेजों की खुफिया एजेंसी है एमनेस्टी!

वह एक ऐसी संस्था है, जो सर्वव्यापी है। उसके कई हाथ हैं, कई चेहरे हैं। कई काम और कई नाम हैं। पर यदि सबको मिलाकर देखा जाए तो इतने नामों और रूपों का एक ही सार निकलता है और वह भारत का विरोध। आखिर ऐसा क्यों होता था कि एमनेस्टी की तरफ से केवल उन्हीं लोगों के पक्ष में बात की जाती थी जो भारत की आत्मा के विरुद्ध खड़े थे।  क्या मानवाधिकार के लिए कार्य करने वाली कोई भी संस्था ऐसी हो सकती है, जो उन लोगों के साथ जाकर खड़ी हो जाए, जो उसी देश में बम विस्फोट कर रहे हों। क्या कभी मानवाधिकारों के लिए काम करने वाली संस्था ऐसी हो सकती है जो उसी देश के संविधान, संसद और सरकार के खिलाफ खड़ी हो जाए और प्रमाणित दस्तावेज न जमा कराए, मानवाधिकार के नाम पर जो विदेशी सहायता आ रही हो उसका हिसाब न दे और जब सरकार खाते फ्रीज़ करे तो अन्याय का रोना रोए! 

आखिर समाज में व्याप्त अन्याय को दूर करने वाली संस्था के भीतर यह द्रोह का भाव आता कहाँ से है? उसके भीतर यह भाव कहाँ से आता है कि वह सब कुछ करके बच सकती है! वह विश्व में उसी देश का नाम खराब कर सकती है, जो उसे अपने यहाँ कार्य करने की अनुमति देता है। अपने कार्यों में आर्म्स कंट्रोल अर्थात हथियारों पर नियंत्रण के लिए तमाम उपाय बताने वाली एमनेस्टी कहीं खुद ही किसी के हाथ ही हथियार तो नहीं है? यह प्रश्न यूं ही नहीं उभर कर आया है, यह प्रश्न एमनेस्टी इंडिया द्वारा किए गए तमाम कार्यों से उठ खड़ा हुआ है। हाल ही में दिल्ली के जिन दंगों ने पूरे भारत में एक डर, खौफ, क्रोध और आक्रोश पैदा कर दिया था, और पूरा प्रयास किया गया कि ट्रंप के सामने भारत की बदनामी हो, और जिन दंगों में 50 से अधिक जानें गयी हों, उन दंगों की चिंगारी को हवा देने वाले वामी-इस्लामी दंगाइयों को युवा शक्ति कहने का पाप इस संस्था ने किया था तथा इन भड़काने वाले लोगों के पक्ष में Right To Dissent’ अभियान चलाया था। जम्मू और कश्मीर में भारत के खिलाफ प्रोपोगैंडा चलाने के बाद दिल्ली दंगों पर वह भारत के और भारत के नागरिकों के खिलाफ खड़ी थी। आखिर वह किसके हाथों का हथियार है, क्यों वह कर रही है? इसके जबाव बहुत रोचक और चौंकाने वाले हैं।

एमनेस्टी इंटरनेशनल – अंग्रेजी हुकूमत की खुफिया संस्था

एमनेस्टी इंटरनेशल की स्थापना वर्ष १९६१ में वकील पीटर बेनसन ने अपने कुछ साथियों के साथ की थी। यह वह समय था जब विश्व में महत्वपूर्ण घटनाएं हो रही थीं। https://greatgameindia.com के अनुसार एमनेस्टी की जो छवि अभी बनी है, वह उसकी आरंभिक छवि से एकदम अलग थी, जब ब्रिटिश विदेश मामलों का मंत्रालय अंग्रेजी साम्राज्य की महत्वपूर्ण रिपोर्ट को सेंसर कर रहा था। दरअसल १९६० वह समय था जब यूके अपने उपनिवेशों से वापस आ रहा था तथा उसे यह पता लगाना था कि आखिर वहां पर गतिविधियाँ क्या चल रही हैं, और वहां पर मानवाधिकारों की क्या स्थिति है। 

वर्ष १९६१ में एक अंग्रेज वकील पीटर बेनसन इस खबर को सुनकर दहल गए की दो पुर्तगाली विद्यार्थियों को केवल आज़ादी का नारा लगाने के कारण जेल भेज दिया गया। और उन्होंने एक लेख आब्जर्वर अखबार में लिखा। देखते ही देखते वह लेख पूरी दुनिया में मशहूर हो गया या फिर कहें उसे लोकप्रिय किया गया जिससे ब्रिटेन अपने उपनिवेशों में चल रहे थे तमाम मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के बीच अपनी पैठ बना सके और वहां पर अपनी कठपुतली संस्था के माध्यम से मानवाधिकारों के नाम पर अपनी एक समानांतर सरकार चला सके, क्योंकि खुद को तो अपना बोरिया बिस्तर समेटना ही था। 

पंजीकरण

एमनेस्टी इंटरनेशनल का पंजीकरण गारंटी द्वारा लिमटेड कंपनी के रूप में इंग्लैण्ड और वेल्स में पंजीकृत तथा यह पंजीकृत चैरिटी है, जिसका पंजीकृत कार्यालय लंदन में है। परन्तु जब बात एमनेस्टी इंडिया की बात आती है, तो सरकारी संस्थानों का यही कहना है कि एमनेस्टी ने गलत मरूत से धन लेकर कानूनी प्रावधानों का उल्लंघन किया है। एमनेस्टी इंटरनेशनल को विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम (एफसीआरए) के अंतर्गत सिर्फ एक बार कार्य करने की अनुमति दी गयी थी और वह भी आज से २० वर्ष पूर्व। और तब से अभी तक एमनेस्टी इंटरनेशनल के कई बार आवेदन करने के बावजूद पूर्ववर्ती सरकारों द्वारा एफसीआरए स्वीकृति से इनकार किया

जाता रहा है, क्योंकि कानून के तहत वह इस स्वीकृति को हासिल करने के लिए पात्र नहीं है। हालांकि यह भी सच है कि एमनेस्टी यूके ने FCRA के नियम को किनारे करते हुए प्रत्यक्ष विदेशी निवेश यानी एफडीआई बताकर भारत में पंजीकृत चार संस्थाओं को बड़ी मात्रा में धन भेजा। यही कारण है कि एमनेस्टी पर यह आरोप पुख्ता होता है कि वह अंग्रेजों की खुफिया संस्था के रूप में इस्तेमाल की जा रही है।

पूर्व में भी हो चुकी हैं कार्यवाही की मांग जो एमनेस्टी आज सरकार द्वारा उठाए गए क़दमों पर दुखी हो रही है, वह यह बताना भूल जाती है कि कश्मीर पर उठाए गए देश विरोधी कदमों के कारण वर्ष १९९० में तत्कालीन विपक्ष के नेता राजीव गांधी ने एमनेस्टी इंटरनेश्नल के कश्मीर प्रवेश पर भी प्रतिबन्ध की मांग की थी।

एक अंग्रेज जासूस पीटर बेनसन: पीटर बेनसन ने इस संस्था को बनाकर जासूसी का काम किया तथा इस बात के भी सबूत इस वेबसाइट के माध्यम से मिलते हैं कि वह गैरकानूनी तरीके से अन्य देशों जैसे हैती में गए, और यह भी कहा गया है की बेनसन एक पेंटर के रूप में गए और उन्हें यह सख्त हिदायत दी गयी थी कि वह यह नहीं बताएंगे कि उनकी यात्रा के लिए ब्रिटेन की महारानी ने पैसे दिए हैं।

अन्य देशों में सरकार अस्थिर करना

एमनेस्टी इंटरनेशनल के माध्यम से ब्रिटेन वही खेल खेलना चाहता था, जो वह कई वर्ष पहले खेल चुका था। और वह देशो की सरकार को अस्थिर करने के लिए हर संभव कोशिश कर रहा था। इसका सबसे बड़ा उदाहरण है सूडान! वर्ष २०१९ में हुए तख्तापलट में एमनेस्टी इंटरनेश्नल की भूमिका बताई जाती है।  एमनेस्टी इंटरनेशनल ने change is possible के नाम से एक अभियान चलाया था और उसकी भी आलोचना यही कहते हुए हुई थी की पीटर बेनसन ब्रिटिश विदेश कार्यालय के साथ कार्य करते हैं।https://twitter।com/RealAlexRubi/status/1049785180439937024

सितम्बर २०१६ में एक रिपोर्ट में एमनेस्टी इंटरनेशनल ने यह दावा किया था कि सूडान की सरकार अपने खुद के नागरिकों के खिलाफ रासायनिक युद्ध छेड़ रही है,पूरे पश्चिमी जगत ने यह रिपोर्ट बिना किन्तु-परन्तु किए हुए प्रकाशित की थी, मगर अफ्रीकी मीडिया को यह बात नहीं पच पाई थी और बाद में पाया गया कि यह अंग्रेज सरकार द्वारा किया गया प्रपंच ही था। 

भारत में भी कश्मीर में चल रही हर गतिविधि में एमनेस्टी की यह कुचेष्टा देखी जा सकती है। इस्लामी आतंकवाद से जूझते हुए भारतीय कश्मीर में जिस तरह का इस्लामी प्रोपोगैंडा चला रखा है वह निंदनीय है तथा एमनेस्टी इंटरनेश्नल ने यह प्रयास किया है की कश्मीर के मुद्दे पर भारत को वह पूरे विश्व में नीचा दिखाए।  धारा ३७७ जिसने पूरे भारत से कश्मीर को अलग कर रखा था, और जिसके कारण वहां पर विकास के कार्य नहीं हो पाते थे, उसे हटाए जाने पर किस प्रकार का प्रोपोगैंडा एमनेस्टी इंटरनेशनल ने चलाया वह देखने योग्य है। इतना ही नहीं पाकिस्तान, बंगलादेश, अफगानिस्तान से आने वाले धार्मिक अल्पसंख्यकों को नागरिकता देने के विरोध में एमनेस्टी ने भारत विरोधी प्रदर्शनों को असंतुष्ट प्रदर्शन की संज्ञा दी।

जब पूरे भारत में सीएए के विरोध के नाम पर सड़कों को काटा जा रहा था, लगभग हर सार्वजनिक स्थान पर कब्ज़ा जमाया जा रहा था, और संसद द्वारा पारित अधिनियम को माने जाने से इंकार किया जा रहा था, देश की संप्रभुता को चुनौती दी जा रही थी, उन दिनों एमनेस्टी इंटरनेश्नल उन लोगों का पक्ष ले रहा था जो भारत में लगातार हिंसक कार्यवाही करने के लिए तत्पर थे।

हाल ही में एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया के पूर्व कार्यकारी निदेशक आकार पटेल पर भी एफआईआर दर्ज की गयी थी। और यह एफआईआर उनपर इसलिए दर्ज की गयी थी क्योंकि उन्होंनें एक वीडियो पोस्ट करते हुए भारतीय दलितों, आदिवासियों, और महिलाओं को भड़काते हुए लिखा था कि उन्हें भी इसी तरह हिंसक प्रदर्शन करने चाहिए, जिससे दुनिया का ध्यान खिंचे। दरअसल उन्होंने अमेरिका में चल रहे ब्लैकलाइव्समैटर्स के आन्दोलन के दौरान एक भड़काऊ वीडियो को पोस्ट किया था।  एमनेस्टी इंटरनेशनल ने भारत में हमेशा ही वामी और इस्लामी कट्टरपंथ को बढावा दिया है।

मानवाधिकार उल्लंघन के कई मामलों को दबाया

एमनेस्टी इंटरनेश्नल ने केवल देशों को तोड़ने का ही काम नहीं किया है बल्कि उसने जिन रिपोर्ट को दबाना चाहा है उन्हें दबाया भी है। पाकिस्तान में हिन्दू लड़कियों का जबरन धर्म परिवर्तन सरकार की नाक के नीचे हो रहा है, मगर एमनेस्टी इंटरनेश्नल उस ओर से आँखें मूंदे रहती है, कभी नाम के लिए कोई विरोध प्रदर्शन किया हो, तो किया हो नहीं तो इसका रिकॉर्ड इस बारे में बहुत खराब है। और जानबूझकर ख़ास रिपोर्ट दबाना और ख़ास रिपोर्ट दिखाना ही इसका काम है। अंग्रेज सरकार के प्रति इसने कई रिपोर्ट दबाई हैं जिनमें यमन में ब्रिटिश एजेंट्स द्वारा किए गए अत्याचारों की रिपोर्ट दबा दी गयी थी। यह वर्ष १९६६ की बात है, जब आज के यमन में एक पत्तन शहर aden था, जिसमें Ras Morbut पूछताछ केंद्र में अंग्रेजी सरकार के दलालों ने अत्याचार की हर सीमा पार कर दी थी, जिसमें कैदियों को नंगा करके उन खम्भों पर बैठाया गया था जो उनके गुदाद्वार से होकर भीतर चले गए थे, उनके यौनांगों को मोड़ा गया था, चेहरे पर सिगरेट दागी गईं थीं और उन्हें ऐसी कोठरियों में रखा गया था जहाँ पर मल और मूत्र फैला था।

मगर एमनेस्टी इंटरनेश्नल ने यह रिपोर्ट कभी जारी नहीं की। बाद में एमनेस्टी के सह-संस्थापक नेएरिक बेकार ने यह कहा कि बेनसन और स्वान फॉरेन ऑफिस में मिले थे और दोनों में सहमति हुई किवह इस रिपोर्ट को सुधार के लिए बदलाव में बदल देंगे। 

इसी प्रकार जिन रोहिंग्या मुसलमानों को भारत में बसाने के लिए एमनेस्टी दिन रात एक किए हुए है, उन रोहिंग्या मुसलमानों द्वारा हिन्दू रोहिंग्या पर किए जा रहे अत्याचारों की तरफ से वह आँखें मूँद लेती है। यदि कहा जाए कि एमनेस्टी इंटरनेशनल महज सुविधाभोगी संस्थान है जो अपनी सुविधा के अनुसार ही जो दिखाना चाहता है वह दिखाता है। 

ब्रिटिश सरकार से धन लेने का आरोप यह आरोप लगाने वाले और कोई नहीं बल्कि Guardian की पत्रकार Polly Toynbee थे, जिन्होनें नाइजीरिया में एमनेस्टी मिशन में सेक्रेट्री के रूप में काम किया था। उन्होंने यह खुलासा किया था कि इस बात के काफी प्रमाण हैं, कि बेनसन ने खुद ही ब्रिटिश सरकार के फंड को स्वीकार किया था। उन्होंने कहा था कि जो धन आया था वह राजनीतिक कैदियों और उनके परिवारों के लिए था, न कि एमनेस्टी के लिए। इस बात पर काफी विवाद हुआ था और आलोचना होने पर एमनेस्टी में अधिकारियों की मीटिंग में बेनसन ने भाग नहीं लिया और उन्हें इस्तीफ़ा देना पड़ा।

एमनेस्टी इंटरनेशनल केवल पैसे को समर्पित है

जब भी एमनेस्टी इंटरनेश्नल की बात आती है तो जाहिर है दान की भी बात आती है। फिर एक प्रश्न उठता है कि क्या एमनेस्टी इंटरनेशनल निष्पक्ष है? इस विषय में globalpolicy।org वेबसाइट पर Francis Boyle का इंटरव्यू पढ़ा जा सकता है। इसमें वह स्पष्ट लिखते हैं कि एमनेस्टी इंटरनेश्नल के लिए सबसे पहले पब्लिसिटी जरूरी है, फिर पैसा, फिर  ज्यादा सदस्य, और आतंरिक संघर्ष और फिर उसके बाद ही जाकर कहीं मानवाधिकार की बात आती है।

Dennis Bernstein: Let’s talk about Amnesty International and the carnage of Jenin I’m thinking specifically of Jenin, but generally speaking, how does Amnesty International decide what to focus on and what to say and what not to say?

Francis Boyle: Amnesty International is primarily motivated not by human rights but by publicity। Second comes money। Third comes getting more members. Fourth, internal turf battles. And then finally, human rights, genuine human rights concerns.https://www.globalpolicy.org/component/content/article/176/31407.html

ज्ञात हो कि Francis Boyle एमनेस्टी इंटरनेशनल के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर के रूप में भी काम कर चुके हैं और वह यूनिवर्सिटी ऑफ इलिओंस कॉलेज ऑफ लॉ में इंटरनेशनल लॉ में प्रोफ़ेसर हैं।

वह इसी इंटरव्यू में यह बताते हैं कि कब और क्यों एमनेस्टी किसी देश के आतंरिक मामलों में दखल देना शुरू करती है। वह कहते हैं कि यदि आप ऐसे देश में हैं जिसके सम्बन्ध यूनाइटेड स्टेट या ब्रिटेन के साथ अच्छे नहीं है या आप उनके लिए खतरा हैं, तो आप पर ज्यादा ध्यान केन्द्रित किया जाएगा, और वह लोग कुछ भी कर सकते हैं, किसी भी हद तक जा सकते हैं। इस इंटरव्यू में वह खुलकर अमेरिका, ब्रिटिश और एमनेस्टी इंटरनेश्नल की विदेश नीति में परस्पर नज़दीकी सम्बन्धों को बताते हैं। कि कैसे इन दोनों देशों के इशारे पर एमनेस्टी इंटरनेशनल उन देशों को अस्थिर करती है, जो इन पश्चिमी देशों के लिए खतरा हो सकते हैं और इसके लिए वह कुछ भी कर सकती है, कुछ भी! उन देशों में युद्ध छेड़ सकती है, नए दुश्मन पैदा कर सकती है यहाँ तक कि उस देश के नागरिकों को भी उस देश के खिलाफ खड़ा कर सकती है और इसके लिए उसे बहुत पैसा मिलता है। और अंत में वह यह कहते हैं कि एमनेस्टी इंटरनेश्नल जिस तरीके से काम करती है वह पूरी तरह से राजनीतिक है, और यदि आप उसका विरोध करते हैं तो आपको ही बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है।

So that’s the way it works and it’s highly political, highly coercive, and eventually if you get out of line, they’ll get rid of you.

कोविड १९ एक मानव जनित जैव हथियार  Francis Boyle ने अमेरिका के लिए Biological Weapons Convention घरेलू क़ानून बनाने पर काम किया है जिसे Biological Weapons Anti-Terrorism Act of 1989 कहा जाता है, उन्होंने कहा है कि कोरोनावायरस एक खतरनाक जैविक युद्ध हथियार है और विश्वस्वास्थ्य संगठन को इसकी पूरी जानकारी थी।

इसीके साथ Francis Boyle यह भी बताते हैं कि कैसे एमनेस्टी इंटरनेशनल युद्ध फैलाती है। ईराक युद्ध इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। कुवैत पर इराकी आक्रमण की एमनेस्टी रिपोर्ट का हवाला देते हुए वह कहते हैं कि यह पूरी तरह से गलत रिपोर्ट थी। और यह तथ्य कि इराकी सैनिकों ने इन्क्युबेटर से बच्चों को हटाकर अस्पताल में फेंक दिया, जहाँ उनकी मौत हो गयी, भी सत्य से परे है।  इसके बाद वह कहते हैं कि यह बाद में पता चला कि यह सब कुवैत का प्रोपोगैंडा था जो उसने पीआरफर्म Hill & Knowlton के साथ मिलकर शुरू किया था। और उन्होंने जांच की बात की, जिसे पूरी तरह से अस्वीकार कर दिया गया। वह कहते हैं कि उस समय एमनेस्टी इंटरनेश्नल में एक उच्चाधिकारी उनके अनुसार एक ब्रिटिश एजेंट था।

एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया, जो भारत में अपने खाते फ्रीज़ होने पर इतना शोर मचा रही है, उसे अपने गिरेबान में झाँक कर देखना चाहिए कि उसने कैसे समृद्ध देशों को अस्थिर करने के लिए और एक बार फिर से पूरी दुनिया को अंग्रेजों को अधीन करने के लिए एक नए संघर्ष और षड्यंत्र का सूत्रपात किया है। यह तमाम प्रमाणों से ज्ञात होता है कि मानवाधिकारों की आड़ में उसने केवल और केवल यही किया है कि जो जो भी देश अंग्रेजों के उपनिवेश रहे थे, वह अंग्रेजों की अप्रत्यक्ष सत्ता में रहें। कहने के लिए लोकतांत्रिक सरकार हो, मगर उसे चलाए एमनेस्टी इंटरनेशनल और वह तमाम “अराजक संगठन” जिन्हें विदेशों से देश को अस्थिर करने के लिए पैसा मिल रहा है, जैसा हमने सोनिया गांधी की सुपर कैबिनेट एनएसी में देखा था, जिसमें इन्हीं तमाम संगठनों के लोग शामिल थे जो कहीं न कहीं एमनेस्टी इंटरनेशनल से जुड़े थे।

मुट्ठी भर लोग पूरे विश्व पर शासन करना चाहते हैं जैसा Francis Boyle कहते हैं कि  it’s basically a small clique of people who have been in power for a good twenty years, or their friends and their buddies that they co-opt through a bogus nominating process to put on there.

जबकि भारत दुनिया का सबसे पहला गणतंत्र है, यहाँ पर मुट्ठी भर कुलीन नहीं अपितु जनाकांक्षाओं का शासन रहा है। यहाँ पर एमनेस्टी इंटरनेशनल जैसी दुकानों को बंद होना ही चाहिए, जो देश के लिए सर्वस्व अर्पण करने वाले सैनिकों और सेना के खिलाफ खड़ी रहती है, बहुसंख्यक की आस्थाओं के खिलाफ खडी रहती हैं और सबसे बढ़कर देश तोड़ने के लिए तैयार रहती है। मिडल ईस्ट को अपना निवाला बना चुके यह गिद्ध अब भारत का रुख किए हुए हैं, और इन गिद्धों से भारत को बचाना ही होगा! इन गिद्धों ने जितना पूरी दुनिया को नोचा है, उसके लिए एक लेख नहीं कम से कम दस पुस्तकें चाहिए, तब एमनेस्टी इंटरनेशनल के कुकर्म लिखे जा पाएंगे!

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Sonali Misra

Sonali Misra

सोनाली मिश्रा स्वतंत्र अनुवादक एवं कहानीकार हैं। उनका एक कहानी संग्रह डेसडीमोना मरती नहीं काफी चर्चित रहा है। उन्होंने पूर्व राष्ट्रपति कलाम पर लिखी गयी पुस्तक द पीपल्स प्रेसिडेंट का हिंदी अनुवाद किया है। साथ ही साथ वे कविताओं के अनुवाद पर भी काम कर रही हैं। सोनाली मिश्रा विभिन्न वेबसाइट्स एवं समाचार पत्रों के लिए स्त्री विषयक समस्याओं पर भी विभिन्न लेख लिखती हैं। आपने आगरा विश्वविद्यालय से अंग्रेजी में परास्नातक किया है और इस समय इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय से कविता के अनुवाद पर शोध कर रही हैं। सोनाली की कहानियाँ दैनिक जागरण, जनसत्ता, कथादेश, परिकथा, निकट आदि पत्रपत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं।

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