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प्राचीन अरब कभी हिंदू संस्कृति का अभिन्न अंग था।

गुंजन अग्रवाल। इस्तांबुल, तुर्की के प्रसिद्ध राजकीय पुस्तकालय ‘मक्तब-ए-सुल्तानिया’ (सम्प्रति मक्तब-ए-ज़म्हूरिया), जो प्राचीन पश्चिम एशियाई-साहित्य के विशाल भण्डार के लिए प्रसिद्ध है, के अरबी विभाग में प्राचीन अरबी-कविताओं का संग्रह ‘शायर-उल्-ओकुल’ हस्तलिखित ग्रन्थ के रूप में सुरक्षित है। इस ग्रन्थ का संकलन एवं संपादन बग़दाद के ख़लीफ़ा हारून-अल्-रशीद के दरबारी एवं सुप्रसिद्ध अरबी-कवि अबू-अमीर अब्दुल अस्मई ने किया था, जिसे ‘अरबी-काव्य-साहित्य का कालिदास’ कहा जाता है।

सन् 1792 ई. में तुर्की के प्रसिद्ध शासक सलीम-III (1789-1807) ने अत्यन्त यत्नपूर्वक किसी प्राचीन प्रति के आधार पर इसे लिखवाया था। इस दुर्लभ हस्तलिखित ग्रन्थ के पृष्ठ लेखनयोग्य कच्ची रेशम की एक कि़स्म ‘हरीर’ के बने हैं, जिसके कारण यह सर्वाधिक मूल्यवान पुस्तकों में से एक है। इस ग्रन्थ के प्रत्येक पृष्ठ को सुनहले सजावटी किनारी (बॉर्डर) से सुसज्जित किया गया है। जावा एवं अन्य स्थानों पर पाई गई अनेक प्राचीन संस्कृत-पाण्डुलिपियाँ ऐसे ही सुनहली किनारी से सुसज्जित हैं। इस महान् ग्रन्थ का प्रथम अंग्रे़ज़ी-संस्करण सन् 1864 ई. में बर्लिन, जर्मनी से प्रकाशित हुआ। द्वितीय संस्करण सन् 1932 में बेरुत, फिलिस्तीन से प्रकाशित हुआ । सन् 1963 में प्रो. (डॉ.) हरवंशलाल ओबराय (1925-1983) ने अपने इराक़-प्रवास के दौरान बग़दाद विश्वविद्यालय में हुए अपने व्याख्यान के समय इस ग्रन्थ को वहाँ पुनर्प्रकाशन हेतु संपादित होते देखा।

डॉ. ओबराय उस ग्रन्थ की महत्त्वपूर्ण कविताओं को नोट करके भारत लाए। उन्होंने अप्रैल, 1978 में दिए अपने एक भाषण, जिसका कैसेट हमारे पास उपलब्ध है, में ‘शायर-उल्-ओकुल’ की पंक्तियाँ उद्धृत करते हुए कहा था— ‘‘सन् 1963 में अपने इराक़-प्रवास के दौरान इराक़ से लौटते समय मैंने उस ग्रन्थ का दर्शन किया और उसे अपनी डायरी में नोट किया था। भारत लौटने पर बाबू जुगल किशोर बिड़ला ने एक बार मुझसे कहा कि कुछ रोचक प्रसंग सुनाइये, तो मैंने उन्हें बताया कि इराक़ से मैं यह कविता लेकर आया हूँ। कविता सुनकर बिड़ला जी उछल पड़े। उनकी आँखों से अश्रुधारा बहने लगी। उन्होंने तुरन्त उस कविता को एक बड़े लाल संगमरमर की पट्टी पर खुदवाकर दिल्ली के बिड़ला-मन्दिर में लगवाने का आदेश दिया। आज भी वह पत्थर बिड़ला-मन्दिर में लगा हुआ है।”

बाद में डॉ. ओबराय ने इन्हीं प्रागैस्लामी अरबी-कविताओं के आधार ‘A Glimpse of Pre-Islamic Arabia’ अथवा ‘Influence of Indian Culture on Arabia’ शीर्षक शोध-पत्र लिखा, जिसे उन्होंने प्राचीन भारतीय इतिहास एवं पुरातत्त्व विभाग, मद्रास विश्वविद्यालय तथा राजकीय संग्रहालय, एगमोर, मद्रास के संयुक्त तत्त्वावधान में दिनांक 12-14 फरवरी, 1982 को आयोजित ‘अखिल भारतीय इतिहास एवं संस्कृति सम्मेलन’ में पढ़ा। इस सम्मेलन में उपस्थित सम्पूर्ण देश के इतिहास एवं संस्कृति के लगभग दो सौ विद्वानों ने इस शोध-पत्र की भूरि-भूरि प्रशंसा की थी। इस सम्मेलन का उद्घाटन तमिलनाडु के तत्कालीन शिक्षा-मंत्री श्री सी. आरंगानायगम ने किया था एवं इसकी अध्यक्षता मद्रास विश्वविद्यालय के उपकुलपति डॉ. एम. संतप्पा ने की थी। स्वयं मद्रास विश्वविद्यालय इसी शोध-पत्र पर डॉ. ओबराय को ‘डी. लिट्.’ की उपाधि देकर गौरवान्वित हुआ था।

इतिहासकार पुरुषोत्तम नागेश ओक (1917-2007) ने बिड़ला मंदिर, दिल्ली से ही उस कविता को प्राप्त किया था— इसका उल्लेख उन्होंने अपने अनेक शोध-पत्रों में किया है। डॉ. ओबराय के इसी निबन्ध के आधार पर राम साठे (1920-2006), रामस्वरूप (1920-1998), अरुण शौरी , ए. घोष, जय दुबाशी, हर्ष नारायण, अदिति चतुर्वेदी, सीताराम गोयल (1921-2003), डॉ. सतीश चन्द्र मित्तल, महेश प्रसाद, मौलवी आलिम फ़ाजि़ल, ईशदत्त शास्त्री, श्रीकृष्ण सिंह सोंढ़, आदि इतिहासकारों ने भी शोध-पत्र लिखा। स्मरण रहे, मूल कविता डॉ. ओबराय ने अपने इराक़-प्रवास के दौरान प्राप्त की थी।

‘शायर-उल्-ओकुल’ ग्रन्थ तीन भागों में विभक्त है। प्रथम भाग में प्रागैस्लामी अरबी-कवियों का जीवनवृत्त एवं उनकी कविताएँ हैं। दूसरे भाग में इस्लाम के जनक मुहम्मद साहब की वाणी से लेकर ‘बानी उमय्या वंश’ (Bani Umayyads of Damascus : 661-750) के ख़लीफ़ाओं के काल तक के कवियों की जीवनियाँ एवं उनकी रचनाएँ संकलित हैं। तीसरे भाग में ‘बानी अब्बासी वंश’ Bani Abbasids of Baghdad : 750-) के प्रारम्भ से लेकर संकलनकर्ता (अबू-अमीर अब्दुल असमई) के काल तक के कवियों की रचनाएँ संकलित हैं। प्राचीन अरबी-कविताओं का यह संग्रह वस्तुतः एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण दस्तावेज है, जो प्राचीन अरबों के जनजीवन, शिष्टाचार, मर्यादाएँ, मनोरंजन, प्रचलित प्रथाओं तथा इतिहास पर पर्याप्त प्रकाश डालता है। इसके अतिरिक्त मुख्य रूप से प्राचीनकालीन अरबों के प्रधान तीर्थ ‘मक्का’ का भी बहुत सुन्दर वर्णन किया गया है।

‘शायर-उल्-ओकुल’ की भूमिका में मक्का में प्रतिवर्ष महाशिवरात्रि के अवसर पर आयोजित होनेवाले वार्षिक मेले ‘ओकाज़’ का वर्णन है। स्मरण रहे, वर्तमान प्रचलित वार्षिक हज-यात्रा भी कोई इस्लामी-विशेषता नहीं है, बल्कि प्रागैस्लामी ‘ओकाज़’ (धार्मिक मेला) का ही परिवर्तित रूप है।
किन्तु, अरबी ‘ओकाज़’ क़ैथोलिक़-ईसाइयों के अबाध आनन्दोत्सव से भिन्न था। यह प्रतिभाशाली और विद्वान् व्यक्तियों को अरब पर समकालीन वैदिक-संस्कृति के सामाजिक, धार्मिक, राजनैतिक, साहित्यिक तथा अन्य विविध पक्षों पर वार्तालाप करने का उपयुक्त मंच प्रदान करता था। ‘शायर-उल्-ओकुल’ उल्लेख करता है कि उन वार्तालाप-वाद-विवादों में निकले हुए निष्कर्षों-निर्णयों का सम्पूर्ण अरब में व्यापक रूप से सम्मान किया जाता था। इस प्रकार, विद्वानों में परस्पर विचार-विमर्श करने एवं जनता को आध्यात्मिक शान्ति के लिए एकत्रित करने का स्थान उपलब्ध कराने की काशी-पद्धति का अनुसरण ही मक्का ने किया।

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इस मेले का मुख्य आकर्षण मक्का के मुख्य मन्दिर मक्केश्वर महादेव (अब ‘अल्-मस्जि़द-अल्-हरम्’) के प्रांगण में होनेवाला एक सारस्वत कवि-सम्मेलन था, जिसमें सम्पूर्ण अर्वस्थान से आमन्त्रित कवि काव्य-पाठ करते थे। ये कविताएँ पुरस्कृत होती थीं। सर्वप्रथम कवि की कविता को स्वर्ण-पत्र पर उत्कीर्णकर मक्केश्वर महादेव मन्दिर के परमपावन गर्भगृह में लटकाया जाता था। द्वितीय और तृतीय स्थानप्राप्त कविताओं को क्रमशः ऊँट और भेड़/बकरी के चमड़े पर निरेखितकर मन्दिर की बाहरी दीवारों पर लटकाया जाता था। इस प्रकार अरबी-साहित्य का अमूल्य संग्रह हज़ारों वर्षों से मन्दिर में एकत्र होता चला आ रहा था। यह ज्ञात नहीं है कि यह प्रथा कब प्रारम्भ हुई थी, परन्तु पैगम्बर के जन्म से 23-24 सौ वर्ष पुरानी कविताएँ उक्त मन्दिर में विद्यमान थीं।

सन् 630 में मुहम्मद साहिब की इस्लामी सेना द्वारा मक्का पर की गई चढ़ाई के समय उनकी सेना ने ये स्वर्ण-प्रशस्तियाँ लूट लीं और शेष में से अधिकांश को नष्ट कर दिया। जिस समय इन्हें लूटा जा रहा था, उस समय स्वयं मुहम्मद साहब का एक सिपहसालार-शायर— हसन-बिन्-साबिक़— ने नष्ट की जा रही कविताओं में से कुछ को अपने कब्ज़े में कर लिया। इस संग्रह में 5 स्वर्ण-पत्रों व 16 चमड़े पर निरेखित कविताएँ थीं ।

साबिक़ की तीन पीढि़यों ने उन कविताओं को सुरक्षित रखा। तीसरी पीढ़ी का उत्तराधिकारी पुरस्कृत होने की आशा से इन कविताओं को मदीने से बग़दाद, वहाँ के ख़लीफ़ा और संस्कृति के महान् संरक्षक हारून-अल् रशीद (786-809) के पास ले गया, जहाँ उसे ख़लीफ़ा के दरबारी कवि अबू-अमीर अब्दुल अस्मई ने विपुल धनराशि देकर खरीद लिया।

उन 5 स्वर्ण-पत्रों में से दो पर प्रागैस्लामी अरबी शायरों— ‘अमर इब्न-ए-हिशाम’ (?-624) और ‘लबी-बिन-ए-अख़्तब-बिन-ए-तुर्फा’ की कविताएँ उत्कीर्ण थीं। साहित्यप्रेमी हारून-अल्-रशीद ने अस्मई को ऐसी समस्त पूर्वकालीन और वर्तमान कवियों के व्यक्तित्व एवं कृतित्व को संकलित करने का आदेश दिया, जिसे अरब का विशालतम काव्य-संग्रह कहा जा सके। उसी का परिणाम है ‘शायर-उल्-ओकुल’ का संकलन।
शेष 3 पर उत्कीर्ण कविताएँ ज़र्हम बिन्तोई नामक कवि की थीं, जो मुहम्मद साहिब से 165 वर्ष पूर्व मक्का के प्राचीन ज़र्हम राजकुल में पैदा हुआ था। इस कुल के 12 शासकों ने मक्का पर 74 ई.पू. से 206 ई. तक शासन किया था—

1. जर्हम I इब्न झाला (74-44 ई.पू.)
2. अब्द जलिल इब्न जर्हम (44-14 ई.पू.)
3. जर्हम II अब्द जलिल (14-16 ई.)
4. अब्द उल्-मेदेन इब्न जर्हम (16-46)
5. थाकिला इब्न अब्द अल्-मेदेन (46-76)
6. अब्द उल्-मेस्सिह इब्न थाकिला (76-103)
7. मौधाध I अब्द उल् मेस्सिह महान् (106-136)
8. अम्र I इब्न मौधाध (136-150
9. हारिथ इब्न मौधाध (150-160
10. अम्र II इब्न ल अल्-हारिथ (160-180)
11. बिचर इब्न अल्-हारिथ 180-190)
12. मौधाध II अल-असगर (190-206 ई.)

कवि-हृदय होने के कारण स्वयं बिन्तोई को मक्का पर शासन करने का अवसर कभी प्राप्त नहीं हुआ, तथापि उसे स्मरण था कि उसके पूर्वजों के शासनकाल में ही एक समय भारतीय-सम्राट् विक्रमादित्य ने अर्वस्थान से सांस्कृतिक-राजनैतिक संबंध स्थापित किया था। इसलिए बिन्तोई ने अपनी एक कविता में विक्रमादित्य के प्रति अपनी हार्दिक कृतज्ञता व्यक्त की। राजकुल से संबंधित होते हुए भी बिन्तोई एक उच्च कोटि का कवि था। उसे ओकाज़ मेले में आयोजित होनेवाले कवि-सम्मेलन में सर्वश्रेष्ठ कविताओं के लिए प्रथम पुरस्कार लगातार तीन वर्षों तक मिला था। बिन्तोई की वे तीनों कविताएँ स्वर्ण-पत्र पर उत्कीर्ण हो वर्षों तक मक्केश्वर महादेव मन्दिर के गर्भगृह में टंगी रहीं। उन्हीं में से एक में अरब पर पितृसदृश शासन के लिए उज्जयिनी-नरेश शकारि विक्रमादित्य का यशोगान किया गया है—

‘इत्रश्शफ़ाई सनतुल बिकरमातुन फ़हलमिन क़रीमुन यर्तफ़ीहा वयोवस्सुरू ।।1।।
बिहिल्लाहायसमीमिन इला मोतक़ब्बेनरन, बिहिल्लाहा यूही क़ैद मिन होवा यफ़ख़रू।।2।।
फज़्ज़ल-आसारि नहनो ओसारिम बेज़ेहलीन, युरीदुन बिआबिन क़ज़नबिनयख़तरू।।3।।
यह सबदुन्या कनातेफ़ नातेफ़ी बिज़ेहलीन, अतदरी बिलला मसीरतुन फ़क़ेफ़ तसबहू।।4।।
क़ऊन्नी एज़ा माज़करलहदा वलहदा, अशमीमान, बुरुक़न क़द् तोलुहो वतस्तरू।।5।।
बिहिल्लाहा यकज़ी बैनना वले कुल्ले अमरेना, फ़हेया ज़ाऊना बिल अमरे बिकरमातुन।।6।।’
अर्थात्, वे लोग धन्य हैं, जो राजा विक्रमादित्य के साम्राज्य में उत्पन्न हुए, जो दानवीर, धर्मात्मा और प्रजावत्सल था ।।1।। उस समय हमारा देश (अरब) ईश्वर को भूलकर इन्द्रिय-सुख में लिप्त था। छल-कपट को ही हमलोगों ने सबसे बड़ा गुण मान रखा था। हमारे सम्पूर्ण देश पर अज्ञानता ने अन्धकार फैला रखा था।।2।। जिस प्रकार कोई बकरी का बच्चा किसी भेडि़ए के चंगुल में फँसकर छटपटाता है, छूट नहीं सकता, उसी प्रकार हमारी मूर्ख जाति मूर्खता के पंजे में फँसी हुई थी।।3।। अज्ञानता के कारण हम संसार के व्यवहार को भूल चुके थे, सारे देश में अमावस्या की रात्रि की तरह अन्धकार फैला हुआ था। परन्तु अब जो ज्ञान का प्रातःकालीन प्रकाश दिखाई देता है, यह कैसे हुआ?।।4।। यह उसी धर्मात्मा राजा की कृपा है, जिन्होंने हम विदेशियों को भी अपनी कृपा-दृष्टि से वंचित नहीं किया और पवित्र धर्म का सन्देश देकर अपने देश के विद्वानों को भेजा, जो हमारे देश में सूर्य की तरह चमकते थे।।5।। जिन महापुरुषों की कृपा से हमने भुलाए हुए ईश्वर और उसके पवित्र ज्ञान को समझा और सत्पथगामी हुए; वे महान् विद्वान्, राजा विक्रमादित्य की आज्ञा से हमारे देश में ज्ञान एवं नैतिकता के प्रचार के लिए आए थे।।6।।

प्रागैस्लामी अरबी-कवि बिन्तोई द्वारा सम्राट् विक्रमादित्य की प्रशंसा में रचित उपर्युक्त कविता से अरब-प्रायद्वीप से भारतवर्ष के राजनैतिक-सांस्कृतिक संबंधों का पता चलता है। यह सर्वविदित है कि भारत के उत्तर-पश्चिमी सीमा से भारत पर समय-समय पर अनेक विदेशी आक्रमण होते रहे। शकारि विक्रमादित्य ने अपनी वीरता और शौर्य का परिचय देते हुए 77 ई.पू. में कंधार व बेबीलोन को विजितकर अरब को भी विजित किया और उसे भारतीय साम्राज्य का अंग बनाया। उन्होंने वहाँ की धार्मिक तथा सांस्कृतिक परम्पराओं का सम्मान करते हुए वहाँ अनेक सुधार किए। भारतीय विद्वानों को वहाँ भेजकर ज्ञान का दीपक जलाया। उन विद्वानों ने वहाँ भारतीय संस्कृति का प्रसार किया। इसलिए विक्रमादित्य का सम्मान एक विजेता के रूप में न होकर एक तारणहार के रूप में हुआ। अर्वों, पारसियों, कुर्द, हूणों तथा यहूदियों ने भी विक्रमादित्य का सम्मान किया। इससे एक बार पुनः यह सिद्ध हो जाता है कि वैदिक-सभ्यता ज्ञान के प्रसार के लिए थी। इसका ध्येय यह कभी नहीं था कि धर्म के नाम पर अत्याचार किए जाएँ।

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सम्राट् विक्रमादित्य महाकाल के परम भक्त थे। उन्होंने अरब की धार्मिक-सांस्कृतिक राजधानी मक्का में महादेव के मन्दिर का पुनर्निर्माण कराया। इसके अतिरिक्त 360 मन्दिर स्थापित किए। उन्होंने बेबीलोन, फ़ारस एवं अनातोलिया में भी कई मन्दिर स्थापित किए, शिक्षा का प्रसार किया। अनातोलिया के एक व्यक्ति को वहाँ का राज्यपाल बनाकर वह उज्जयिनी लौटे। लेकिन लगभग चालीस वर्ष बाद ही, अर्थात् 33 ई.पू. में रोमन साम्राज्य ने अन्तोलिया पर आक्रमण किया, जिससे उसपर वैदिक प्रभाव कम हो गया । अभी हाल ही में कुवैत में स्वर्ण-पॉलिश की हुई गणेश जी की एक प्रतिमा वहाँ के पुरातत्त्व विभाग ने प्राप्त की है, जो निश्चय ही हिंदुस्थान के साथ अर्वस्थान के दृढ़ संबंधों की हमारी मान्यता को पुष्ट करती है।

‘शायर-उल्-ओकुल’ की एक अन्य महत्त्वपूर्ण एवं रहस्योद्घाटनकारी कविता अरब के महाकवि और भगवान् महादेव के परम भक्त ‘अमर-इब्न हिशाम’ की है, जिन्हें उनके समकालीन व्यक्ति सम्मानपूर्वक ‘अबूल हक़म’ (ज्ञान का पिता) कहकर पुकारते थे। हिशाम मक्का के एक प्रसिद्ध नेता थे, जो कुरैशी वंश के ‘बानु मखजुम’ शाखा से संबंध रखते थे। इस दृष्टि से हिशाम, मुहम्मद साहब के चाचा लगते थे, यद्यपि वह उनके सगे चाचा नहीं थे। हिशाम ने मक्का के इस्लामीकरण के समय इस्लाम स्वीकार करने से इनकार कर दिया था, अतः मुसलमान द्वेषवश उन्हें ‘अबू ज़हाल’ (अज्ञान का पिता) कहते थे। हिशाम के पुत्र इकरिमाह इब्न अबि-जहाल ने सन् 630 ई. में इस्लाम स्वीकार कर लिया और वह प्रारम्भिक इस्लामी राज्य का महत्त्वपूर्ण नेता हुआ। हिशाम हिंदू-धर्म को बचाने के लिए लड़े गए बद्र के युद्ध (17 मार्च, 624 ई.) में उन मुसलमानों के हाथों शहीद हुए जो सभी ग़ैर-इस्लामी चिह्नों को मिटा देना चाहते थे। इस महाकवि ने मक्का के कुलदेवता मक्केश्वर महादेव और पवित्र भारतभूमि के लिए कविता लिखी थी, जो मक्का के वार्षिक ओकाज़ मेले में प्रथम पुरस्कृत होकर काबा देवालय के भीतर स्वर्णाक्षरों में उत्कीर्ण होकर टंगी थी—

‘कफ़विनक़ जि़क़रा मिन उलुमिन तब असेरू।
क़लुवन अमातातुल हवा तज़क्क़रू ।।1।।
न तज़ख़ेरोहा उड़न एललवदए लिलवरा।
वलुकएने ज़ातल्लाहे औम तब असेरू।।2।।
व अहालोलहा अज़हू अरामीमन महादेव ओ।
मनोज़ेल इलमुद्दीने मीनहुम व सयत्तरू।।3।।
व सहबी के याम फ़ीम क़ामिल हिंदे यौग़न।
व यकुलून न लातहज़न फ़इन्नक़ तवज़्ज़रू।।4।।
मअस्सयरे अख़्लाक़न हसनन कुल्लहूम।
नजुमुन अज़ा अत सुम्मा ग़बुल हिंदू।।5।।’
अर्थात्, वह मनुष्य, जिसने अपना जीवन पाप और अधर्म में बिताया हो; काम-क्रोध में अपना यौवन नष्ट कर लिया हो।।1।। यदि अन्त में उसे पश्चाताप हो और वह भलाई के मार्ग पर लौटना चाहे तो क्या उसका कल्याण हो सकता है?।।2।। हाँ, यदि वह एक बार भी सच्चे हृदय से महादेव की आराधना करे, तो वह धर्म-मार्ग पर परम पद को प्राप्त कर सकता है।।3।। हे प्रभु ! मेरा समस्त जीवन लेकर केवल एक दिन हिंद (भारत) में निवास के लिए दे दो, क्योंकि उस पवित्र भूमि पर पहुँचकर मनुष्य आध्यात्मिकतः मुक्त हो जाता है।।4।। वहाँ की यात्रा से सत्कर्म के गुणों की प्राप्ति होती है और आदर्श हिंदू-गुरुजनों का सत्संग मिलता है।।5।।

प्रागैस्लामी अरबी-कवि अमर इब्न हिशाम की उपर्युक्त कविता से अनेक महत्त्वपूर्ण निष्कर्ष निकलते हैं। सर्वप्रथम, हमारी यह मान्यता और भी पुष्ट हुई है कि भगवान् महादेव समस्त अर्वस्थान में परमपूज्य देवता के रूप में प्रतिष्ठित थे। दूसरा, उपर्युक्त कविता में ‘हिंद’ (भारत) और ‘हिंदू’ शब्द अरबवासियों के लिए वरदानस्वरूप बताया गया है। प्रागैस्लामी युग में अरबवासी भारतभूमि को ‘हिंद’ कहते थे और उसकी यात्रा के लिए अत्यन्त उत्सुक रहा करते थे। हिंद के प्रति अरबों में इतना श्रद्धाभाव था कि अरबवासी प्रायः अपनी बेटियों के नाम ‘हिंद’ रखते थे। प्रागैस्लामी अर्वस्थान में ‘हिंद-बिन-उतबाह’ (छठी शती के अन्त और सातवीं शती के प्रारम्भ में) नामक एक प्रभावशाली महिला हुई, जिसने मुहम्मद साहब के विचारों का विरोध किया थ । इस कारण इस्लामी इतिहास में वह कुख्यात है। स्वयं मुहम्मद साहब की एक पत्नी का नाम भी हिंद (पूरा नाम ‘उम्म सलमा हिंद बिन्त अबी उम्मैया’: 580?-680) इनके अतिरिक्त अर्वस्थान में हिंद नामवाली कई महिलाएँ हुईं। अरबवासी भारतीय ऋषि-मुनियों, चिन्तकों, वेदांतियों, विद्वानों तथा द्रष्टाओं को अपना मार्गदर्शक मानते थे । उन्हीं के चरणों में बैठकर अरबों ने सभ्यता का प्रथम पाठ सीखा।

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उसी प्राचीन अरबी काव्य-संग्रह ‘शायर-उल्-ओकुल’ में एक अन्य महत्त्वपूर्ण कविता है। इस कविता का रचयिता ‘लबी-बिन-ए-अख़्तर-बिन-ए-तुर्फा’ है। यह मुहम्मद साहब से लगभग 2300 वर्ष पूर्व (18वीं शती ई.पू.) हुआ था । इतने लम्बे समय पूर्व भी लबी ने वेदों की अनूठी काव्यमय प्रशंसा की है तथा प्रत्येक वेद का अलग-अलग नामोच्चार किया है—

‘अया मुबारेक़ल अरज़ युशैये नोहा मीनार हिंद-ए।
वा अरादकल्लाह मज़्योनेफ़ेल जि़करतुन।।1।।
वहलतज़ल्लीयतुन ऐनाने सहबी अरवे अतुन जि़करा।
वहाज़ेही योनज़्ज़ेलुर्रसूल बिनल हिंदतुन।।2।।
यकूलूनल्लहः या अहलल अरज़ आलमीन फुल्लहुम।
फ़त्तेवेऊ जि़करतुल वेद हुक्कुन मानम योनज़्वेलतुन।।3।।
वहोवा आलमुस्साम वल यजुरम्निल्लाहे तनजीलन।
फ़ए नोमा या अरवीयो मुत्तवेअन मेवसीरीयोनज़ातुन।।4।।
ज़इसनैन हुमारिक अतर नासेहीन का-अ-ख़ुबातुन ।
व असनात अलाऊढ़न व होवा मश-ए-रतुन।।5।।’
अर्थात्, हे हिंद (भारत) की पुण्यभूमि! तू धन्य है, क्योंकि ईश्वर ने अपने ज्ञान के लिए तुझे चुना।।1।। वह ईश्वर का ज्ञान प्रकाश जो चार प्रकाश-स्तम्भों (चार वेद) सदृश सम्पूर्ण जगत् को प्रकाशित करता है। यह भारतवर्ष में ऋषियों द्वारा चार रूप में प्रकट हुए।।2।। और परमात्मा समस्त संसार के मनुष्यों को आज्ञा देता है कि वेद, जो मेरे ज्ञान हैं, इनके अनुसार आचरण करो।।3।। वे ज्ञान के भण्डार ‘साम’ और ‘यजुर्’ हैं, जो ईश्वर ने प्रदान किये। इसलिए हे मेरे भाइयो! इनको मानो, क्योंकि ये हमें मोक्ष का मार्ग बताते हैं।।4।। और इनमें से ‘ऋक्’ और ‘अथर्व हैं, जो हमें भ्रातृत्व की शिक्षा देते हैं, और जो इनकी शरण में आ गया, वह कभी अंधकार को प्राप्त नहीं होता।।5।।

अठारह सौ ई.पू. एक अरबी-कवि द्वारा रचित वेदों के नामोल्लेखवाली कविता, क्या वेदों की प्राचीनता, उनकी श्रेष्ठता व हिंदुओं के अंतरराष्ट्रीय प्रसार को सिद्ध नहीं करती? क्या यह कविता उन तथाकथित इतिहासकारों को तमाचा नहीं लगाती, जो वेदों को 1500-1200 ई.पू. के अत्यन्त संकुचित दायरे में ठूँसते रहे हैं? इस विषय पर निष्पक्षतापूर्वक शोधाध्ययन की आवश्यकता है।

इस कविता के सन्दर्भ में एक और तथ्य महत्त्वपूर्ण है। इस कविता के रचयिता ‘लबी-बिन-ए-अख़्तर-बिन-ए-तुर्फा’ का नाम किसी व्यक्ति का अपनी तीसरी पीढ़ी तक परिचय देने की संस्कृत-पद्धति का स्मरण कराता है। भारतीय विवाहों तथा अन्य महत्त्वपूर्ण धार्मिक कर्मकाण्डों में पूजा करनेवाले व्यक्ति का नामोल्लेख अमुक का पुत्र व अमुक का पौत्र कहकर ही किया जाता है। अभिलेखों में राजाओं के परिचय में उनकी तीन पीढि़यों के नाम देने की प्रथा बारहवीं शती तक प्रचलित रही है। भारतीय संस्कृति में पले होने के कारण अरबों ने भी किसी व्यक्ति को उनके पिता व पितामह के सन्दर्भ में कहने की पद्धति को अपना लिया। ‘बिन’, ‘का बेटा’ का द्योतक है। इस प्रकार लबी ‘अख़्तर’ का पुत्र था और अख़्तर ‘तुर्फा’ का।
ये तो उदाहरणमात्र हैं। इस प्रकार की 64 कविताएँ अबतक प्राप्त हुई हैं, जिनमें ऐसी ही चमत्कारी बातों का वर्णन है। इन कविताओं से यह पूर्णतया सिद्ध हो जाता है कि प्रागैस्लामी अरबवासी हिंदू-धर्म को माननेवाले तथा आर्य-सभ्यता के पक्के अनुयायी थे।

उक्त तथ्य के आलोक में यह धारणा भी निर्मूल सिद्ध हो जाती है कि अरब लोग अपरिचितों की भाँति यदा-कदा भारत आते रहे, यहाँ की पुस्तकों का अनुवाद करते रहे और यहाँ की कला एवं विज्ञान के कुछ रूपों को अनायास ही धारण करके उन्हें अपने देशों में प्रचलित करते रहे। बहुविध ज्ञान यदा-कदा यात्रा करनेवालों को कभी भी प्राप्त नहीं हो सकता। पाण्डित्य के लिए गम्भीर अध्ययन, निष्ठापूर्वक प्रयत्नों तथा ध्यानपूर्वक बनाई गई योजना की आवश्यकता होती है।

साभार: गुंजन अग्रवाल

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