वैदिक विमान- जब दुनिया ठीक से नेकर सिलना नहीं जानती थी, भारतीय ग्रंथों में सैंकडो बार वायु-मार्ग और विमान शब्द का हुआ था प्रयोग!

वैमानिक शास्त्र में मेरी जिज्ञासा थी। इसका कारण पुष्पक विमान नहीं बल्कि वामपंथी खेमे के पत्र-पत्रिकाओं व वेबसाईट पर प्रकाशित वे आलेख थे जिनमें से कुछ के शीर्षक हैं “चालीस साल पहले ही खुल गयी थी वैमानिक शास्त्र की पोल” अथवा “एक भारतीय ने विमान उडाने की कोशिश की थी, आविष्कार नहीं”। इस तरह के अन्य आलेख भी हैं जिनकी परतों को उधेडिये तो आप पायेंगे कि आरोप-प्रत्यारोप किस्म की भाषा में एक नकार है, तथ्य तो खैर मैं लाल झंडे के नीचे कही गयी बातों में कम ही तलाश करता हूँ।

द वायर में वासुदेवन मुकुंथ का एक आलेख प्रकाशित हुआ है जिसमें वे लिखते हैं “इंजीनियरों को उस भारतीय की कहानी पढ़ाई जानी चाहिए, जिसने राइट बंधुओं से आठ साल पहले हवाई जहाज उड़ाने का कारनामा कर दिखाया था, वास्तव में उस मोमबत्ती को ही बुझाने की कोशिश करने की तरह है। भारतीय श्रेष्ठता की चाहत ने उनकी आंखों पर इस तरह पट्टी बांध दी है कि एक भारतीय द्वारा 1895 ईस्वी में हवाई जहाज उड़ाने की बात पर उनका टेप रिकॉर्डर अटक गया है जबकि मुमकिन है कि ऐसी किसी घटना का कोई अस्तित्व ही न हो”

यहाँ यह वेबसाइट शिवकर बापूजी तलपडे का जिक्र कर रही है जिनके विषय में जानकारी मिलती है कि उन्होंने प्राचीन शस्त्रों में वर्णित विवरण को आधार बना कर एक विमान का डिजाईन तैयार किया तथा उसे आंशिक रूप से हवा में रखने में भी उन्हें सहायता प्राप्त हुई थी। इस उद्धरण में लेखक द्वारा प्रयोग किये गये मुमकिन शब्द पर जोर दीजिये। जिस बात पर आश्वस्ति नहीं है, जिसके लिये आपके समक्ष समानांतर शोध नहीं हैं, उसके लिये भी झाडने को भाषण और छापने को अखबार हैं? मुमकिन है कि द वायर कोई फर्जी वेबसाइट है या किसी एजेंडे के तहत कार्य करती है, मुमकिन है कि वासुदेवन मुकुंथ नाम का कोई व्यक्ति ही न हो, मुमकिन तो कुछ भी हो सकता है न? हर किसी की मुमकिन को ही क्या खारिज करने का आधार बनाया जाये?

वैमानिक शास्त्र की वास्तविकता क्या है? शिवकर बापूजी तलपडे भी ‘मुमकिन हैं या वास्तविकता’ इसे जानने के लिये मैंने कुछ संदर्भों को टटोला। खारिज करने वालों ने कतिपय वैज्ञानिक जैसे लगने वाले तर्क रखे हैं लेकिन वे बहुत गोलमोल हैं, आप नकार की राजनीति अथवा साजिश को उसमें से सूंघ सकते हैं। नकारशास्त्री कहते हैं कि तलपडे द्वारा निर्मित वायुयान में मरकारी वोर्टक्स इंजन का प्रयोग किया गया था। अर्थात यह मर्करी (पारे) का एक ड्रम था जो सूर्य की रौशनी के सम्पर्क में आने पर हाईड्रोजन छोडता था जिससे जहाज उपर की ओर उडता था। अब दो तरह की बाते रखी गयी हैं पहली यह कि पारा सूर्य की रौशनी के साथ किसी तरह की प्रतिक्रिया नहीं करता। यह बात काटी न जा सके इसलिये आगे जोडा गया है कि सूर्य की रोशनी से प्रेरित कुछ रासायनिक प्रक्रियाओं मे भागीदारी कर सकता है, वह ऑक्सीजन के साथ बहुत थोडी मात्रा में प्रतिक्रिया करता है (अब दो में से एक ही बात सही हो सकती है)।

रेखांकित किया गया है कि वायुयान को उडाने के लिये जिस हाईड्रोजन की बात की गयी है वह आया कहाँ से? इस पूरे विवरण में ध्यान देने योग्य बात है कि हम किसी हवन-मंत्र की बात नहीं कर रहे हैं। एक शोधार्थी ने किसी प्राचीन ग्रंथ की सहायता से प्रयोग किया और दावा है कि पंद्रह सौ फीट की ऊँचाई तक वह अपने बनाये विमान को उडाने में कामयाब हो गया था। प्रयोक्ता द्वारा उद्धरित ग्रंथ विमान उसकी संरचना की जानकारी देता है, सम्बंधित रासायनों की जानकारी प्रदान करता है। शिवकर बापूजी तलपडे ने ग्रंथ में दिये गये विवरणों को आधारित कर डिजाईन तैयार किया, अपना यंत्र बनाया, अपने प्रयोग किये यहाँ तक कि कालांतर में ‘प्राचीन विमान कला का शोध’ नाम से एक पुस्तक भी लिखी। उन्होंने जब अपना विमान उडाया तब उसे देखने वाले कुछ प्रत्यक्षदर्शी भी थे। विमान कुछ देर हवा में रह कर जमीन पर गिरा और टूट गया तथापि क्या इस प्रयास को असफल कहा जाना चाहिये? दि वायर में यह लेख निर्णय भी दे देता है कि “इन और दूसरी कहानियों को पूरी तरह से खारिज किया जा चुका है- खासकर पश्चिम की वैज्ञानिक परंपराओं के द्वारा।” पश्चिम की वैज्ञानिक परम्परायें खारिज और वाजिब के सार्टिफिकेट बांटती ही रहती हैं, आपने अपनी ही पुस्तकों पर कितना शोध किया?

गहरे पानी उतरिये तो ज्ञात होगा कि वैमानिक शास्त्र वह अकेला ग्रंथ नहीं है जो विमान की संकल्पना, उसके प्रकार एवं प्रक्रिया प्रस्तुत करता था। शिवकर बापूजी तलपडे के प्राथमिक शोध का आधार ऋग्वेद एवं यजुर्वेद के भाष्य ग्रंथ थे। जब तलपडे को यह विश्वास हो गया कि अपने प्रयोगों में वे महत्वपूर्ण सफलता अर्जित कर सकते हैं तब उन्होंने राजा-रजवाडों और ब्रिटिश सरकार से अपने शोध में सहायता की अपेक्षा की। साम्राज्यवादी ब्रिटेन की सरकार और उसके अधीन आने वाले राजे रजवाडे अपने उपनिवेश के किसी शोधार्थी को सहायता क्यों प्रदान करते? उन्हें उपयुक्त आर्थिक मदद कहीं से प्राप्त नहीं हुई। इसके बाद भी वे निजी प्रयास करते रहे तथा जीवन के अंतिम दिनों में ‘मरुत्सखा’ नाम के एक विमान का निर्माण करने की कोशिश में थे, यद्यपि उनका दूसरा प्रयास सफल नहीं हो सका।

एक आलेख में वर्तमान के किसी शोध का हवाला दिया गया जो कथित रूप से चालीस वर्ष पूर्व हुआ था। मैं शोधार्थी पर प्रश्न नहीं उठा रहा लेकिन अगस्त्य के एक श्लोक से विद्युत उत्पन्न करने की प्रक्रिया का स्मरण यहाँ हो आता है। श्लोक पर शोध करने वालों ने शिखिग्रीवा शब्द का अर्थ मोर की गर्दन लगाया था जबकि नीला थोथा प्रयोग किया जाना था। हम इतना भी आगे नहीं बढ गये कि हजारो साल पहले लिखी गयी पंक्तियो के सही अनुवाद करने में सक्षम हों। तलपडे के विमान यंत्र में हाईड्रोजन कैसे उत्पन्न हुआ इसके लिये आज हम किसी “शिखिग्रीवा” में अटक गये होंगे और हमारी झेंप मिटाने का प्रगतिशील तरीका है खारिज करो।

वैमानिक शास्त्र को खारिज करने वालों ने बिना संदर्भ यह घोषित किया कि यह ग्रंथ भारद्वाज ऋषि द्वारा नहीं अपितु सुब्बाराया शास्त्री स्वारा 1900 के आसपास लिखा गया है। चलिये सारे तर्क-कुतर्क को मान लिया जाये तब भी राइट बंधु ने पहला जहाज 1903 में उडाया जबकि तलपडे का प्रयास 1895 का है अर्थात लगभग एक दशक पूर्व। इसका अर्थ यह भी है कि उन्होंने विमान निर्माण और उसकी प्रक्रियाओं का जो अनुसरण किया वे ग्रंथ और भी पुरातन थे। वैमानिक शास्त्र कब किखा गया इसपर बहस इतिहासकारों का विषय है तथापि उपलब्ध ग्रंथ (सौभाग्य से पीडीएफ के रूप में यह इंटरनेट पर भी उपलब्ध है) में विमान बनाने के सैंकडो सिद्धांत प्रतिपादित किये गये हैं (अगले आलेखों में हम इस ग्रंथ पर स-विस्तार चर्चा करेंगे)।

राइट बंधु ने पहला विमान उडाया इस मान्यता से किसी को इनकार नहीं क्योंकि जो घटनाक्रम दस्तावेजीकृत हुआ वही प्रामाणित है। इसके बाद भी हम नकारना क्यों चाहते हैं कि विमान की संकल्पना ही नहीं उसके निर्माण के विशुद्ध भारतीय प्रयासों पर इक्का-दुक्का ग्रंथ नहीं अपितु पूरी परम्परा ही मौजूद जान पडती है। हमारी कृतियों के पुन: अनुवाद, पठन-पाठन अथवा उनपर शोध के प्रति भद्दे तरीके का इनकार क्यों है? स्वयं पर कथित रूप से प्रगतिशील होने का लेबल लगाने वाले लोग प्राचीन अंवेषणों से कन्नी काट कर क्यों निकल जाना चाहते हैं? जब दुनिया ठीक से नेकर सिलना नहीं जानती थी उस दौर के ग्रंथों में सैंकडो बार वायु-मार्ग और विमान शब्द का प्रयोग हुआ है, क्यों?

जब कथित रूप से वर्तमान को ज्ञात पहला विमान आकाश में उडा भी नहीं था उससे पहले वैमानिकी पर लिखे गये पाँच हजार श्लोकों को बिना विषद अध्ययन के कपोलकल्पना कहने वाले व्यक्तियों को नहीं उनकी विचारधाराओं को समझिये तो सभी उत्तर स्वत: सामने आ जायेंगे। हमे राइट बंधु ही पढने चाहिये लेकिन भारत की नयी पीढी को अपना वैमानिक शास्त्र भी जानना-समझना चाहिये। उडान की किसी कपोल कल्पना को ही अमेरिका में साकार किया गया था और तब विमान बने।

यह ठीक है कि जब तक प्राचीन ग्रंथों में दिये गये प्रयोगों को निष्कर्ष तक नहीं पहुँचाया जाता उसे वैज्ञानिक मान्यता नहीं दी जा सकती। तथापि ये कथित कल्पनायें और प्रयास क्या भारतीय विज्ञान विकास के गौरवशाली इतिहास का पृष्ठ नहीं हैं? खारिज-खारिज का खेल मत खेलिये आपकी अभिरुचि दास कैपिटल में है तो वही पढिये तथा पुरानी पुस्तकों को बिना अपनी खोखली और हास्यास्पद टिप्पणियों के किसी शिवकर बापूजी तलपडे के लिये छोड दीजिये। हम मंगल पर पहुँच गये हैं अत: प्राचीन वैमानिकी आज वैसे भी अप्रासंगिक है तथापि वह किसी अध्येता के लिये संदर्भ क्यों नहीं बनायी जा सकती? मेरा तो कहना है कि एक बार के लिये ही चरक से ले कर अर्यभट्ट तक और आयुर्वैदिक ग्रंथों से ले कर वैमानिक शास्त्र तक सब कुछ किसी गड्ढे में दबा ही दें और औरंगजेब बन जायें। कल्पनाजीवी लोगों का देश था भारत, यही सही…जाने भी दो यारो। क्रमशः…

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Rajeev Ranjan Prasad

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राजीव रंजन प्रसाद ने स्नात्कोत्तर (भूविज्ञान), एम.टेक (सुदूर संवेदन), पर्यावरण प्रबन्धन एवं सतत विकास में स्नात्कोत्तर डिप्लोमा की डिग्रियाँ हासिल की हैं। राजीव, 1982 से लेखनरत हैं। इन्होंने कविता, कहानी, निबन्ध, रिपोर्ताज, यात्रावृतांत, समालोचना के अलावा नाटक लेखन भी किया है साथ ही अनेकों तकनीकी तथा साहित्यिक संग्रहों में रचना सहयोग प्रदान किया है। राजीव की रचनायें अनेकों पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं तथा आकाशवाणी जगदलपुर से प्रसारित हुई हैं। इन्होंने अव्यावसायिक लघु-पत्रिका "प्रतिध्वनि" का 1991 तक सम्पादन किया था। लेखक ने 1989-1992 तक ईप्टा से जुड कर बैलाडिला क्षेत्र में अनेकों नाटकों में अभिनय किया है। 1995 - 2001 के दौरान उनके निर्देशित चर्चित नाटकों में किसके हाँथ लगाम, खबरदार-एक दिन, और सुबह हो गयी, अश्वत्थामाओं के युग में आदि प्रमुख हैं। राजीव की अब तक प्रकाशित पुस्तकें हैं - आमचो बस्तर (उपन्यास), ढोलकल (उपन्यास), बस्तर – 1857 (उपन्यास), बस्तरनामा (विमर्श), दंतक्षेत्र (विमर्श), बस्तर के जननायक (शोध आलेखों का संकलन), मौन मगध में (यात्रा वृतांत), मैं फिर लौटूंगा अश्वत्थामा (यात्रा वृतांत), बस्तर- पर्यटन और संभावनायें (पर्यटन विषयक), तू मछली को नहीं जानती (कविता संग्रह), प्रगतिशील कृषि के स्वर्णाक्षर – डॉ. नारायण चावड़ा (जीवनी/ कृषि शोध), खण्डहर (नाटक)। राजीव को महामहिम राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी द्वारा कृति “मौन मगध में” के लिये इन्दिरागाँधी राजभाषा पुरस्कार (वर्ष 2014) प्राप्त हुआ है। उनकी कृति “बस्तरनामा” को पर्यटन मंत्रालय के प्रतिष्ठित राहुल सांकृत्यायन पुरस्कार के लिये चयनित किया गया है। अन्य पुरस्कारों/सम्मानों में संगवारी सम्मान 2013, प्रवक्ता सम्मान (2014), साहित्यसेवी सम्मान (2015) मिनीमाताअ सम्मान (2016) आदि प्रमुख हैं।

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