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शहला राशिद जैसी वामी-कांगी ‘बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ’ नारे का उपयोग बलात्कार के लिए करती हैं, तो एक मां ने इसका लाभ आईएएस बनने के लिए उठाया! नजरिए का फर्क!

‘बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ’ एक नारा नहीं बल्कि वह सूत्र वाक्य है जो हमारी सामाजिक संरचना को मजबूत करता है। वैसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब ‘बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ’ का सूत्र वाक्य गढ़ा, तो कइयों ने उनका मजाक उड़ाया। खासकर वैचारिक विरोधियों ने। शहला राशिद जैसे कांग्रेस समर्थक वामपंथियों ने तो बलात्कार के मामले में मोदी के ही खिलाफ इसका उपयोग किया। वामपंथी और कांग्रेस वाले इस सामाजिक संरचना के सूत्र वाक्य को नारा ही मानते हैं। लेकिन हाल ही देश की सबसे प्रतिष्ठित और कठिन UPSC की परीक्षा में दूसरा स्थान प्राप्त कर हरियाणा की बेटी अनु कुमारी ने यह साबित कर दिया कि ‘बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ’ सामाजिक सुदृढ़ता का सूत्र वाक्य ही है।

मुख्य बिंदु

* हरियाणा के सोनीपत की रहने वाली अनू कुमारी बेटी ‘बचाओ बेटी पढ़ाओ’ को सूत्र वाक्य मानती है
* बलात्कार की बढ़ रही घटनाओं के लिए देश की संस्कृति को दोष देना एक भ्रामक प्रचार है

अपने एक साक्षात्कार में उन्होंने स्वीकार किया है कि प्रधानमंत्री के इस सूत्र वाक्य का उस हरियाण समेत पूरे देश में जमीनी स्तर पर क्या प्रभाव पड़ा है। जो हरियाणा प्रदेश पितृसतात्मक समाज के लिए कुख्यात है, जहां पर अभी भी महिलाओं के अधिकार खाप पंचायत के हां और ना से तय होते हैं। हरियाणा के सोनीपत की रहने वाली अनु कुमारी ने जहां अपनी नारी शक्ति के माध्यम से ताकतवर भारत की छवि पेश की है वहीं ‘बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ’ की सांदर्भिकता को भी परिलक्षित किया है। वहीं हमारे देश में एक धारा वामपंथियों की ऐसी भी बह रही है जो हमारी सांस्कृतिक परिवेश को ही कलंकित करने पर उतारू है। उन्होंने तो देश में बढ़ रही बलात्कार की घटनाओं के लिए भारतीय संस्कृति को ही दोषी ठहरा दिया है। वो भी बिना शोधपरक तथ्य के।

दिल्ली में निर्भया के साथ जो निंदनीय घृणित घटना घटी, क्या उन जैसी घृणित कुछ घटनाओं के आधार पर पूरे देश को बदनाम करना उचित होगा? दुर्भाग्य से हमारे देश में यही हो रहा है। टाइम्स ऑफ इंडिया ने तो अपने वैचारिक पेज पर ‘No country for young women’ (युवा महिलाओं के लिए यह देश नहीं है) नाम से एक आलेख ही छाप दिया। जब कि ना तो यह तथ्यात्मक रूप से ना ही विश्लेषणात्मक रूप से सही है। इससे उलट समस्या की असली वजह समझने में बाधा उत्पन्ना करता इसके साथ ही समस्या के समाधान के प्रयास से भी रोकता है। जबकि सच्चाई ये है सामाजिक फिसलन के मापदंड पर कई देशों की तुलना में हमारा देश अभी भी बेहतर स्थिति में है।

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ऐसा भी नहीं है कि दुनिया में निर्भया जैसी घृणित घटनाएं नहीं होती हैं। टैक्सास में घटी घटना को अभी बहुत दिन भी नहीं हुआ, जहां क्लीवलैंड हाईस्कूल बोर्ड के एक सदस्य के 21 वर्षीय बेटे समेत 18 लोगों ने 11 साल की नाबालिग लड़की से घंटों सामूहिक दुष्कर्म किया। इस घटना में उस स्कूल के पांच छात्र भी शामिल थे। इस घटना का खुलासा तब हुआ जब स्कूल के ही एक छात्र ने अपने टीचर से उस वीडियो के वाइरल होने के बारे में बताया, जो रेप के दौरान शूट किया गया था। कहने का तात्पर्य यही कि ऐसी घटनाओं का एमएमएस बनना सिर्फ हमारे देश में होता है, यह एक दुष्प्रचार है।

दूसरा तर्क दिया जाता है कि हम गर्भ में ही बच्ची को मार देते हैं, पैदा होने पर मार देते हैं, यहां तक कि बड़ी होने पर मार देते हैं जिसके कारण लिंगानुपात घटा है और इसी घटते लिंगानुपात के कारण हमारे देश में बलात्कार की घटनाएं बढ़ी हैं। जबकि यह तर्क भी तथ्य आधारित नहीं है। आपको पता होना चाहिए कि अमेरिका में लिंगानुपात प्रति लड़का एक से अधिक लड़कियां है। फिर भी वहां पर बलात्कार की घटनाएं काफी घट रही हैं।

इससे स्पष्ट है कि तथ्य और तर्क दोनों ही दृष्टि से हमारी संस्कृति इसके लिए जिम्मेदार नहीं है। इसके बावजूद वामपंथी विचारधारा के लोग देश को बदनाम करने पर तुले हैं। जहां वामपंथी विचार की शहला राशिद जैसी महिला देश की संस्कृति को बदनाम करने के लिए ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ के नारे का उपयोग करती है जबकि चार साल की बेटी की मां अनु कुमारी जैसी महिला खुद को और समाज सशक्त करने के लिए इस सूत्र वाक्य से प्रेरणा लेती हैं।

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