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Movie Review: घटनाओं के गलत चित्रण के कारण अरब देशों ने फिल्म प्रतिबंधित की

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विपुल रेगे। ऐसा प्रतीत हो रहा है कि अक्षय कुमार अपनी गिरती साख के किले को टिकाए रखने में सफल हो गए हैं। बेलबॉटम वह फिल्म है जो अक्षय को तात्कालिक राहत दे सकती है किन्तु ये उनके ढहते कॅरियर को ऑक्सीजन देने वाली फिल्म है, ये सोचना भी गलत है। थियेटर्स में प्रदर्शित हुई बेलबॉटम को दर्शकों की ओर से ठीकठाक रिस्पॉन्स मिलता दिख रहा है। हालांकि पहले दिन फिल्म मुश्किल से तीन करोड़ अर्जित कर सकी है। ये कलेक्शन अक्षय कुमार की बॉक्स ऑफिस वेल्यू को देखते हुए नगण्य ही कहा जा सकता है।

हमारे देश में सच्ची घटनाओं में घालमेल कर फिल्म बनाने को लेकर सरकार और न्यायालय कभी संज्ञान नहीं लेती। यहाँ तक कि शिकायत करने पर भी सरकार और न्यायालय का मौन समर्थन फिल्म उद्योग को ही होता है। बेलबॉटम को लेकर नया समाचार ये है कि इसकी कहानी में घालमेल का आरोप लगा दिया गया है। सन 1984 के अपहरण कांड की घटनाओं से प्रेरित होकर फिल्म बनाई गई है।

आदत से मज़बूर बॉलीवुड ने एक वास्तविक घटना में तथ्यों का घालमेल किया है। इस कारण अरब, कतर और कुवैत की सरकारों ने संज्ञान लेते हुए फिल्म को अपने देशों में प्रतिबंधित कर दिया है। वास्तविक तथ्यों के अनुसार 24 अगस्त 1984 को इंडियन एयरलाइंस के विमान का अपहरण किया गया था। 74 लोगों को लेकर निकला विमान दिल्ली से श्रीनगर के मार्ग पर था और इसे बीच में ही हाईजैक कर लिया गया था।

अपहरणकर्ता विमान को कराची से होते हुए दुबई ले गए थे। तब संयुक्त अरब अमीरात के तात्कालिक रक्षा मंत्री के हस्तक्षेप के बाद यात्रियों को रिहा किया गया था। अपितु फिल्म में घटनाक्रम में काल्पनिक मोड़ लेते हुए अक्षय कुमार के पात्र को दुबई की धरती पर अंडर कवर ऑपरेशन करते हुए दिखा दिया गया। इस कारण अरब देशों ने फिल्म प्रतिबंधित कर दी। फिल्म की कुछ बातें हैं तो अटपटी सी लगती हैं।

जैसे अक्षय कुमार का किरदार अंशुल मल्होत्रा रॉ के ऑफिस में किडनैप करके लाया जाता है। अंशुल की माँ का एक अपह्रत विमान में होना असामान्य सा लगता है। निर्देशक रंजीत तिवारी तय नहीं कर पाए कि अंशुल का कैरेक्टर देशसेवा के लिए प्रेरित हो रहा है या  माँ की हत्या का कारण उसे इस ओर लेकर आया है। फिल्म का पहला हॉफ उबाऊ होने के साथ-साथ भटकाता है।

फिल्म के दूसरे भाग में, विशेष रुप से क्लाइमैक्स में फिल्म पटरी पर लौटती है किन्तु तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। क्या अक्षय कुमार का ओवर एक्सपोज होना फिल्म के लिए घातक सिद्ध हुआ है ? ट्रेड पंडित निश्चित रुप से इस बात को स्वीकार करेंगे। अक्षय कुमार की फ़िल्में लॉकडाउन में प्रदर्शित नहीं हुई। इसकी भरपाई करने के लिए उन्होंने भयानक ढंग से विज्ञापन किये।

उन्होंने क्या नहीं बेचा, इस बात की खोज की जानी चाहिए। आप हर जगह अक्षय कुमार को देख रहे थे। टीवी पर, इंटरनेट पर, इंटरव्यू में, समाचारों पर, फेसबुक पर, ट्वीटर पर लगातार दिखाई देने से दर्शक में आपका क्रेज कम होने लगता है। जब आप सुपर सितारा बन जाते हैं तो आपको दिखने से अधिक छुपना पड़ता है, ताकि दर्शक की उत्सुकता बनी रहे। अक्षय कुमार और कब तक ऐसे किरदार करने वाले हैं।

वे जाने कितने वर्षों से अपनी फिल्मों में देश को बचाते चले आ रहे हैं। रॉ अधिकारी का किरदार तो उनको जैसे रट गया है। अब दर्शक आपको विविधतापूर्ण चरित्रों में देखना चाहता है। यही कारण है कि बेलबॉटम जैसी अच्छी फिल्म हमें प्रभावित नहीं कर पाती। कल मैं यूट्यूब पर एक रिव्यू देख रहा था।

दीक्षा शर्मा नामक उन फिल्म समीक्षक ने इस फिल्म की तुलना शेरशाह से करते हुए एक ही लाइन में इसका रिव्यू कर दिया। दीक्षा ने कहा ‘बेलबॉटम एक फिल्म है लेकिन शेरशाह एक इमोशन है।’ यही बेलबॉटम की सच्ची समीक्षा है। इसमें आपको निर्देशन मिलेगा, अभिनय मिलेगा, एक्शन मिलेगा किन्तु आत्मा आप खोजते रह जाएंगे।

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Vipul Rege

पत्रकार/ लेखक/ फिल्म समीक्षक पिछले पंद्रह साल से पत्रकारिता और लेखन के क्षेत्र में सक्रिय। दैनिक भास्कर, नईदुनिया, पत्रिका, स्वदेश में बतौर पत्रकार सेवाएं दी। सामाजिक सरोकार के अभियानों को अंजाम दिया। पर्यावरण और पानी के लिए रचनात्मक कार्य किए। सन 2007 से फिल्म समीक्षक के रूप में भी सेवाएं दी है। वर्तमान में पुस्तक लेखन, फिल्म समीक्षक और सोशल मीडिया लेखक के रूप में सक्रिय हैं।

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