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स्त्री को ‘लोहे का अंतर्वस्त्र’ पहनाने की अरबी-यूनानी प्रथा भारत की फिल्म में क्यों?

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अरब देशों में एक अत्यंत ही वहशियाना प्रथा का पालन किया जाता रहा है। इसे ‘लौसा’ कहा जाता है। अरब-यूनान में स्त्री की निष्ठा पर सहज विश्वास नहीं किया जाता। वहां प्राचीन काल से ये प्रथा प्रचलन में थी। जब शेख किसी दूसरे शहर या मुल्क जाता तो पत्नी को ‘लोहे का अंतर्वस्त्र’ पहनाता। इसे निकाला नहीं जा सकता था, क्योंकि शेख इस पर ताला लगाकर जाते थे। संभव है ये प्रथा अब भी वहां चलन में हो।

नब्बे के दशक तक तो ये क्रूर प्रथा चलन में थी। स्त्री किसी और के साथ संसर्ग न कर ले, इस कारण उसे लोहे का अंतर्वस्त्र पहनाया जाता था। लौसा प्रथा का भारत में कभी चलन नहीं रहा क्योंकि हमने स्त्रियों पर विश्वास किया। वे हमारे लिए वस्तु कभी नहीं रही। आज लौसा प्रथा का ज़िक्र इसलिए हो रहा है क्योंकि ऑल्ट बालाजी और ज़ी 5 पर प्रदर्शित वेब सीरीज ‘पौरुषपुर’ में इस प्रथा को भारतीय परिवेश में दिखाया गया है।

‘पौरुषपुर’ में कथित राज्य के राजकुमार अपनी रानियों और दसियों को ‘लौह अंतर्वस्त्र’ पहनाते दिखाए गए हैं। इस सीरीज में वहीं किया गया है, जिसका अंदेशा मैंने कुछ दिन पहले जता दिया था। भारत की दीर्घ राज-परंपरा को देखे तो ऐसे अय्याश राजा कम ही पाए गए हैं। सीरीज में भारतीय राजाओं का जो वर्णन किया गया है, वह अतिश्योक्ति पूर्ण लगता है। फिल्म निर्देशक ने लैंगिक समानता के विषय को लेकर गंदगी परोसी है।

शायद उन्हें पता नहीं है कि स्त्री समानता की बात तो हज़ारों वर्ष पूर्व ‘ऋग्वेद’ में ही लिख दी गई थी। अरब देशों की एक घिनौनी परंपरा को भारतीय परिवेश में दिखाने का क्या अर्थ हो सकता है। ये सवाल निर्देशक से कौन करेगा?

युवा दर्शक बड़ी संख्या में इस तरह की वेब सीरीज देख रहे हैं। उन पर पड़ने वाले प्रभाव की बात तो भूल ही जाइये, यहाँ तो हम इस बात पर सिर धुन रहे हैं कि सत्रह वर्ष के युवा को भारत के बारे में लगातार गलत जानकारी दी जा रही है। मीडिया में इस फिल्म को बुरी तरह लताड़ा गया है।

सोशल मीडिया पर इसकी जबर्दस्त धुनाई की जा रही है। इस तरह की प्रतिक्रियाएं एक बात तो सुनिश्चित करा रही है कि सरकार भले ही सो रही हो लेकिन जनता इस मामले में अच्छे से जागरूक हैं कि उन पर ‘सांस्कृतिक आतंकी हमले’ शुरु हो चुके हैं। ये भी एक किस्म का आतंकवाद है, जो बॉलीवुड विगत दो दशकों से चला रहा है। सुशांत सिंह राजपूत प्रकरण के बाद इस बात की पूरी आशंका थी कि ये ‘सांस्कृतिक आतंकवाद’ और तीव्र हो जाएगा।

हालांकि केंद्र सरकार या तो इस हमले से बेखबर है या उसके मंत्री इस बात की आवश्यकता नहीं समझते कि बेकाबू हुए जा रहे बॉलीवुड पर अब अंकुश लगाया जाए। सेना का अपमान, भारत की राज परंपरा के अपमान पर कार्रवाई करने के लिए इस शक्तिशाली सरकार को किस बात की प्रतीक्षा है। क्या ये सत्य नहीं है कि सन 2014 के बाद से बॉलीवुड अधिक मनमाना हो गया है।

केंद्र सरकार ने चहुँओर सफलता के झंडे गाड़ दिए हैं लेकिन मुंबई में वह झंडा गाड़ नहीं पा रही है। मनोरंजन उद्योग ड्रग्स के प्रभाव से जॉम्बीवुड हुआ जा रहा है। पौरुषपुर जैसे पागलपन इसका श्रेष्ठ उदाहरण है। अब तक मोदी सरकार ने अपने किसी मंत्री को बर्खास्त नहीं किया है। क्या अब वह समय नहीं आ गया है?

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Vipul Rege

पत्रकार/ लेखक/ फिल्म समीक्षक पिछले पंद्रह साल से पत्रकारिता और लेखन के क्षेत्र में सक्रिय। दैनिक भास्कर, नईदुनिया, पत्रिका, स्वदेश में बतौर पत्रकार सेवाएं दी। सामाजिक सरोकार के अभियानों को अंजाम दिया। पर्यावरण और पानी के लिए रचनात्मक कार्य किए। सन 2007 से फिल्म समीक्षक के रूप में भी सेवाएं दी है। वर्तमान में पुस्तक लेखन, फिल्म समीक्षक और सोशल मीडिया लेखक के रूप में सक्रिय हैं।

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1 Comment

  1. Kranti says:

    सरकार की चाटनी छोड़ के आंखे खोल के समाज को देखो चूतिये।

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