‘राममंदिर पर भाजपा का पेंटेट नही’ ! शिव सेना की ‘अयोध्या लीला’ के बाद उमा भारती के इस संदेश के मायने!



Shree Ram (File Photo)
Manish Thakur
Manish Thakur

 

 

शिवसेना प्रमुख कभी मुंबई के बाहर निकले हों इसका रिकार्ड नहीं। लेकिन जिन पूर्बियों के खिलाफ नफरत पाल कर शिवसेना ने देश में पहचान बनाई उसी पूर्बियों के गढ़ में आकर जब उद्धव ठाकरे ने अपने वजूद को बचाने की जद्दोजहद की तो ऐसा माहौल बनाया जाने लगा मानो देश में आग लग जाएगा। पूरी मीडिया ने माहौल ऐसा बनाया मानो अयोध्या जल उठेगा और उसकी तपिश पूरे देश को तबाह कर देगा। बाल ठाकरे के पुत्र शिव सेना प्रमुख उद्धव ठाकरे अपनी पत्नी और बेटे के साथ राम लला के दर्शन कर घिसकते राजनीतिक जमीन को बचाने के लिए राम की अराधना कर चले गए। मर्यादा पुरषोत्तम की धरती अपने नायक के नाम पर अभिनय करने वाले एक और कलाकार की राजनीतिक कलाकारी का गवाह बन मुस्कुराती रही।

 

शिवसेना प्रमुख राम की धरती पर आते ही यह अहंकार प्रदर्शित करने लगे कि उनकी सेना ने ही बाबरी मस्जिद सात मिनट में ढ़ाह दिया। तो सरकार को अध्यादेश लाने में चार साल से ज्यादा वक्त क्यों लग रहा ? शिवसेना प्रमुख के इस कदम को अपने मुख्य सहयोगी दल के खिलाफ विद्रोह के रुप में देखा जा रहा है। लेकिन राम मंदिर मामले की अगुआई करने वाली और मोदी सरकार की मंत्री उमा भारती ने शिव सेना के इस कदम की सराहना कर साफ किया है कि राम मंदिर भाजपा का पैटेंट नहीं। यह आवाज दूर तलक जाना चाहिए!  क्योंकि एक पार्टी की क्रेडिट लेने की होड़ और दूसरे की उससे छीन लेने की चालाकि ने ही देश के विशाल मानस के सपने को धरातल पर उतारने की राह में रोड़े लटकाए हैं।

25 प्रतिशत वोट पाकर दिल्ली में सरकार तो बनती रही लेकिन 80 से 85 प्रतिशत लोगों की चाह के बाद भी देश के सांस्कृतिक पितृपुरुष मर्यादा पुरषोत्तम राम के जन्मस्थलि अयोध्या में राम मंदिर की नींव नही पर सकी। इस देश में किसी भी राजनातिक दल की यह हैसियत नहीं वो कह सके की अयोध्या में राम मंदिर नहीं बनना चाहिए लेकिन देश बहुसंख्य आबादी की तम्मना सालों साल दरकती रही। बस इसलिए क्योंकि शिवसेना प्रमुख जो क्रेडित लेने आए थे वही सभी राजनीतिक दलों को चाहिए। जिसकी चाहत ने राम को टेंट में रहने को मजबूर कर दिया है

1992 में जब ‘बाबरी ढांचा’ ढाहा गया तो उसका पूरा क्रेडित भाजपा ले गई। आज तक ले रही है। राम का मंदिर बनने की राह में शायद राजनीतिक दलों की यही टिस बाधक है। सच यह है कि पर्दे के पीछे से प्रधानमंत्री नरसिंह राव यह संदेश देने में लगे थे कि खेल सिर्फ उनका था। नरसिंह राम यह संदेश देने में सफल नहीं रहे। इसीलिए आगे लगातार मंदिर आंदोलन में बाधक बनते रहे। वरिष्ठ पत्रकार और अयोध्या पर लंबे समय तक रिपोर्टिंग करने वाले हेमंत शर्मा ने अपनी किताब ‘युद्ध में अयोध्या’ में इसकी विस्तृत व्याख्या की है। वे तथ्यों संग व्याख्या करते हैं कि कैसे शाहबानो मामले में मुसलमानों को खुश करने के लिए सुप्रीम कोर्ट के आदेश को जब राजीव सरकार ने पलट दिया तो नाराज हिंदु वोटरों को खुश करने के लिए मंदिर का ताला खुलवा दिया। कांग्रेस सरकार ने यह फैसला इसलिए किया क्योंकि उस राम मंदिर आंदोलन की नींव भाजपा डाल चुकी थी। क्रेडिट लेने के इस शह और मात के भाजपा दो कदम और बढी। आडवाणी की रथ यात्रा से। तब तक केंद्र में भाजपा के सहयोग से वीपी सिंह की सरकार थी। वो भाजपा को यह क्रेडिट लेने नहीं देना चाहती थी। रथ यात्रा रोक दी गई। सरकार गिर गई। चंद्रशेखर प्रधानमंत्री बने ।उन्होने मंदिर बनाने का रास्ता साफ कर लिया था। हेमंत शर्मा लिखते हैं हिदुं महंतो और उल्लेमाओं की सहमती से बात आगे निकल रही थी। कांग्रेस पार्टी के सिपहसालारों को इसकी जानकारी मिली तो आनन फानन में राजीव गांधी की जासूसी के नाम पर चंद्रशेखर सरकार की बली दे दी गई। राष्ट्रीय पार्टी बनने की होड़ में लगी भाजपा केंद्र में सरकार बनाने का सपना बून रही थी लेकिन दक्षिण में राजीव गांधी की हत्या की सहाभूति लहर ने कांग्रेस को संजीवनी दे दिया। नरसिंह राव प्रधानमंत्री बन गए फिर राम मंदिर निर्माण के लिए क्रेडिट लेने और लेने की राह में बाधक बनने का खेल लगातार चल रहा है। शिव सेना प्रमुख की अयोध्या यात्रा उसी की एक कड़ी थी।

महाराष्ट्र में भाजपा द्वारा शिव सेना के गढ़ में सेंधमारी को चुनौती देने ठाकरे पुत्र उद्धव पहली बार महाराष्ट्र की सीमा लांघ कर वहां पहुंचे जहां के लोगों के खिलाफ नफरत के वजूद पर उनके पिता और उनकी पार्टी की पूरी राजनीति रही। अयोध्या में शिवसेना प्रमुख के दस्तक से खौफ इसलिए नहीं था कि मंदिर आंदोलन उग्र होगा तो हिंसा होगी। इसलिए था क्योंकि अयोध्या में, ‘शिव सेना के राजनीतिक इतिहास’ के शिकार कहीं उद्धव न हो जाए। भाजपा विरोधी पूरी जमात यही चाहती थी। ताकि क्रेडिट लेने की होड़ में भाजपा को पछाड़ दिया जाए । लेकिन अयोध्या में सब कुछ ठीक रहा। मंदिर विरोधियों के लिए यही हताशा का कारण बना। संवाददाता सम्मेलन में यह पूछे जाने पर कि सरकार अगर मंदिर नहीं बनाती तो वो क्या करेंगे! सहमे- सहमे से उद्धव ने कहा, “पहले सरकार को इस पर काम तो करने दो। ये सरकार मज़बूत है अगर ये नहीं बनाएगी तो कौन बनाएगा। अगर ये सरकार मंदिर नहीं बनाएगी तो मंदिर तो ज़रूर बनेगा लेकिन शायद ये सरकार नहीं रहेगी।”

उद्धव ने कहा, “मेरा कोई छुपा एजेंडा नहीं है. देशवासियों की भावना की वजह से आया हूं। पूरे विश्व के हिंदू राममंदिर कब बनेगा ये जानना चाहते हैं। चुनाव के दौरान सब लोग राम राम करते हैं और बाद में आराम करते हैं। महीने, साल गुजरते जा रहे हैं पीढ़ियां जा रही हैं लेकिन राम लला का मंदिर नहीं बना।”

उन्होंने कहा, “मुख्यमंत्री योगी जी ने कहा है कि मंदिर जहां था वहीं है और वहीं रहेगा लेकिन वो दिख नहीं रहा है। जल्द से जल्द उसका निर्माण होना चाहिए। आओ एक क़ानून बनाओ, शिवसेना हिंदुत्व पर आपका साथ दे रही थी, दे रही है। हिंदुओं की भावनाओं के साथ खिलवाड़ नहीं होना चाहिए।” उद्धव  अयोध्या आए और गए। अयोध्या में कुछ भी नहीं बदला। बस राम के भरोसे अपना वजूद बचाने के लिए राम को आश्रय देने का झंडा बुलंद करने का अभिनय कर के चले गए। दशकों से अयोध्या मंद मंद मुस्कुरा कर ऐसा अभिनय देख रही है। अयोध्या आंदोलन की नेत्री उमा का संदेश अब इस तरह के तमाम अभिनय पर विराम लगने के रुप में देखा जाना चाहिए।


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