‘दशराज्ञ महायुद्ध’- ऋग्वेद में वर्णित दुनिया का पहला युद्ध!

डा आंबेडकर ने ‘शूद्र कौन’ पुस्तक में ऋग्वेद में वर्णित दसराज्ञ युद्ध के आधार पर साबित किया है कि आर्य मूल रूप से भारत के ही निवासी थे। वह कहीं बाहर से नहीं आये थे। आज उन्हीं के नाम पर राजनीति करने वाले तथकथित दलितवादी आर्यों को जब बाहरी कहते हैं तो वह एक तरह से डा. आंबेडकर को खारिज कर विदेशी शक्तियों के हाथ में खेलने के संकेत देते हैं!

दूसरी बात, सुदास ने जब भारत वर्ष के ही दस राजाओं को हराया तो उसे क्षत्रिए जाति से निकाल दिया गया। ब्राह्मणों ने उसके वंश से उपनयन का अधिकार छीना लिया और उसे शूद्र श्रेणी मे़ डाल दिया। शूद्रों की शुरुआत यहीं से हुई। भारत मे़ कोई शूद्र नामक जाति नहीं थी। ऋग्वेद का पुरुष सुक्त बाद मे़ जोड़ा गया है। यह अंबेडकर की दूसरी मान्यता है।

आइए ऐसे बड़े दसराज्ञ युद्ध के बारे में साभार रंजन त्रिपाठी का प्रसिद्ध लेख पढ़ते हैं…

रंजय त्रिपाठी । 3400 वर्ष ईसा पूर्व भारत के उत्तरी इलाके पर जो पांच नदियों का स्थल बोला जाता था उस पर “सुदास” नामक राजा का राज्य था। इसको तृत्सु राज्य बोला जाता था। उपजाऊ भूमि, नदियों, पहाड़ों और दुधारू जानवरों के धनी इस इलाके को भारत का सबसे समृद्ध इलाका बोल जाता था। यही इलाका आज का पंजाब है। तृत्सु राज्य से सभी ईर्ष्या रखते थे राजा सुदास की पत्नी के सौतेले भाई राजा अनु ने भारत के और विदेशों के अन्य राजाओं को मिला के एक सेना तैयार किया। एक महाभीषण महायुद्ध हुआ! रावी नदी किनारे लड़े इस महायुद्ध का विस्तार से वर्णन ऋग्वेद के किताब 7, श्लोक 18 -33, अध्याय 83.4- 8 में उपलब्ध है। इस युद्ध को “दशराज्ञ महायुद्ध” कहा जाता है।

इस महायुद्ध में राजा “सुदास” ने मात्र 6500 सैनिकों के साथ, 10 राजाओं की राजा अनु के नेतृत्व में 66000 पैदल संयुक्त सेना, 20 रथ, 2000 घुड़सवार और 50 हाथियों की सेना को मात्र एक दिन में हरा दिया था। इस युद्ध में राजा अनु के साथ 6 राजाओं की पूरी सेना मारी गई। बचे 4 को अभयदान देकर राजा सोमक ने सिन्धू से 200 कोस दूर बसने की आज्ञा दी। इस युद्ध में राजा सुदास के गुरु ने उनकी सेना को परम्परिक लकड़ी और पत्थर के बने हथियार की जगह लोहे के बने तीर, भले और तलवार दिए थे जिससे शत्रु सेना को समझ नहीं आया कि ये कैसा हथियार है जो इतना छोटा लेकिन इतना मारक और एक वॉर में कई सैनिक ख़त्म हो जाते थे। सेना का भीषण रक्त संहार हुआ!

इस युद्ध में राजा अनु को विदेशों से (आज के ईरान, सीरिया, अफगानिस्तान, तुर्की, ग्रीस और यूनान) भी मदद मिली थी। इस युद्ध को राजा सोमक ने अपने कौशल के बल पर मात्र एक दिन में समाप्त कर दिया था। इस युद्ध का एक मात्र उद्देस्य था तृत्सु राज्य की सम्पदा को लूटकर राजा सुदास के परिवार और उसके नागरिकों की सामूहिक हत्या करना। सम्पदा लूटने के बाद इस इलाके पर राजा अनु राज करता और वार्षिक सम्पदा पर सबको हर वर्ष बराबरी की हिस्सेदारी देना तय था। पर इस युद्ध में राजा सुदास ने इस सामूहिक विशाल सेना को हरा के अखण्ड भारतवर्ष का नींव रखा और सुदास पहले सम्राट बने! इस युद्ध में जो अभयदान पाकर बचे वो विदेश विस्थापित हो गए और उन्होंने इस महायुद्ध, राजा सुदास के रणनीति, राजनीति और प्रजा से पाये आदर को बताया।

इस युद्ध के बाद राजा सुदास ने विश्व के पहले “स्मार्ट सिटी – हड़प्पा” की नींव डाली और इस समृद्ध राज्य पर कई वर्षों तक राज किया।

इस युध्द को जीतने के लिए राजा सुदास को रणनीति तैयार करके दिया था वशिष्ठ मुनि ने! राजा सुदास वंशज थे इक्ष्वाकु के और ये मुनि वशिष्ठ महर्षि वशिष्ठ के वंशज थे। राजा सुदास ने दस राजाओं के सम्मिलित सेना को रावि नदी के दशराज्ञ युध्द में हराया तब उसके कुछ समय बाद सुदास को तीन राजाओं से यमुना किनारे युध्द करना पड़ा। इस युध्द में फिर से सुदास विजयी हुवे। सुदास के लड़ाई का कौशल था कि वो अपने शत्रु को पहले वार करने देता था। सुदास को उसके गुरु द्वारा सीख थी कि शत्रु को हमला करने दो और उसके हमले से बचते रहो। शत्रु हमला करे तो जरूरत अनुसार भागो और खूब भागो अलग अलग टुकड़ियों में बंट कर भागो। शत्रु भी पीछे पीछे भागेगा, शत्रु को भगाते भगाते ऐसे जगह ले आओ कि वो खुद तुम्हारी टुकड़ियों के बीच में घिर जाए। जब शत्रु अपने सब चाल चल चुका हो तब अपनी चाल चलो और शत्रु को ख़त्म कर डालो।

यमुना किनारे तीन राजाओं से लड़ाई के बाद सुदास ने अपने राज्य की सीमा उत्तर में पांचाल के दोआब, गंगा किनारे और सरस्वती नदी के इलाके पर भी कब्ज़ा जमाया। सुदास को उसके गुरु ने और आगे बढ़ने की बजाय वापस जाके पश्चिम की ओर स्थापित होने को कहा। चूंकि सुदास शुरुवात में पांच नदियों के राज्य (अब का पंजाब) से पूर्व दिशा की और बढ़ा था और फिर वापस पश्चिम की ओर गया तो मैकाले के समर्थिन वाले लोग सुदास के सिंधु पार करके पूर्व की ओर बढ़ने की घटना को Aryan Invasion की थ्योरी का समर्थन करते हैं। जबकि इसके उलट जिनको आर्य बोल गया उन्होंने पंजाब के इलाके से सिंधु को पार किया और पूर्व से पश्चिम की ओर गए। जो हारे थे या फिर राजा सुदास की सरस्वती नदी से वापस पश्चिम के ओर की यात्रा।

असल में भारत की तरफ से सप्त – सिंधु को पहले पार किया गया और केंद्रीय एशिया में कबीले बने। अब पूरब से पश्चिम की ओर सिंधु पार करने को Aryan Invasion के सिद्धांत से जोड़ दिया गया। जबकि अगर Aryan Invasion के सिद्धांत को माना जाए तो हमला पश्चिम से पूर्व यानि सप्त सिंधु को पश्चिम से पूर्व की और पार करना था – जबकि हुआ ठीक इसके उलट था।
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उधर दशराज्ञ युद्ध के बाद हारे हुए राजाओं के लोग पश्चिम की ओर चले गए और इस बात के सबूत मिलते हैं कि इन लोगों ने ही पांच प्रमुख राज्यों पार्थी, पर्सियन, बलोच, पख्तून, और पिशक (कुर्द) नींव रखी। इनके अलावा इस युद्ध में हारे लोग, अन्य दुसरे लोग 16 टुकड़ियों में बंट कर अलग जगहों पर गए, इन लोगों ने 16 अन्य इलाके जिनके सबूत मिलते हैं उन्होंने सोगडियना, मार्गियना, बक्टृा, कबुलिस्तान, गज़नी, नांता, अरचोसिया, द्रणगियाना, ज़मीन, दावर और कलत-ई-गिलजय के बीच का इलाका, लुगार घाटी, काबुल और कुर्रम के बीच का इलाका, ऐरन्य, वैजेह, ईरान आदि जगहों पर ये कबीले स्थापित किये।
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राजा सुदास के बाद उसके पोते राजा सोमक को भी उन लोगों से लड़ाई लड़नी पड़ी थी क्योंकि सिंधु पार कर के कबीले में बसे लोग वापस सप्त सिंधु के इस पार के समृद्ध इलाके में आकर अधिपत्य ज़माना चाहते थे। कुछ कबीलों ने आपस में मिल कर फिर से सप्त सिंधु के इलाके पर हमला किया जिसको सुदास के पोते राजा सोमक ने उनके इलाके में ही घुस कर हराया। ये लड़ाई उस इलाके में लड़ी गयी जो आज का अफगानिस्तान है। इसको “वर्षगीर का युध्द” The Varshagira Battle” कहा जाता है। .

दशराज्ञ युद्ध के बाद- वर्षगीर का युद्ध

सुदास की विजय यात्राओं के बाद भारतवर्ष की नींव पड़ी। सम्भवतः सप्तसिंधु और आर्यवर्त विजय के बाद सुदास ने फिर से पूर्व का रुख किया था जिससे सरयू का इलाका भी उसके राज्य में शामिल हो गया था, या फिर इधर के राजाओं ने सुदास का अधिपत्य स्वीकार करके संधि कर लिया था। सुदास को अक्सर पश्चिम सीमा पर चुनौतियों का सामना करना पड़ता था। हारे हुए लोग जिन्होंने पांच राज्यों और सोलह कबीलों का नींव रखा था वो अक्सर सिंधु पार इलाकों पर दुबारा स्थापित होने और बसने की कोशिश करते थे। उनके प्रयास समझौता या शान्ति होने की जगह युद्ध होता था और वो सुदास की शक्ति और रण कौशल के आगे टिक नहीं पाते थे, जिसके चलते सुदास का सारा जीवन युद्ध करते बीता। युद्धे के कारण पश्चिमी शक्तियां ख़त्म होती चली गईं जबकि सप्तसिंधु और आर्यवर्त का सामूहिक इलाका नदियों, पहाड़ों, उपजाऊ जमीन, दुधारू पशुओं आदि के कारण मजबूत होती गईं।

चूंकि पश्चिम के इलाकों में पानी, फसल और दुधारू पशुओं का अभाव था तो कई वर्षों तक विश्थापित इन समूहों ने खुद को किसी सही जगह स्थापित होने में लगाया। ये लोग अधिकाधिक रूप से आज के ईरान, इराक के कुर्द, अफगानिस्तान, यूनान और कुछ अन्य जगहों पर जम गए। इन जगहों पर सब व्यवस्थित करने में इनको वर्षों का समय लगा। इस बीच किसी भी बड़े युद्ध का कोई वर्णन नहीं मिलता। राजा सुदास की तीसरी पीढ़ी थी राजा सोमक’!

राजा सोमक को गांधार से सन्देश प्राप्त हुआ कि पश्चिम के कबीलों ने आपस में इकठ्ठा हो कर एक सैन्य शक्ति तैयार किया है और वो गांधार को रौंदते हुए सप्तसिंधु पर कब्ज़ा जमाना चाहते हैं। सुदास के उलट सोमक ने इन कबीलाई हमलावरों को अपने क्षेत्र में न घुसने देने का तरीका अपनाया। सुदास ने अगर ये युद्ध लड़ा होता तो शायद सुदास ने उनको आराम से सप्तसिंधु पार करने दिया होता और फिर घेर के उनका विनाश किया होता।

राजा सोमक का साथ दिया राजा सहदेव और राजा राजश्व ने। इन तीनो के सम्मिलित सैनिकों ने सिंधु पार करके अफगानिस्तान की और कुछ किया। चूंकि गांधार कबीले (आज का पेशावर) के राजन ने राजा सोमक को मदद के लिए बुलाया था अतः सोमक के सैन्य बल को आराम से आगे बढ़ने का रास्ता मिला। उस समय गांधार के अंतर्गत आज का स्वात घटी, पटोहर पठार, खैबर पख्तूनख्वा और जलालाबाद आते थे।

आगे बढ़ते राजा सोमक के सैन्य बल ने कबीला गठबन्धन की सेना (जो ईरानियों और कुर्दों की अगुवाई में मिल के बनी थी) को बोलन दर्रे पर रोक लिया। बोलन दर्रे के इलाके में हुई इस लड़ाई को वर्षगिर का युद्ध कहा जाता है। ये युद्ध दो दिन चला – राजा सोमक के सैन्य बल और रण कौशल के आगे ईरानी और कुर्द गठबंधन ढेर हो गयी। वर्षगीर का युद्ध पहला और आखरी युध्द है जिसमे भारतवर्ष की सेना ने अपने इलाके से बाहर आक्रमण करके दुश्मन को हराया था। इस युद्ध के बाद सोमक चाहता तो ईरान, कुर्द आदि इलाके तक अपना अधिपत्य स्थित कर सकता था परन्तु सोमक ने हारे हुए लोगों को जाने दिया और वापस अपने राज्य में आ गया।

साभार- रंजना जी के फेसबुक वॉल से

URL: Battle of Dasarajna’ – the world’s first war in the books

Keywords: Battle of Dasarajna, maha yudh, battle of ten king, ancient history, firt war dasrajya maha yudh, दशराज्ञ युध्द, महायुद्ध, प्राचीन इतिहास, राशयज्ञ युध्द महायुद्ध, भारतीय इतिहास

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