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अपनों पर वार: गैरों से प्यार: यही है भाजपा सरकार

Sonali Misra. पश्चिम बंगाल में अभी तक भाजपा को वोट देने वाले हिन्दू भय और दहशत के साए में साँस ले रहे हैं, वह अभी तक सामान्य नहीं हो पाए हैं। जो बेचारे गरीब हिन्दू अपनी जान बचाकर असम में भाग गए थे, अब वह वापस आने का सोच भी नहीं पा रहे, जो सोच पा रहे हैं उन्हें अब अपना सामान वापस लेने के लिए तृणमूल कांग्रेस के गुंडों को जजिया चुकाना होगा।  जैसा कि पश्चिम बंगाल के राज्यपाल द्वारा भी बताया गया कि लोग कह रहे हैं कि हम धर्म परिवर्तन कर लेंगे तब तो बचेंगे?

लड़कियों को गनीमत का माल अर्थात गोनिमोतेर माल कहकर उठाने की योजना बनाई जा रही है, और वह भी क्यों? क्यों ऐसा उन बेचारे हिन्दुओं के साथ हो रहा है?  क्यों उन्हें रोज मारा जा रहा है और कलकत्ता उच्च न्यायालय केंद्र सरकार द्वारा चुनाव के उपरान्त एसआईटी के गठन के लिए इंकार कर चुका है एवं राज्य सरकार द्वारा उठाए गए क़दमों पर संतुष्टि व्यक्त कर चुका है।

परन्तु हिंसा चल रही है, कल ही एक भाजपा कार्यकर्ता की हत्या हुई है, अब व्यक्तिगत तौर पर चुन चुनकर निशाना लगाया जा रहा है। ऐसा लग रहा है जैसे भाजपा को वोट देना इन लोगों के जीवन की सबसे बड़ी विडम्बना बन गयी हो! ऐसे हिन्दुओं के लिए कोई आशा की नजर दिखाई नहीं देती है। भाजपा को जहाँ अपने वोटर्स के साथ खड़ा होना था, वहां वह और ही कुछ खेल खेल रही है।  ऐसा लग रहा है जैसे यूज़ एंड थ्रो की राजनीति की गयी हो,

मगर मजे की बात यह है कि भाजपा या संघ को अपनी पीड़ा या संघर्ष के सत्यापन का प्रमाणपत्र उनसे चाहिए होता है, जो हमेशा भाजपा के विरोध में होते हैं, जैसे रविश कुमार, जैसे एनडीटीवी।  पश्चिम बंगाल में वर्ष 2017 में संघ की ओर से पक्ष रखने वाले प्रोफ़ेसर राकेश सिन्हा पर ममता सरकार ने एफआईआर दर्ज की थी। जाहिर है विरोध हुआ, विरोध किया राष्ट्रवादी धार्मिक हिन्दुओं ने।  परन्तु केंद्र सरकार को अपने शब्दों की चाशनी में लपेटते हुए महान पत्रकार रविश कुमार ने अपने ब्लॉग पर राकेश सिन्हा के पक्ष में क्या लिख दिया, ऐसा लगा जैसे वही सबसे बड़ा समर्थन हो, जबकि शब्द क्या थे उन पर तनिक गौर फरमाना होगा:

इस लेख में राकेश सिन्हा को केंद्र सरकार को विफल ठहराने की कोशिश नज़र नहीं आई, बस नज़र आया तो अपना पक्ष! जैसे बस हमें किसी प्रकार प्रमाणपत्र मिल जाए? हिन्दुओं को कोसने वाले पत्रकार आशुतोष को भी राकेश सिन्हा ने ही अपने संस्थान इंडिया पालिसी फाउंडेशन के माध्यम से इतना अधिक मंच प्रदान किया कि वह विचारक के रूप में उभर आए और आज वह भाजपा और आरएसएस के बहाने सारे हिन्दुओं पर हमलावर रहते हैं।

परन्तु यूज़ एंड थ्रो केवल पश्चिम बंगाल में हुआ हो, ऐसा नहीं है। और न ही ऐसा है कि केवल राकेश सिन्हा ने आत्महीनता से भरा हुआ यह कार्य किया हो, ऐसा भी नहीं है, यह सूची लम्बी है और काफी लम्बी है!

भाजपा सरकार के मंत्रियों में अपने समर्थकों को यूज़ एंड थ्रो करने की एक प्रवृत्ति है। और यह आज की नहीं है। भाजपा सरकार ने हमेशा ही अपनों पर सितम और गैरों पर करम किया है। हिन्दुओं और हिंदुत्व को जमकर गाली देने वाली पत्रकार सबा नकवी की वह तस्वीर सभी को याद होगी जब मुस्कराते हुए प्रकाश जावड़ेकर “शेड्स ऑफ सैफरन” किताब को अपने हाथ में थामे है और उन्हें प्यार से थमा रही हैं हिन्दुओं से बेइन्तहा नफरत करने वाली सबा नकवी! जिन्होंने एक नहीं कई बार हिन्दुओं के प्रति अपनी घृणा का प्रदर्शन किया है।

अभी हाल ही में वह उत्तर प्रदेश सरकार के बारे में झूठी खबरें फैलाती हुई पाई गई हैं और उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनावों में सपा की जीत से गदगद हैं।  मगर सबा नकवी अपने प्रिय समाजवादी युवराज द्वारा दी गयी धमकी पर एकदम मौन हैं, जो वह भाजपा के कार्यकर्ताओं को दे रहे हैं।

सबा नकवी केवल प्रकाश जावड़ेकर से नज़दीकी दिखाती हों ऐसा नहीं हैं।  उनके यहाँ गैस खत्म होने पर पेट्रोलियम मंत्री भी खुद सिलिंडर की व्यवस्था करते हैं। और क्या चाहिए? क्या यह इनके लिए अच्छे दिन नहीं हैं।

सबा नकवी वाले मामले से आगे बढ़ते हैं और यदि हम आज देखते हैं तो हमें और भी चौंकाने वाले तथ्य नज़र आते हैं।  अब बात एक और भाजपा विरोधी पत्रकार के भाजपा के इकोसिस्टम बनने की! वह है विजय त्रिवेदी। उनके लिए दो भाजपा हैं, एक नरेंद्र मोदी रहित और एक नरन्द्र मोदी वाली।  नरेंद्र मोदी उनके लिए केवल दंगे के आरोपी हैं और उन्होंने उसी इंटरव्यू को अपनी पहचान बना लिया है।  बीबीसी पर उन्होंने इस साक्षात्कार के विषय में लिखा है:

मगर बाद में वही विजय त्रिवेदी संघ की आधिकारिक हिन्दुस्थान समाचार एजेंसी के डिजिटल प्लेटफॉर्म के सम्पादक हुए और हिन्दुस्थान समाचार का यूट्यूब चैनल भी लौंच किया। और मजे की बात यह भी है कि वह साथ ही वह हिन्दुओं को गाली देने वाले आम आदमी पार्टी के पत्रकार सदस्य आशुतोष के डिजिटल प्लेटफॉर्म सत्या के सम्पादकीय बोर्ड में हैं

यह लोग जब मर्जी हो तब इधर से उधर आ जा सकते हैं। इसे इकोसिस्टम भी नहीं कह सकते, यह उससे भी कहीं ऊपर की बात है। जब मुफ्त में काम करने की बात आती है तो ट्विटर पर मुफ्त के कार्यकर्ता जो बेचारे अपनी भावनाओं के चलते कार्य करते हैं, वह अपना नेटपैक लगाते हैं, दिन लगाते हैं परन्तु सत्ता पाने पर यह लोग किनके इशारे पर चलते हैं, यह देखा जा सकता है।

कल से दो बातों की चर्चा सबसे ज्यादा है। कथित निष्पक्ष पत्रकार एवं यौन शोषण का आरोप झेल रहे विनोद दुआ की पुत्री मल्लिका दुआ, जो न केवल भाजपा समर्थकों के मरने की दुआ मांग चुकी हैं बल्कि साथ ही पुलवामा हमले के लिए भी असंवेदनशीलता व्यक्त कर रही हैं।

अब मजे की बात यह है कि इन्हीं मल्लिका दुआ ने अपनी माँ के लिए जब किसी इंजेक्शन की मांग ट्विटर पर की, जिसमें भारत सरकार या भाजपा के किसी भी व्यक्ति को टैग नहीं किया था फिर भी केंद्र सरकार के उड्डयन मंत्री श्री हरदीप पुरी ने अपनी मदद की पेशकश की।

हालांकि इस बिन माँगी मदद पर जनता भड़क उठी और लोगों ने प्रश्न उठाने शुरू कर दिए। और भाजपा समर्थकों ने प्रश्न किए कि जब आम आदमी मरता रहता है तब तो यह मंत्री अपना फोन नहीं उठाते हैं, और जिस देश विरोधी महिला ने आपसे मदद माँगी भी नहीं, आप उसे मदद देने के लिए पहुँच गए।  एक ओर प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी वीआईपी कल्चर समाप्त करने की हर कोशिश में हैं तो दूसरी ओर हरदीप पुरी जैसे लोग भी हैं, जो वीआईपी की ही सुनते हैं और वह भी उन वीआईपी की, जिन्होनें पूरी ज़िन्दगी भाजपा को और भाजपा के बहाने पूरे हिन्दू समाज को अपशब्द कहे हैं।

यहाँ तक कि विनोद दुआ तो अस्पताल से भी प्रधानमंत्री को गाली देते हुए नज़र आ रहे हैं।

आत्महीनता की यह पराकाष्ठा है।

इतना ही नहीं विनोद दुआ की बड़ी बेटी बकुल दुआ द्वारा लिखी गयी एक हैंडबुक का प्रकाशन राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन संस्थान ने किया है। वही विनोद दुआ और वही मल्लिका दुआ!

अब चलते हैं उत्तराखंड में! उत्तराखंड में कल नए मुख्यमंत्री के मीडिया सलाहकार के पद की घोषणा हुई। और उत्तराखंड में रावत सरकार ने दिनेश मानसेरा नामक पत्रकार जिन्हें अब स्ट्रिंगर कहा जा रहा है, को अपना मीडिया सलाहकार नियुक्त किया।  दिनेश मानसेरा के कुछ पुराने ट्वीट और फेसबुक पोस्ट देखते हैं फिर आगे बढ़ते हैं:

दिनेश मानसेरा पांचजन्य से भी जुड़े हुए हैं। यह समझना कठिन है। यह समझना कठिन है कि आरएसएस का कैडर रहे प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के लिए दिनेश मानसेरा फेंकू शब्द का प्रयोग करते हैं और उसी संस्था के साथ जुड़े भी हुए हैं। जैसा उनके पुत्र का कहना है! वह कुम्भ को बदनाम करते हैं, परन्तु वह कोई आधिकारिक आंकड़ा पेश नहीं करते कि कुम्भ के कारण कितना कोरोना फैला? उनकी पूरी प्रोफाइल जांचने के बाद कहीं से भी ऐसा प्रतीत नहीं होता है कि उन्होंने तथ्यपरक कोई इस विषय में अध्ययन किया है।  या हाल फिलहाल में मुद्दों पर कुछ लिखा है। हाँ उनकी थाल सेवा बहुत लोकप्रिय है।

उनके विशाल नेटवर्क में सभी दलों एवं विचारधाराओं के नेता हैं। यहाँ तक कि इस लेख की लेखिका भी उनसे प्रभावित हो गयी थी। बात कुछ वर्ष पहले की है, जिस वर्ष कठुआ काण्ड हुआ था, चर्चा में था। उसी वर्ष हल्द्वानी में प्रथम लिट्फेस्ट हुआ था और उसमें एक सेशन की पेनलिस्ट के रूप में मैं भी गयी थी। मुझसे संदीप देव जी ने प्रश्न भी किया था “कि इन वामपंथियों के बीच आप कैसे हैं?” खैर, उन दिनों मैं साहित्य के क्षेत्र में सक्रिय थी और मैं एक वरिष्ठ स्त्रीवादी लेखिका गीताश्री के अनुमोदन पर उस कार्यक्रम का हिस्सा बनी थी। तब भी मैं जानती नहीं थी, इतना अधिक!

खैर, मुझे कई दक्षिणपंथी पत्रकारों ने  कहा कि दिनेश मानसेरा अपने ही मित्र हैं। तो मैं निश्चिन्त थी। पर वहां जाकर मुझे पता चला कि दिनेश मानसेरा के अच्छे सम्बन्ध सभी के साथ हैं और जो भी पत्रकार उत्तराखंड जाता है, वह उनके यहाँ मुलाक़ात करके ही आगे बढ़ता है।

अगले दिन लिट्फेस्ट में जो बात मुझे अजीब लगी थी, वह थी वामपंथी पत्रकार हृदयेश जोशी द्वारा कठुआ काण्ड पर पढ़ी गयी कविता। अंग्रेजी में किसी ने वह कविता लिखी थी और उसे हृदयेश जोशी ने हिंदी में अनुवाद किया था। वह कविता मार्मिक थी, परन्तु एजेंडा से भरी हुई थी। और तथ्यों से परे थी।

भरे मंच से एक ऐसी कविता सुनाई जा रही थी, जिस कविता में देवी माँ को झूठ ही कोसा जा रहा था, और फिर मुझे लगा कि कहीं मैंने गलती तो नहीं कर दी! क्योंकि एक संघी, जो खुद को हिन्दू धर्म का एकमात्र रखवाला कहते हैं, वह हिन्दू धर्म के खिलाफ अपमानजनक सुनेंगे यह मेरी कल्पना से बाहर की बात थी!

खैर! फिर भी मैं इनसे प्रभावित रही क्योंकि मुझे लगा कि आयोजक का नियंत्रण मंच पर बैठे लोगों पर नहीं होता है! परन्तु जब इन्होनें फेंकू जैसे शब्द प्रयोग करना आरम्भ किया तो मुझे लगा कि यह भी शेष वामपंथी पत्रकारों जैसे ही हैं। हाँ, अपने व्यापक नेटवर्क के कारण हर ओर स्वीकार्य हैं।

अब उनका वह बेटा भी उनके बचाव में उतर आया है जो किसान आन्दोलन के समर्थन में हैं, भीतर ही भीतर कांग्रेस का समर्थक है और आम आदमी का भी! संक्षेप में कहें तो भाजपा का विरोधी है। कुछ स्क्रीन शॉट संलग्न हैं:

थ्रेटा के भी प्रशंसक हैं:

अब उनके पुत्र ने यह घोषित कर दिया है कि उनके पिता तो संघी हैं:

संघी होने का दावा करने वाले अपनी पुस्तक के विमोचन में किसी भी संघी को नहीं बुलाते हैं:

हाँ फिर भी वह संघी हो सकते हैं, क्योंकि संघ शायद उन्हें बहुत पसंद करता है जो उनके लोगों को गाली देते हैं। संघ की विचारधारा को मानने वाले पत्रकार उन्हें बधाई दे रहे हैं। संघ की विचारधारा मानने वाली वरिष्ठ पत्रकार सर्जना शर्मा जी ने भी उन्हें बधाई दी है। संघ की विचारधारा को मानने वाली सर्जना शर्मा जी इन दिनों उस दैनिक सन्मार्ग में डेप्युटी एडिटर हैं, जिसके साथ तृणमूल कांग्रेस के वह विधायक विवेक गुप्ता भी जुड़े हुए हैं, और संभवतया  जिनका नाम सारधा घोटाले में भी आ चुका है और ईडी भी उनसे पूछताछ कर चुका है।

दुर्भाग्य से मेरी भी एक कहानी सन्मार्ग की वार्षिक पत्रिका में प्रकाशित हुई है, इस विषय में भी मेरा कहना यही है कि मुझे नहीं पता था कि सन्मार्ग में किन राजनीतिक दल के लोग हैं? यदि मुझे पता होता तो मैं कभी न भेजती! वैचारिक प्रतिबद्धता के कारण मैं पहले ही तमाम साहित्यिक पत्रिकाओं से नाता तोड़ चुकी हूँ!

दैनिक सन्मार्ग में पश्चिम बंगाल में हिन्दुओं पर हुई हिंसा पर एक भी शब्द प्रकाशित नहीं हुआ है। तीन से लेकर पांच मई तक सन्मार्ग मैंने खोजा, परन्तु मुझे ऐसी एक भी खबर नहीं प्राप्त हुई जिसमें कहा गया हो कि हिन्दुओं पर हिंसा हुई! पश्चिम बंगाल पर ही हम अंत में आ गए हैं। वह एक ऐसा प्रदेश है जो विश्वासघात का शिकार हुआ है! मेरा व्यक्तिगत विश्वास हिला है! मैं समझ नहीं पा रही हूँ कि कैसे कोई धार्मिक हिन्दू, जो संघ की समर्थक रही हों, और भाजपा सरकार में भी एक मंत्रालय में मीडिया सलाहकार रही हों, वह उन लोगों की मृत्यु के विषय में एक भी शब्द नहीं बोलेंगी? या फिर यह एक छोटी बात है? मेरी समझ में नहीं आ रही! कैसे वेतन के लिए मात्र क्या बनकर आप उस हिंसा पर नहीं बोल रही हैं, जो धर्म के आधार पर हो रही है। और आपके ही धर्म का पालन करने वालों पर हो रही हैं?

हालांकि बंगाल से प्रकाशित होने वाले अनेकों समाचार पत्रों ने इस हिंसा को स्थान नहीं दिया, परन्तु यहाँ पर उम्मीद थी क्योंकि लोग अपने थे! पर अपने लोगों से भी निराशा हुई!

भाजपा के भोले समर्थकों के लिए, जो अपने धर्म के लिए, अपना जीवन और सर्वस्व समर्पित कर देते हैं, उनके हाथ हमेशा खाली रहते हैं और हर सरकार में केवल इन नेटवर्क पत्रकार वालों के ही हाथ भरे होते हैं। जैसा कि सूत्र बताते हैं कि एक बार सूचना आयुक्त एवं वरिष्ठ पत्रकार श्री उदय माहुलकर ने भी हरियाणा भवन में शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास के आयोजन में कहा था कि संघ स्वयं के मध्य से नहीं बल्कि बाहर से प्रतिभाओं की खोज करता है.”

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Sonali Misra

Sonali Misra

सोनाली मिश्रा स्वतंत्र अनुवादक एवं कहानीकार हैं। उनका एक कहानी संग्रह डेसडीमोना मरती नहीं काफी चर्चित रहा है। उन्होंने पूर्व राष्ट्रपति कलाम पर लिखी गयी पुस्तक द पीपल्स प्रेसिडेंट का हिंदी अनुवाद किया है। साथ ही साथ वे कविताओं के अनुवाद पर भी काम कर रही हैं। सोनाली मिश्रा विभिन्न वेबसाइट्स एवं समाचार पत्रों के लिए स्त्री विषयक समस्याओं पर भी विभिन्न लेख लिखती हैं। आपने आगरा विश्वविद्यालय से अंग्रेजी में परास्नातक किया है और इस समय इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय से कविता के अनुवाद पर शोध कर रही हैं। सोनाली की कहानियाँ दैनिक जागरण, जनसत्ता, कथादेश, परिकथा, निकट आदि पत्रपत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं।

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