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उत्तरप्रदेश में भोजपुरी भाषा की उपेक्षा बन सकता है चुनावी मुद्दा, केजरीवाल ने पंजाबी भाषा की राजनीति के जरिए दिखाई राह!

आगामी उत्तरप्रदेश चुनाव में भोजपुरी भाषा की उपेक्षा मुख्य मुद्दा बन सकता है! खासकर पूर्वी उत्तरप्रदेश में भोजपुरी भाषा चुनावी गुणा-भाग को बनाने-बिगाड़ने का खेल कर सकता है! जब से दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने पंजाब चुनाव के मद्देनजर पंजाबी भाषा का मुद्दा उठाया है, तब से पूर्वी उत्तरप्रदेश के लोग भी भोजपुरी भाषा को संविधान की अष्टम अनुसूचि में शामिल कराने के लिए बनारस से लेकर दिल्ली तक गोलबंद हो रहे है! पूर्वी उत्तरप्रदेश को अपने सांसद और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से उम्मीद है कि वह भी वाजपेयी सरकार की राह पर चलते हुए क्षेत्रीय भाषाओं को उसका संवैधानिक हक प्रदान करेंगे!

माॅरिशस ने भोजपुरी भाषा को अपनी संवैधानिक भाषा का दर्जा दिया है, लेकिन आश्चर्य है कि अपनी मातृभूमि में ही भोजपुरी संवैधानिक भाषा का दर्जा पाने के लिए कई दशकों से लड़ाई लड़ रही है। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल पंजाब की राजनीति करने के लिए पंजाबी भाषा का उपयोग कर हे हैं। पिछले दिनों दिल्ली से लेकर पंजाब तक के अखबार इस विज्ञापन से भरे मिले कि केजरीवाल सरकार ने दिल्ली में पंजाबी भाषा के शिक्षकों के खाली पद को भरा है। केजरीवाल के इस एक कदम से पंजाब की राजनीति में पंजाबी भाषा की अस्मिता ने उबाल मारना शुरु कर दिया है!

ताज्जुब है कि उत्तरप्रदेश का चुनाव सामने है, लेकिन भाजपा की राजनीति में भोजपुरी अभी तक कहीं भी शामिल नहीं है! भोजपुरी भाषा के प्रति पिछली यूपीए सरकार ने जिस तरह से सौतेला व्यवहारा किया, बिहार-उत्तरप्रदेश की भोजपुरी जनता ने उसी अनुरूप उसे मजा भी चखाया है, तभी तो बिहार-उत्तरप्रदेश को कांग्रेस लगभग पूरी तरह से उखड़ गई है! अब बिहार-उत्तरप्रदेश की भोजपुरी भाषा-भाषी जनता को नरेंद्र मोदी सरकार से उम्मीद है! यह उम्मीद इसलिए भी है कि स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भोजपुरी की राजधानी कही जाने वाले बनारस से सांसद हैं! यही नहीं, इस समय संसद में करीब 70 भोजपुरी भाषी सांसद हैं, लेकिन भोजपुरी को संविधान की अष्टम अनुसूचि में यह लोग भी दो साल में शामिल नहीं करा पाए हैं!

भोजपुरी समाज, दिल्ली के अध्यक्ष अजीत दुबे ने उत्तरप्रदेश चुनाव के मद्देनजर भोजपुरी भाषी पत्रकारों व सांसदों की एक अनौपचारिक बैठक बुलाई, जिसमें इस भाषा को संवैधानिक मान्यता मिलने में आ रही अड़चनों के बारे में जानने-समझने का प्रयास किया गया। भोजपुरी क्षेत्रों से आकर दिल्ली में पत्रकारिता कर रहे पत्रकारों से यह अपेक्षा की गई कि वह भोजपुरी भाषा को संवैधानिक मान्यता दिलाने के लिए एक जनचिंतन का माहौल अपने लेखों व खबरों के जरिए तैयार करें ताकि सरकार पर इसके लिए दबाव पड़े! जब तक भोजपुरी भाषी पत्रकार इस भाषा के प्रति चिंतन का माहौल नहीं बनाएंगे, कोई भी सरकार सोई रहेगी! पत्रकारों का मानना था कि यदि सरकार उत्तरप्रदेश चुनाव से पहले भोजपुरी भाषा को संवैधानिक मान्यता प्रदान करने की दिशा में कदम नहीं बढ़ाती है तो इसके नकारात्मक असर से वह नहीं बच पाएगी! पूर्वी उत्तरप्रदेश इस मुद्दे से भावनात्मक रूप से जुड़ा है, इसलिए अधिक दिनों तक इसकी उपेक्षा मोदी सरकार को भारी पड़ सकती है!

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बैठक में शामिल भोजपुरी गायक व कलाकार एवं उत्तर-पश्चिम दिल्ली से सांसद मनोज तिवारी ने दुख जाते हुए कहा कि भोजपुरी भाषा-भाषी सांसदों के बीच इसके लिए क्रेडिट लेने की होड़ के कारण इस दिशा में अभी तक सफलता नहीं मिल सकी है। सांसद मनोज तिवारी ने कहा कि जब भी किसी भोजपुरी सांसद से इसे लेकर बात करता हूं तो उनका व्यंग्यपूर्ण जवाब होता है, ‘जा करा ल भाषा के संविधान में शामिल!’

मनोज दुःखी मन से कहते हैं, मैंने सबसे कहा कि मैं एकदम पीछे रहूंगा, आप मुझे कहीं से क्रेडिट मत दीजिए, लेकिन कम से कम इसके लिए एक सामूहिक प्रयास तो कीजिए! लेकिन सबके बीच अपनी-अपनी श्रेष्ठता की होड़ है! उनके अनुसार, सार्वजनिक रूप से जो लोग इस भाषा को संवैधानिक मान्यता मिलने की वकालत करते हैं, अकेले की बातचीत में वही कहते हैं कि किस फेर में पड़े हो? मनोज तिवारी ने उपस्थित पत्रकारों से यह अपील की कि आप लोग ही भोजपुरी भाषी सांसदों को एक मंच पर लाएं और उनसे पूछें कि वो इसके प्रति गंभीर कितने कदम आगे चले हैं?

भोजपुरी समाज, दिल्ली के अध्यक्ष अजीत दुबे ने कहा कि एनडीए सरकार हमेशा से क्षेत्रीय भाषाओं की पक्षधर रही है। वाजपेयी सरकार ने मैथिली को संवैधानिक मान्यता प्रदान की थी, उम्मीद है उत्तरप्रदेश चुनाव से पूर्व मोदी सरकार वाजपेयी सरकार के नक्शेकदम पर चलते हुए भोजपुरी भाषा को भी संवैधानिक मान्यता प्रदान करेगी। भोजपुरी भाषा-भाषी मोदी सरकार की ओर उम्मीद से देख रही हैं। यदि उत्तरप्रदेश चुनाव से पूर्व सरकार अगले संसद सत्र में इसके लिए बिल ले आती है तो पूरे पूर्वी उत्तरप्रदेश में इसका सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। निश्चित रूप से चुनाव में यह एक मजबूत मुद्दा बनेगा और भोजपुरी भाषी जनता, चिंतक और विचारक इसे मुद्दा बनाकर रहेंगे!

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