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बिहार में पृथक आवास हकीकत है या फसाना!

बिहार का नाम सुनते ही आपके जेहन में क्या आता है? नालंदा विश्वविद्यालय, चाणक्य, वैभवशाली मौर्य वंश या फिर विश्व का प्रथम गणतंत्र लिच्छवि मतलब कुल मिला कर सम्पन्नता की वो मिशाल जिसको हर कोई पाना चाहेगा या फिर रहना। खैर ये तो पुरानी बातें है जितना हमारे पाठ्यपुस्तकों में अकबर महान, जिंदा पिशाच माफ कीजियेगा जिंदा पीर औरंगजेब महिमा मंडन किया गया उसका पासंग भी इन सब के बारे में नही लिखा गया तो कैसे समझेंगे, छोड़िये इन बातों को और चलते हैं आधुनिक बिहार की ओर अब शायद आपके दिमाग में वो जंगलराज, घोटालों में भी घोटाला या फिर अपहरण उद्योग ये सब चलने लगा होगा लेकिन मैं आज आपको इन सब के बारे में बताने वाला नही हूँ मैं तो आपको लेकर चलने वाला हूँ वर्तमान में चीनी वायरस से फैली त्रासदी की ओर और मरती हुई मानव संवेदना के तरफ जी हां अगर पृथक आवास में चूड़ा के साथ नमक मिले और मुखिया जी को मास्क साबुन के लिए मिले हुए 9 लाख सिर्फ उ टाटा सफारी को खरीदने में मूल्य चुकाने पर राहत हो तो फिर क्या बात, या पैक्स डीलरों के उन्नति का मार्ग प्रशस्त करता हुआ गरीबों के लिये आया हुआ अनाज अब कुल मिला कर यह हुआ कि गरीब जो है उसको गरीब रहना ही है क्योंकि यही विधाता का लिखा हुआ है नही तो हमारे देश में 70 सालों से 3 पीढ़ी आयी और चली गयी बाकी चौथी पीढ़ी गरीबी उन्मूलन के लिए संघर्षरत है|

पूरे विश्व में जब चीनी वायरस को ले कर हाहाकार मचा हुआ है उससे ना ही हमारा देश और ना ही हमारा बिहार और अन्य राज्य अछूता है, जिधर देखो उधर ही सब भागते हुए दिखते हैं कोई साइकिल से भाग रहा है तो कोई रोटी नमक प्याज बांध पैदल ही सपरिवार अपने पैतृक आवास की ओर भागता जा रहा है बस सबके चेहरे पर एक ही धुन है किसी तरह अपने गांव की ओर लौट चलो बगैर ये सोचे कि वहाँ कैसी परिस्थितियों का सामना करना पड़ेगा। क्या पता कि पृथक आवास में नमक चूड़ा मिले या फिर डांसरों के द्वारा मनोरंजन, खैर जो मिलेगा वो देखा जाएगा लेकिन अब भाग चलो क्योंकि गांव ने अब बुलाया है अपने खेत में ही मजूरी करेंगे।

अब बात बिहार की है तो वहां की बाते करते हैं, अभी जितने भी लोग बाहर के प्रान्तों से बिहार लौटे हैं उन्हें पृथक आवास की सुविधा मुहैया करवाई गई है और सरकार की तरफ से प्रति व्यक्ति पर प्रतिदिन करीब ₹2500 का खर्च बताया गया है ऊपर से बिहार सरकार ने सभी ग्रामपंचायत के मुखिया को नौ लाख रुपये भी मुहैया करवा दिया है ताकि वो अपने पंचायत में सफाई, मास्क और साबुन वितरण कर सके अब राम ही जाने की पंचायतों में कितने मास्क साबुन बटे या फिर उस नौ लाख के कितने हिस्से हुए। मतलब ये की इस महामारी में एक और घोटाला जो मरती हुई मानवता का जीता जागता उदाहरण है।

आज ऐसे ही एक फोन कॉल आया मेरे मित्र का वो बता रहा था कि गांव के सरकारी स्कूल को जो पृथक आवास बनाया गया था उसे बंद कर दिया गया है क्योंकि सरकार ने सिर्फ मुम्बई, दिल्ली, पुणे, बंगलोर, कोलकाता, और हैदराबाद से आये मजदूरों को ही पृथक आवास देने का आदेश पारित किया है बाकी जो आएंगे वो अपने घर में ही एकांतवास में रहेंगे, सुनकर थोड़ा अजीब भी लगा तो मैंने भी हठी स्वभाव से मुखिया जी को फोन मिला दिया अब मुखिया जी के अनुसार ऊपर से आदेश आया है तो बन्द करना पड़ा वैसे भी पृथक आवास की जिम्मेदारी संबंधित विद्यालय के प्रधानाध्यापक की है तो बन्द करना पड़ा अब बात ये हुई के मेरे गांव खजुरी पंचायत, सहरसा बिहार में अभी दिल्ली, मुम्बई से बहुत सारे कामगार आये है और वो खुलेआम घूम भी रहे है औरों से मिल भी रहे हैं मतलब हमे कोरोना नही होगा इस विश्वास के साथ।

अब सवाल ये उठता है कि ऐसे हालात तो बिहार के अधिकतर पंचायतों की है तो अगर कोरोना फैला तो क्या बिहार में श्मशान होगा या फिर श्मशान में बिहार ये आने वाला समय ही बता देगा वैसे भी लिखे जाने तक बिहार में मरीजों की संख्या 2600 के करीब पहुच ही गयी है और आगे कितनी पहुचेगी वो अपडेट आता ही रहेगा।

कुल मिला कर सरकार ने अपनी जिम्मेदारी की इतिश्री राहत पैकेज दे कर लिया और पंचायत के अगुआ और सरकारी बबुआ दोनों ने कुछ तुम रखो कुछ हम रख लें कि तर्ज पर राहत पैकेज से खुद का ही राहत कर लिया, लेकिन कुछ सवाल और सीख सबके लिए छोड़ दिया कि जब मुझे तुम्हारी जरूरत थी तो हम तुम्हारे दरवाजे पर लोटते अब उस लोट लगाने से तुम्हारे दरवाजे की धूल मेरे झक्क सफेद कुर्ते पर लगी थी वो तुम्हारे राहत के लिए आये सरकारी पैसों के सर्फ से साफ होंगे।

बाकी जो बचेगा वो अपनी कविता के माद्यम से पूर्ण करने की कोशिश करता हूँ।

उससे समस्तीपुर के पृथकावास में आर्केस्ट्रा करवा देंगे,
सहरसा बैजनाथपुर के पृथकआवास में चूड़ा नमक बंटवा देंगे।
तुम मधुबनी के पृथकावासी की तरह परोसे भात पर लात मारते रहना, हम तुम्हारे खिलाफ मामले दर्ज करवा देंगे।
तुम सिमरी बख्तियारपुर सहरसा रेलवे स्टेशन पर ट्रेन वैक्यूम कर अपने घर भागने की कोशिश करना,
हम तुम्हे प्रखंड वाले पृथक आवास में दाखिला दिलवाने की खाना पूर्ति करवा देंगे।
तुम गांव में कोरोना बम बन कर घूमते रहना हम पृथकावास में ताला लटका देंगे,
जब खुद से पूरे गांव को संक्रमित करोगे तब हम गांव को ही सील करवा देंगे।
अगर बच गए इस महामारी से तो अगले इलेक्शन में फिर तुम सब में 1-1 लबनी ताड़ी और तरलका माछ बंटवा देंगे।
अगर ज्यादा नाराज रहोगे तो फिर से तुम्हारे दरवाजे पर लोट लगा खुद को मुखिया, विधायक, सांसद बनवा लेंगे।
फिर झक्क सफेद कुर्ते पर लगी धूल झाड़ने के लिए तुम्हारे लिए आये पैकेज से सर्फ मंगवा लेंगे।

बाकी तो सीता राम सीता राम कहिये, जाहि विधि राखे राम ताहि विधि रहिये। और हां चलते चलते, सुरक्षित रहिये, खुद जीवित रहिये और दूसरों को जीवित रहने का मौका दीजिये।

फिर कभी मिलेंगे गौरवशाली बिहार से बदनसीब बिहार बनने वाली तथ्यपरक कहानी के साथ तब तक के लिए विदा।

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