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बिल गेट्स भारत में होने वाले लांकडाउन के प्रमुख समर्थक के रूप में उभरे

भारत ने विश्व का सबसे सख्त और सबसे ज़्यादा व्यापक स्तर पर किया जाने वाला लांकडाउन कार्यांवित किया. और यह लांकडाउन देश भर में पच्चीस मार्च से चला आ रहा है. प्रधानमंत्री नरेंन्द्र मोदी ने ये जो इतने वृहत स्तर पर इस प्रकार के लांकडाउन की परिकल्पना की और फिर उसे कार्यांवित भी किया, उसके पीछे उद्देश्य स्पष्ट था. इस लांकडाउन का उद्देश्य था भारत की करीब 1.29 बिलियन की भारी जनसंख्या में से कोरोना वायरस के कहर से उतने अधिक लोगों को बचा पाना जितना संभव हो सके. विश्व की तीसरी सबसे सशक्त अर्थव्यवस्था यानि भारत को विश्व भर के विशेषज्ञों से अनेकों बार चेतावनी मिल रही थी कि यदि वह इतना सख्त लांकडाउन कार्यांवित नही करेगा तो 10 लाख से भी अधिक की संख्या में मौते होंगी.और इसीलिये भारत ने विश्व के सबसे सख्त लांकडाउन को कार्यांवित करने का बीड़ा उठाया .

विश्व के बाकी सभी देशो मे लांकडाउन का प्रतिशत 30 से 70 प्रतिशत था. भारत जैसा संपूर्ण लांकडाउन, इतने व्यापक स्तर पर, किसी भी और देश में देखने को नही मिला. कई देशों ने तो लांकडाउन का सहारा बिल्कुल भी नही लिया. सिर्फ लोगों को सोशल डिस्टेंसिंग यानि सामाजिक दूरी बनाये रखने की सलाह दी और अपनी खुद की और आस आस के वातावरण की साफ सफाई पर और भी अधिक ध्यान देने की सलाह दी. और इन देशों ने इसी प्रकार से सिर्फ नागरिकों को सूचना और परामर्श देने के माध्यम से अपने यहां कोविड 19 से होने वाली मौतों की दरों को कम करने का प्रयत्न किया. जबकि भारत में लांकडाउन इतना सख्त है कि यदि किसी इलाके में कोरोना वायरस का एक भी मामला सामने आता है तो उस इलाके की सारी दुकानें, आंफिस, यहा तक की वहां यदि कोई दवा की दुकानें या डिसपेंसरी आदि हैं, तो वह सभ भी बंद कर जाती हैं. भारत में कोविड 19 को सरकार और प्रशासन इतनी अत्यधिक गंभीरता से ले रहे हैं जैसे कि इसका मृत्य दर नब्बे प्रतिशत होगा. लेकिन वास्तविकता में इसका मृत्य दर बहुत ही कम है. प्रधानमंत्री दामोदरस मोदी ने इस वैश्विक महामारी के समय एक ऐसे प्रधान की छवि प्रस्तुत की जो वास्तविकता में अपने देश की और देशवासियों की चिंता करते हैं. और इसीलिये उन्होने कोविड 19 से बचाव की इस मुहिम में कोई भी चांस लेकर खतरा मोल लेने की अपेक्षा सावधानी बरतना अधिक उचित समझा.और ऐसे कितने लोग थे जिन्होने 3 महीने पूर्व यह् भविष्यवाणी की थी कि भारत कोरोना वायरस के कहर से बुर्री तरह टूट जायेगा और यहां निश्चित तौर पर मई के महीने तक दस लाख से भी अधिक की संख्या में कोरोना वायरस से जुड़ी मौतें होंगी, और इसके पश्चात 2020 की अधिकतर अवधि तक भारत में कोविड 19 से हुई मौतों का कहर बढ्ता ही रहेगा. ळेकिन भारत के लोगों ने अपने प्रधानमंत्री की बात मानकर और उस पर पूर्णतया अमल करके इस नकारात्मक भविष्यवाणी को झूठा साबित कर दिया. और भारत की जनता ने प्रधानमंत्री मोदी की बात पर ठीक उसी प्रकार से अमल किया जिस प्रकार से उन्होने 8 नवम्बर 2016 को देश की 86 प्रतिशत मुद्रा के विमुद्रीकरण का निर्णय बड़ी सहजता से स्वीकार लिया था, और वह भी सिर्फ चार घंटो के नोटिस पर, आफिस टाइम के पश्चात.

लांकडाउन के प्रबल समर्थक गेट्स

भारत के इतने लंबे और देश्व्यापी लांकाडाउन का समाज और अर्थव्यवस्था दोनों पर ही बहुत गहरा असर पड़ा है. अब तो ये बता पाना भी कठिन हो चला है कि प्रोडक्शन लाइनों और सर्विसेज़ को फिर से लांकडाउन के पहले के दिनों की स्थिति मे लाने के लिये कितना समय लगेगा. कितने लोगों की नौकरियां जायेंगी, इसको लेकर जो अनुमान लगाये जा रहे हैं, वे आंकड़े तो वास्तविकता में दिल दहला देने वाले हैं. भारतीय गणतंत्र के पूरे इतिहास मे भी किसी ने ऐसे आंकड़ो की कल्पना नही की होगी. जो पी एम मोदी का काम करने का तरीका है जिसके अंतर्गत वो कोई भी बड़ा निर्णय लेने से पहले उस क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञों से विचार विमर्श अवश्य करते हैं, उससे तो यही आभास होता है कि इस देश्व्यापी लांकडाउन का निर्णय लेने से पूर्व उन्होने अवश्य ऐसे कुछ विशेषज्ञों की सलाह ली होगी. उसे समय कुछ ऐसे लोगों की फौज थी, जिसमे कुछ लोग तो अकादमिक जगत के थे, और कुछ लोग मेडिकल विशेषज्ञ. तो इन मिले जुले विशेषज्ञों की एक फौज जैसी थी जो कि पब्ल्कि स्फेयर में बहुत सी जानकरी फैला रही थी.थी. अब इसमे से कुछ्ह जानकारी गलत तथ्यों और गलत जानकार्री के साथ भी मिश्रित हो गयी. खैर, इस सब का मूल उद्देश्य मीडिया के माध्यम से एक ऐसा माहौल तैयार करना था जिससे लोग प्रभावित होकर अपनी इच्छानुसार ही उतने लंबे लांकडाउन के लिये तैयार हो जायें, जितना प्रधानमंत्री व उनके सलाहकार उचित समझते हों. इस प्रकार के सख्त और पहले कभी भी कार्यांवित न किये जाने वाले लांकडाउन के एक प्रबल पक्षधर बिल गेट्स भी थे. माइक्रोसांफ्ट के संस्थापक वैश्विक स्वास्थ्य उद्योग को सर्वव्यापी रूप से प्रभावित करने वाली एक शख्सियत के रूप में उभरे हैं. और नोवेल कोरोना वायरस के संक्रमण को रोकने के लिये , जहां जहां भी इसका खतरा अधिक है,वहां वहां लांकडाउन के पक्ष में अगर वे ज़रा सा भी कुछ कहते तो उसका अत्याधिक , बल्कि असाधारण प्रभाव पड्ता, कुछ ऐसा ऊनका रूतबा है. इसके साथ ही भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद भी इस प्रकार के लांकडाउन के पक्ष में ही रहा.बिल और मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन के प्रमुख विश्व की उन प्रमुख शख्सियतों में से एक थे जिन्होने इस प्रकार के लांकडाउन के लिये प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सर्वप्रथम बधाई दी. इसके अलावा अमरीका के 45 वे राष्ट्रपति डांनल्ड टृम्प और विश्व स्वास्थ्य संगठन के प्रमुख डां टेडरोस ने भी लांकडाउन को लेकर प्रधानमंत्री मोदी को बधाई दी. टेड्रोस वर्षों से गेट्स के साथ जुडे रहे हैं.

कुछ गलत पांलिसीज़ के चलते और कुछ प्रभावहीन संवाद नीति के चलते कई लोगों को वैश्विक स्तर पर अवसर मिल गया इस प्रकार का झूठा, मनगढंत प्रोपोगैंडा फैलाने का कि नरेंद्र मोदी की अगुआई में भारत बिल्कुल वैसा बनता जा रहा है, जैसा कभी हिटलर के नेतृत्व मे जर्मनी बना था. यानि कुछ ऐसी इकाइयां हैं जो अपने निहित स्वार्थों के चलते प्रधानमंत्री मोदी को एक तानाशाह के रूप मे चित्रित करने की प्रोपोगैंडा कैम्पेन चला रहे हैं. और जो अंतराष्ट्रीय मीडिया आउट्लिट्स इस प्रकार की बेसिर पैर की निहायती झूठी, मनगढ़्त कैम्पेन चला रही हैं, उनके बाकायदा पत्रकार हैं जो कि भारत में स्थित हैं, भारत में रह उनके लिये काम करते हैं. और इसके बावजूद भी इन पत्रकारों ने कभी भी इस प्रकार की स्टोरीज़ को प्रकाशित होने या एयर होने से रोकने की कोशिश नही की, यह जानने के बावजूद कि जिस प्रकार के जाति संहार जैसे गंभीर आरोप उन रिपोर्ट्स मे होते हैं, उन्हे साबित करने के लिये कोई भी प्रमाण मौजूद नहीं है. और होगा भी कैसे, जब ऐसा कुछ है ही नहीं, यह महज़ मनगढंत अफवाहों की न्यूज़ चलती है, और इन अंतराष्ट्रीय मीडिया आउटलिट्स के भारत मे बैठे पत्रकार न तो ऐसी न्यूज़ को चलने या प्रकाशित होने से रोकने क प्रयास करते हैं और न ही अपनी खुद की खबरों और रिपोर्टों मे ऐसी मनगढंत बातों को जोड़्ने से परहेज़ करते हैं. मार्च 2020 में लांकडाउन को बढावा देने वाली और उसका गुणगान करने वाली एक पूरी इंड्र्स्ट्री ने जन्म लिया. इस इंडस्ट्री में दुनिया भर के मीडिया जगत के लोग, अकादमिक जगत के लोग, और तमाम वैश्विक संगठनों से जुड़े लोग शामिल हैं. ये ऐसे लोग हैं जो कि न सिर्फ भारत की सरकार की छवि धूमिल करना चाहते हैं बल्कि भारत के नागरिकों को भी बदनाम करना चाहते हैं. तो ये भारत में कोविड 19 से होने आले नुकसान और मौतों को लेकर बुरे से बुरे अनुमान लगाते रहते हैं. नित प्रतिदिन नये शोध सामने लाते रहते हैं जिससे लोगों और सरकार की मानसिक स्थ्ति भयावह बनी रहे और लांकडाउन एक के बाद एक बढ्ता ही जाये. और इन तथाकथित वैज्ञानिक स्टडीज़ में से एक भी स्टडी ऐसी नहीं है जो कि गणीतीय मांडल्स के अतिरिक्त किसी और विषयवस्तु पर आधारित हो.

और पद, ओहदे और वैश्विक इंफ्लुएंस मे इन सभी लोगों से कही आगे एक ऐसा व्यक्ति खड़ा है जिसने अपनी मौलिक सोच और बिज़नेस से जुडी योग्यता के चलते ऐसी आर्थिक शक्ति आर्जित की है जिसका मुकाबला शायद विश्व भर की कुछ ही सरकारें कर पायें. तो विश्व भर में अपनी इस प्रकार की इंफ्लुएंस के चलते वह व्यक्ति जिस भी मुद्दे को उठाता है, वह तुरंत विश्व भर में ऐसा मुद्दा बन जाता है जिसके बारे में सब बात करते हैं, उस मुद्दे को लेकर अनेकों शोधपत्र निकलना शुरू हो जाते हैं, और विश्व भर के मीडियाकर्मी, सरकारें और आम नागरिक, सभी उस् मुद्दे के बारें में बातचीत करना शुरू कर देते हैं. वे एक ऐसे व्यक्ति के रूप में जाने जाते हैं जो कि किसी मूद्दे की तह तक जाकर उसके विषय में गहन् अध्ययन करते हैं और जब एक बार अपना मन बना लेते है कि इस मुद्दे पर किस प्रकार सी आगे बढ्ना  है तो वे फिर अविरल गति से सिर्फ आगे ही बढ़्ते हैं. परिवर्तन का इतना अहम ज़रिया बनने वाले ये शख्स माइक्रोसांफ्ट के संस्थापक बिल गेट्स है जो कि दुनिया के सबसे शक्तिशाली 4 शख्सीयतों – डांनल्ड ट्र्म्प, शी जिनपिंग, नरेंद्र मोदी और व्लादिमीर पुतिन के बाद दुनिय के सबसे प्रभावशाली व्यक्तित्वों में से एक होने का माद्दा रखते हैं.

फाउंडेशन की पहुंच

बिल गेट्स के पास अपनी रेमिट के अंतर्गत एक बड़ी टैक्स फ्री आमदनी है. गेट्स एक एसी शख्सियत हैं जिन्हे दुनिया भर की सरकारों, मीडिया और नागरिकों को सलाह देने वाले नीति न्रिर्धारकों और विशेषज्ञों का आदर और सम्मान मिलता है. उनकी पत्नी मेलिंडा इतनी धनवान होने के बावजूद भी अपनी सरलता, सहजता और सादगी के लिये जानी जाती हैं. गरीबों के हितों को लेकर उनके मन में जो एक वास्तविक, गहरी चिंता है, वे उसके लिये भी जानी जाती हैं. जो लोग मेलिंडा गेट्स को जानते हैं और उनके संपर्क में आते हैं, उनके अनुसार वे एक ऐसी शख्सीयत हैं जो उन सभी पूर्वाग्रहों से दूर हैं जो आमतौर पर ऐसे ऊंचे सामाजिक और आर्थिक रुतबे वाले लोगों में पाये जाते हैं.

कई फाउंडेशंस ऐसी होती हैं जो अपने संस्थापक के निधन के पश्चात ही बनती हैं. इसके विपरीत गेट्स एक ऐसी फौंडेशन के संस्थापक हैं जहां वे इतनी सारी टैक्स फ्री धन राशि ( और साथ ही वांरेन बुफेट की 30 बिलियन डांलर धनराशि ) की देख रेख स्वयं करते हैं और वो भी ऐसे समय में जब वे कोई इतने अधिक भी बूढे नहीं हुए हैं . कोई ऐसा ओवरसाइट बोर्ड भी शायद नहीं है जो कि गेट्स फाउंडेशन के कार्य कलापों को सुपरवाइज़ करता हो. प्रतीत तो ऐसा ही होता है कि सिर्फ बिल और मेलिंडा ( एक ऐसा युगल जो कि अपने रिश्ह्ते की शुरुआत से ही एक दूसरे के प्रति वफादार रहे हैं ) ही निवेश संबंधी सारे निर्णय लेते हैं जो उनकी माइक्रोसाफ्ट के स्टांक बेचक्कर प्राप्त हुई धनराशि के प्रबंधन से संबंधित हैं. इसमे से काफी सारी धनराशि उनके बच्चों क्के पास जाने के बजाय फाउंडेशन के कामों में प्रयोग में लाई जाती है. वांरेन बफेट से जो उन्हे धनराशि मिली है, उसका भी बड़ा हिस्सा फाउंडेशन के कामों में ही प्रयोग में लाया जाता है. अपने को लाइमलाइट से बिल्कुल दूर रखने वाले बफिट भी बिल और मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन के टृस्टी हैं. लेकिन वे फाउंडेशन के सह अध्यक्ष नहीं हैं और फाउंडेशन के महत्वपूर्ण निर्णयों में, जैसे कि किस पांलिसी को बढ़ावा देना है और किस पांलिसी के विरोध में खड़ा होना है, इन निर्णयों में उनकी सहभागिता नज़र नहीं आती.

स्वास्थ्य संबंधी डेटा की तह में जाते हुए

वैश्विक स्तर पर बीमारी से जुड़े वेक्टर्स पर रिसर्च के लिये गेट्स ने वाशिंगटन विश्विद्यालय को सियेटल शहर में इंस्टीट्यूट आंफ हेल्थ मेटृक्स आंर इवैल्युएशन नाम से एक इंस्टीट्यूट शुरु करने के लिये 100 मिलियन डांलर दिये. डां टेड्रोस ( इथ्योपिआ के स्वास्थ्य मंत्री जो कि अब विश्व स्वास्थ्य संगठन के डायरेक्टर जेनेरल हैं ) भी उस इंस्टीट्यूट के संस्थापक बोर्ड मेम्बरों में से एक थे. तो उस इंस्टीट्यूट की विश्व स्वास्थ्य संगठ्न के डेटा तक पहुंच है. साथ ही विश्व स्वास्थ्य संगठ्न से जुड़ी सरकारों और इकाइयों के पास जो डेटा है, वह भी इस इंस्टीट्यूट को आसानी से उपलब्ध हो सकता है. भारत के स्वास्थ्य मंत्रालय का डाटा भी बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन तक विश्व स्वास्थ्य संगठन के माध्यम से आसानी से पहुच सकता है. वैसे भी फाउंडेशन विश्व स्वास्थ्य संगठ्न का एक महत्व्पूर्ण डोनर है, यानि उन्हे आर्थिक मदद देने वाली एक महत्व्पूर्ण इकाई है. तो इस तरह जो भी जानकारी विभिन्न इकाइयों से बिल और मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन तक पहुचती है, फाउंडेशन फिर उस सभी जानकारी का रिकार्ड बनाता है, उसका निरीक्षण करता है और अंतत: इस जानकारी के आधार पर ऐसी पांलिसीज़ बनाता है जो कि वैश्विक सुधार के काम में लाई जायें. अब ये पांलिसीज़ क्या वाकई में इतने महत्वाकांक्षी काम को अंजाम दे पाती हैं, खासकर कि कुछ परिस्थितियों में, यह तो एक ऐसा विषय है जिस पर कोई अंतिम निष्कर्ष निकलना अभी बाकी है. इसका एक उदाहरण लांकडाउन पांलिसी है. ताइवान में अभी तक कोई लांकडाउन नहीं हुआ है. इसके बावजूद उस देश में कोविड 19 के 500 से भी कम केसेज़ हैं और बहुत ही कम संख्या में लोगों की जानें गयी हैं. जिन देशों ने लांकाडाउन कार्यांवित किये हैं, उनसे मिले वास्तविक डेटा से लांकडाउन की सख्ती और अवधि एवं कोविड 19 के केसेज़ और उस से जुडी मौतों के आंकड़ो के बीच कोई परस्पर संबंध नहीं दिखता. इसके विपरीत जिस ग्रेट लांकडाउन थ्योरी की विश्व स्वास्थ्य संगठन और फाउंडेशन ने वकालत की है, उससे पूरे विश्व में ऐसी मार्थिक मंदी का दौर चला है जैसा शायद 1930 में भी नही देखा गया था. या फिर देखा भी गया था तो सिर्फ वेमार रिपब्लिक के समय में जर्मनी में देखा गया था. ये एक ट्रैक की सोच, जिसका सारा ज़ोर लांकडाउन के माध्यम से इंफेक्शन की चेन तोड़ कोविड 19 का कर्व फ्लैट करने पर है, इस प्रकार की सोच ने सामाजिक और आर्थिक अवसाद और चिंता को जन्म दिया है. और ये सामाजिक और आर्थिक क्षति इतने बड़े पैमाने पर हो चुकी है कि इसका बिल और मेलिंडा गेट्स को शायद अंदाज़ा भी नहीं लगा होगा जब उन्होने स्वयं ऐसे कई लोगों की रिसर्च को आर्थिक मदद प्रधान की जो कि कोविड 19 से होने वाली मौतों के खतरनाक आंकड़े लेकर लगातार सामने आ रहे थे. विश्व स्वास्थ्य संगठ्न भी कोरोना वायरस को लेकर कोई बहुत ही प्रशंसनीय भूमिका नहीं निभा पाया. इस महामारी के शुरुआती चरण में, जब स्थिति को बिगड़्‌ने से रोका जा सकता था, विश्व स्वास्थ्य संगठ्न ने तब देशों और सरकारों को कोई खासा सचेत नही किया. उसने दुर्भाग्यवश अपना काम करना तभी शुरू किया जब ये बीमारी एक विकराल वैश्विक महामारी का रूप धारण कर चुकी थी. क्या फाउंडेशन ने विश्व स्वास्थ्य संगठ्न द्वारा कोविड 19 को एक विकराल महामारी घोषित करने के कुछ हफ्ते पहले ही स्वास्थ्य संगठ्न के डायरेक्टर जेनेरल डां टेड्रोस से इस बीमारी पर विश्व स्वास्थ्य संगठ्न के एक्शन प्लान को लेकर किसी प्रकार की जवाबदेही मांगी थी? इस बात के बारे में भी कोई जानकारी नही है. गेट्स फाउंडेशन को और स्वयं गेट्स को जितनी मान प्रतिष्ठा और मान्यता दी जाती है, उससे तो यही पता चलता है कि गेट्स के विचारों को भी बहुत अधिक मान्यता मिलती है और इसीलिये जो पांलिसी निर्देश वे सुझाते हैं, पूरा विश्व उन पर अमल करता है. बिल और मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन से जुड़े कितने की व्यक्तियों को विश्व के सबसे बड़े प्रजातंत्रों, भारत और अमरीका में अनेकों प्रमुख पदों पर आसीन किया जा रहा है.

पूर्वानुमानों पर फिट बैठते नम्बर

गेट्स फाउंडेशन द्वारा इंस्टीट्यूट आंफ हेल्थ मैट्रिक्स और इवैल्युएशन को दी जाने वाली आर्थिक मदद या ग्रांट फिर से शुरु हो गयी. इंस्टीटुयूट के डायरेक्टर क्रिस मुरे शोध का प्रणाली विज्ञान निर्धारित करते हैं जिससे हमेशा ऐसे ही आंकड़े निकलते प्रतीत होते हैं जो पूर्व निर्धारित अनुमानों के खांचे में फिट बैठते हैं. एच एम ई द्वारा निकाले गये इन आंकड़ो को आंख बंद कर के बिल्कुल सही मान लिया जाता है, यहां तक क्की मीडिया भी इन आंकड़ों की विश्वसनीयता पर कोई भी प्रश्नचिन्ह नहीं लगाता. कम्प्यूटर के कैलकुलेशन से निकले इन परिणामों को बिना किसी सवाल जवाब के चुपचाप स्वीकार लिया जाता है, इन परिणामों को निकालने के लिये प्रयोग में लायी अभिधारणाओं और प्रणाली विज्ञान पर भी कोई प्रश्न चिन्ह नहीं उठता. गेट्स स्वयं इन परिणामों पर अत्यधिक भरोसा करते हैं. जिस प्रकार की मान प्रतिष्ठा बिल और मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन की दुनिया भर में  है, उसे देखने के बाद यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि फाउंडेशन से जुड़े बहुत से व्यक्तियों को विश्व स्वास्थ्य संगठन, विश्व बैंक आदि बहुपक्षीय एजेंसीज़ मे वरिष्ठ पदों के लिये चुना गया है. आई एच एम ई और गेट्स का विश्व स्वास्थ्य संगठ्न के साथ के एम ओ यू यानि समझौता ज्ञापन भी है जिसके अंतर्गत वे स्वास्थ्य संगठ्न के पास उपलब्ध सारे डेटा तक पहुंच सकते हैं. आशा है कि भारत के विश्विद्यालयों को भी किसी दिन विश्व स्वास्थ्य संगठ्न के डाटा तक पहुंचने की सुविधा मिलेगी और साथ ही बिल और मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन की फंडिंग भी. यदि ऐसा संभव हो पाये तो इससे आई एच एम ई द्वारा प्रयोग में लाई जाने वाली कार्य प्रणालियों का अवलोकन करने का अवसर मिलेगा और साथ ही और साथ ही जो दूसरे इंस्टीट्यूट कोविड 19 को लेकर इसी प्रकार के परिणाम निकाल रहे हैं, उनकी कार्य प्रणाली का भी निरीक्षण करने का मौका मिलेगा. इसके अलावा इन कार्य प्रणालियों के विपरीत पांलिसी निर्माण के लिये वैकल्पिक आधारों पर भी सुझाव दिये जा सकते हैं. आज के युग में किसी भी वैज्ञानिक अन्वेष्ण के लिये विविध बल्कि परस्पर विरोधी दृष्टिकोण होना भी अत्यंत आवश्यक है. गेट्स फाउंडेशन द्वारा फंडिड शोधकर्ताओं ने कोविड 19 से हो सकने वाली मौतों के जो आंकड़े प्रस्तुत किये हैं, उनकी कार्य प्रणाली को लेकर कोई भी समकक्ष समीक्षा अब तक की गई है, ऐसा मालूम नहीं पड़्ता. हां, फाउंडेशन से ही फंडिड उनके समकक्ष शोधकर्ताओं ने उनके शोध की समीक्षा ज़रूर की है लेकिन उन्हे उस शोध के परिणामों में कोई भी त्रुटि नज़र नहीं आयी. यहां तक कि भारत में कोविड 19 से होने वाली संभावित मौतों के जो आंकड़े प्रस्तुत किये गये हैं, जो कि अब वास्तविकता के धरातल पर जाकर गलत साबित भी हो चुके हैं, उन आंकडों को लेकर भी फाउंडेशन के समकक्ष शोधकर्ताओं ने कोई आपत्ति नहीं जताई. बिल और मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन को शायद अपने कुछ पूर्वानुमानों का पुनरवलोकन करना होगा यदि वे एक ऐसे विश्व की स्थापना के अपने सपने को जीवंत देखना चाहते हैं जहां पर कि खासकर पिछड़े हुए, सताये हुए और अब तक के सबसे ज़्यादा बहिष्कृत लोगों को वह न्याय मिले जिससे वो एक बहुत लंबे समय से वंचित हैं.

या तो हमारे द्वारा निर्धारित रास्ता या फिर कोई भी रास्ता नहीं

अपने बिज़नेस कौशल के चलते बिल गेट्स ने 1970’s, 80’s और 90’s में अमरीका की सिलिकांन वैली की कितनी ही कंपनियों को धूल चटा दी. और यह सब उन्होने माइक्रोसाफ्ट का एकछत्र र्राज्य स्थापित करने की लालसा में किया. आज गेट्स का मिशन है वैश्विक स्वास्थ्य क्षेत्र में सुधार लाना. अमरीका में स्वास्थ्य संबंधी सेवाओं पर वहां के जी डी पी का 17 प्रतिशत खर्च होता है. और बहुत जल्द विश्व के सारे देश स्वास्थ्य पर अपने जी डी पी का 16 प्रतिशत खर्च करेंगे ( जिसमे निजी क्षेत्र या गैर सरकारी क्षेत्र में उपलब्ध स्वास्थ्य सेवाओं का लाभ उठाने के लिये खर्च किया गया पैसा शामिल है ). विश्व के बडे बड़े फार्मा कांन्ग्लोमेरेट्स ने अपनी पांलिसियो और अपने सामान का रुझान ऐसी दिशा में किया है जिससे उनके शेयरधारियों को तो फायदा हो रहा है लेकिन जिससे स्वास्थ्य संबंधी सेवाओं के दाम इतने अधिक बढ गये हैं कि आज के समय में भी ये स्वास्थ्य सेवायें आम आदमी की हैसियत से बिल्कुल बाहर हैं. कोविड 19 महामारी के केस में तो इस एकतरफा, पारंपरिक सोच का वर्चस्व इस कदर हावी हो गया है कि वैक्सीन के अलावा यदि किसी गैर पारंपरिक उपचार के तरीके या दवाई का ज़िक्र मात्र भी होता है तो उस जानकारी को तुरंत गलत साबित कर दिया जाता है, उसे बुरी तरह दबा दिया जाता है. कोविड 19 के इलाज के लिये ये जो पारंपरिक सोच है, वह इस महामारी के इलाज के लिये अन्य साधनों की अपेक्षा वैक्सीन और वेंटिलेटर्ज़ को ही अधिक उपयुक्त मानता है. और ये तब जब हम ऐसी दुनिया में रहते हैं जहां ऐसी तकनीकें जनसंख्या के एक बड़े तबके के पास उपलब्ध ही नही हैं, ठीक वैसे ही जैसे 2016 में नोटबंदी के समय में भारत के कितने ही लोगों की आंनलाइन बैंकिंग या फिर सामान्य बंकिंग सिस्टम तक भी पहुंच ही नही थी. और उस समय बिल गेट्स भारत में नोटबंदी के सबसे पहले समर्थकों में से एक थे, जिस प्रकार से नोटबंदी देश भर में लागू हुई थी, कमसकम अपने शुरूआती चरण में उसके कार्यांवित होने से देशभर के आम नागरिकों के पास आने वाला कैश फ्लो अवरुद्ध हो गया था, जिसका नकारात्मक प्रभाव ग्रामीण इलाकों में रहने वाले लोगों पर, झुग्गी, झोंपड़ियों, बस्तियों में रहने वाले लोगों पर सर्वाधिक पड़ा. क्या बिल और मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन ने आम जनता को होने वाली इन परेशानियों के बारे में सोचा था जब उन्होने कागज़ की मुद्रा को खत्म करके डिजिटल मुद्रा को लाने वाली योजना की ज़बरदस्ती वकालत की थी?

कोई भी पांलिसी कार्यांवित करने से पहले उसके दूरगामी परिणामों को भी रखा जाये ध्यान में

पिछले कई सालों में अनेकों इकाईयों ने अपने निहित स्वार्थों के चलते पारंपरिक, देसी इलाज की तकनीकों को और जड़ी बूटियों से बनी दवाइयों से जुड़ी जानकारी को आगे आने से रोका है. इनमे से कई देसी इलाज गैर असरदार और यहां तक कि स्वास्थ्य के लिये हानिकारिक भी भी हो सकते हैं. लेकिन इन पारंपरिक इलाज पद्धतियों और दवाइयों में से कुछ ऐसी भी होंगी जो कि इस योग्य हैं कि कुछ रूपांतरण के बाद इनको प्रयोग मे लाया जाये. लेकिन फाउंडेशन का जो फोकस है, वह उसी घिसे पिटे ढ्र्रे पर चलता है , वही ढर्रा जिसपर अमरीका और यूरोपीय यूनियन की फार्मस्यूटिकल इंडस्ट्री भी चलती है. मतलब एक ही तरीके की इलाज पद्धति पर अंधविश्वास और अन्य इलाज पद्धतियों को सिरे से ही खारिज कर देना. यह तरीका सही नही है. हेल्थ्केयर के दूसरे विकल्पों को भी महत्व देना होगा, खासकर इस प्रकार की नवीन पद्धतियों को जो कि ग्रीनहाउसेज़ के माध्यम से लुप्त होती ज़रूरी औषधियों और जड़ी बूटियों के उत्पादन को फिर से शुरु कर् रही हैं. पारंपरिक देसी दवाई और इलाजों के विज्ञान के असीम भंडार की अगर खोज बीन हुई होती, यदि इसे तवज्जो दी गयी होती इसमे से बचाव और इलाज के साधन ढूंढने के तो ये दुनिया रहने के लिये कहीं अधिक बेहतर जगह होती. वो वक्त शायद आ चुका है जब मेलिन्डा गेट्स को अपने पार्ट्नर को समझाना होगा कि अब बिल और मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन के सामान्य तौर पर दिये गये चिकित्सा निर्देशों के आगे सोचने का वक्त आ गया है. उन्हे खुले दिमाग से अब ,उदाहरण के लिये, इस बात का अवलोकन करना होगा कि कैसे ज़ानरिक दवाइयों की उपलब्धि बढ़ाने के क्षेत्र में यदि कदम उठाये जायें तो इससे देशों में स्वास्थ्य सेवा पर होने वाला जो खर्चा है, उसे काफी हद तक कम किया जा सकता है. इंडिया, वो देश जिससे बिल गेट्स को खास तौर पर लगाव है,, यदि वो इस बारे में सोचें तो यह एक ऐसा देश है जहां वैक्सीन ट्राइल के अलावा और भी बहुत कुछ किया जा सकता है दवाइयों और इलाज के क्षेत्र में. चीन और भारत जैसे देशों में सदियों से विभिन्न प्रकार की जड़ी बूटियां लोगों की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के काम में लाई जाती रही हैं. और ये पारंपरिक जडी बूटियां उससे कही कम पैसे मे उतने ही जीवन बचा स्काती हैं, जितने कि दुनिया भर की दवाइयां और इंजेक्शन बचा रहे हैं. वैकल्पिक ऊर्जा के इस युग मे अब शायद समय आ गया है कि बिल गेट्स अपना ध्यान सुरक्षित और असरदार वैकल्पिक दवाइयों और उपचार पद्धतियों के विकास में भी लगाये. जिन परंपरागत क्षेत्रों पर वो पहले से ही ध्यान दे रहे हैं, उसके साथ साथ अब यह भी ज़रूरी है. इंसानी ज़िंदगी वाकई कीमती होती है. लेकिन उसके बचाव के लिये ये भी बहुत ज़रूर्री है कि लोगों के पास बचाव हेतु ऐसे साधन उपलब्ध हों जो उनके सामर्थ्य में हों. इसके लिये ऐसे प्रयासों की आवश्यकता है जो कि बड़ी बडी फार्मा कंपनियों के फायदे को ध्यान में रखकर बनाई गयी पांलिसी से कुछ् अलग हटकर सोचें. ऐसे प्रयासों की आवश्यकता है जो कि उन बेहद महंगी उपचार पद्धतियों से भी कुछ अलग हटकर सोचें जिनका प्रचार प्रसार अमरीका का नेशनल हेल्थ इंस्टीट्यूट करता है. ये एक और ऐसा संगठन है जिसे बिल एवं मेलिंडा गेट्स से खासा तवज्जो मिली है. जैसा कि सनातन धर्म बतात है, एक गंतव्य तक पहुंचने के बहुत से रास्ते हो सकते हैं. ज़रूरी नही कि एक ही मार्ग अपनाया जाये. आशा करते हैं कि बिल और मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन द ग्रेट लांकडाउन और नोटबंदी, इन दोनों निर्णयों के पूरे प्रभाव पर भली भांति शोध करेगा. ये दोनों ही ऐसी पांलिसीज़ हैं जिनको फाउंडेशन का अत्यधिक प्रोत्साहन मिला था. या फिर बिल और मेलिंडा गेट्स कमसकम इस बात का ध्यान रखेंगे कि किसी भी पूर्व निर्धारित खांचे में डाटा फिट करवाने से पहले वे कुछ संभावित विकल्पों की भी स्टडी करें. जब बिल गेट्स कुछ कहते हैं, किसी मुद्दे पर अपने विचार सामने रखते हैं, तो मीडिया और पांलिसी निर्माता सभी बड़े ध्यान से सुनते हैं. इसीलिये फाउंडेशन के लिये यह बहुत आवश्यक है कि वह इस प्रकार से आगे बढे कि उसके द्वारा लिये गये पालिसी निर्णयों के न सिर्फ तत्कालिक प्रभाव पता लगें बल्कि उससे होने वाले संभावित दूरगामी प्रभावों का भी एक ब्लूप्रिंट पता लगे. किसी भी निर्णय के कुछ ऐसे प्रभाव भी होते हैं, हो सकते हैं, जो कि पूर्व नियोजित नहीं है, इस एक बात को कभी भी नहीं भूलना चाहिये.

( माधव नालपत द्वारा लिखित द संडे ग़ार्डियन लाइव में प्रकाशित लेख का हिंदी अनुवाद )

Original write up link : https://www.sundayguardianlive.com/news/bill-gates-bats-great-indian-lockdown

Original write-up link :

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Rati Agnihotri

Rati Agnihotri

रति अंग्रेज़ी और हिंदी दोनों में कवितायें लिखती हैं. इनका अंग्रेज़ी का पहला कविता संग्रह ‘ द सनसेट सोनाटा’साहित्य अकादमी से प्रकाशित हुआ है. रति की हिंदी कवितायें पाखी, संवदिया, परिकथा, रेतपथ, युद्धरत आम आदमी, हमारा भारत आदि साहित्यिक पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं. रति दिल्ली में ‘ मूनवीवर्स – चांद के जुलाहे’ के नाम से एक पोएट्री ग्रुप चलाती हैं जहां कविता को संगीत, चित्रकला आदि विभिन्न विधाओं से जोड़ा जाता है और कविता से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर विचार भी होता है. रति चीन के शिनुआ न्यूज़ एजेंसी के नई दिल्ली ब्यूरो में बतौर टी वी न्यूज़ रिपोर्टर कार्य कर चुकी हैं. रति आजकल स्वतंत्र पत्रकार के रूप में कार्यरत हैं. रति ने दिल्ली विश्वविद्यालय के मिरांडा हाउस कांलेज से अंग्रेज़ी विशेष में बी ए आनर्स किया है और इंग्लैंड के लीड्स विश्वविद्यालय से अंतराष्ट्रीय पत्रकारिता में एम ए किया है.

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