भारत में हिन्दी को स्थापित करने की झूठी कवायदें चल रही हैं वहीँ हिंदी गीत दुनिया में हमारी भाषा का बढ़ा रहे हैं मान!

पिछले दिनों भारत के राष्ट्रपति जब प्राग पहुंचे तो एक घटना ने सबका ध्यान खींच लिया। कोविंद दम्पति यहाँ भारतीय समुदाय द्वारा आयोजित पार्टी में शिरकत करने पहुंचे। यहाँ उनके स्वागत में हिन्दी फिल्म का गीत गाया गया। इंडिया-चेक सिनफोनिटा ऑर्केस्ट्रा ने 1970 की मशहूर फिल्म ‘ब्लैकमेल’ का गीत ‘पल-पल दिल के पास तुम रहती हो’ की प्रस्तुति देकर कोविंद का स्वागत किया। चेकस्लोवाकिया का एक गायक बहुत साफ़ उच्चारण के साथ हिन्दी गाना गाता है जिसे सुनकर राष्ट्रपति मुग्ध हो जाते हैं।

ये हिन्दी फिल्मों का सुरीला संसार है, जिसकी खिड़कियां विश्वभर के विभिन्न देशों में खुलती हैं। एक बात बहुत खलती है कि जहाँ हमारे फ़िल्मी संगीत को विश्वभर में सराहा जाता है, वहीं हमारे देश में राजनेताओं के मन में श्रेष्ठ फिल्म संगीत के लिए कोई ख़ास सम्मान देखने को नहीं मिलता। यहाँ तक कि सोशल मीडिया पर अधिकांश वर्ग में फिल्म संगीत के प्रति हिकारत का भाव देखने को मिलता है।

उस सुरीले चेक गायक ने हिन्दी कैसे सीखी होगी। साफ़ है कि उसने हिन्दी दिवस का उपदेश नहीं, हिन्दी फिल्मों के गीत सुने थे। हमारी फिल्मों के सुरीले गीतों के कारण वह हिन्दी की ओर आकर्षित हुआ। ये एक निजी समारोह था जिसमे कोविंद ने ‘घर जैसा’ महसूस किया। क्या हमारे अपने देश में ये कल्पना की जा सकती है कि एक गैर सरकारी इवेंट में प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति या मुख्यमंत्री के स्वागत में हिन्दी फिल्मों के गीत गाए जाए।

शास्त्रीय संगीत से इतर फिल्म संगीत को लेकर देश के एक बड़े वर्ग में हिकारत का भाव क्यों है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दो दिवसीय चीन यात्रा पर गए और वहां चीन ने उनके स्वागत में ऋषि कपूर पर फिल्माए एक गीत ‘तू तू है वहीं, दिल ने जिसे अपना कहा’ की धुन बजाई। ऋषि कपूर ने इस घटना पर ख़ुशी जाहिर करते हुए गीत के रचियता राहुल देव बर्मन को याद किया।

सुषमा स्वराज उज्बेकिस्तान की यात्रा पर जाती हैं और वहां एक स्थानीय महिला राज कपूर की फिल्म का गाना ‘इचक दाना बिचक दाना’ गाकर उन्हें चौंका देती है। ये गीत राज कपूर की ब्लैक एन्ड व्हाइट फिल्म ‘श्री 420’ का है। सोचिये हिन्दी फिल्मों के गीत कितने बरस से इस भाषा को दुनिया से जोड़ रहे हैं। जो काम सरकार का प्रचार विभाग नहीं कर सका, वह काम इन लोकप्रिय हिन्दी गीतों ने कर दिखाया है। नोजियाई कारोमाटुल्लो तजाकिस्तान की रहने वाली गायिका हैं। उन्होंने आशा भोंसले की प्रसिद्ध ग़ज़ल ‘दिल चीज क्या है’ एक कंसर्ट में गाया। ये वीडियो इस कदर हिट हुआ कि अब तक विश्वभर के लाखों लोग इसे सराह चुके हैं।

भारत में हिन्दी को स्थापित करने की झूठी कवायदें चल रही हैं और हमारे हिन्दी गीत दुनिया में इस भाषा को लोकप्रिय बना रहे हैं। हमारा गीत-संगीत हमारी ‘सॉफ्ट पॉवर’ है। हमारी फिल्मों के गीत हमारे ‘सांस्कृतिक राजदूत’ हैं। लेकिन दुनिया भर का दिल जीत रहे हमारे क्लासिक गीतों को नहीं पूछा जाता है। बड़े मंचों से साहित्यकारों को तवज्जो दी जाती है लेकिन गीत लिखने वाले कभी कभार पुरस्कारों में ही निपटा दिए जाते हैं। देखा गया है कि फिल्मों को लेकर देश के राजनेता और सोशल मीडिया कुंठा से भरा हुआ है। ऐसा लगता है कि अच्छी फिल्मों की प्रशंसा करने से उन्हें आम जनता दूसरी नज़र से देखेगी।

पुराने वक्त में राज कपूर की ‘आवारा’ के गीत रूस की गलियों में गूंजा करते थे। वे अपनी फिल्मों के गीतों के कारण रूस में बहुत लोकप्रिय हुए। रूस का ये ‘संगीत प्रेम’ भारत-रूस के सम्बन्धों को प्रगाढ़ करने में बहुत काम आया। देव आनंद को इंग्लैंड में बड़ा पसंद किया जाता था तो उन पर फिल्माए मशहूर गीतों के कारण। अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी का फिल्म प्रेम तो जग जाहिर रहा है। राष्ट्रवाद पर बनी फिल्मों के तो इन दोनों नेताओं के लिए विशेष शो करवाए जाते थे। नेताओं के ऐसा करने से उन फिल्मों का आम जनता के बीच भी प्रचार होता था। हाल ही में ऐसी कई फिल्मों को नेताओं का समर्थन मिल सकता था। ‘परमाणु’, इंदू सरकार, गाज़ी अटैक जैसी फिल्मों को इनका साथ नहीं मिला।

हिन्दी फिल्मों के गीत ‘सांस्कृतिक राजदूत’ हैं। ये विभिन्न माध्यमों से विश्वभर में लोकप्रिय हो रहे हैं। लोगों को हमारे गीतों का माधुर्य, उनका ‘दर्शन’ और लेखनी बहुत अच्छी लगती है। ये सुरीले राजदूत दुनिया भर में उड़ते फिरते हैं लेकिन अपने देश में उपेक्षा सहते हैं। हमारी फिल्मों को, उनके गीतों को दुनिया सराहती है लेकिन सोशल मीडिया उनको हेय दृष्टि से देखता है। हिन्दी को दुनियाभर में प्रचारित करने वाले ये गीत ‘गिलहरियों’की तरह है जो बीजों को पूरी दुनिया में फैला देती है।

URL: Bollywood hindi songs are india’s ‘cultural ambassadors’

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Vipul Rege

Vipul Rege

पत्रकार/ लेखक/ फिल्म समीक्षक पिछले पंद्रह साल से पत्रकारिता और लेखन के क्षेत्र में सक्रिय। दैनिक भास्कर, नईदुनिया, पत्रिका, स्वदेश में बतौर पत्रकार सेवाएं दी। सामाजिक सरोकार के अभियानों को अंजाम दिया। पर्यावरण और पानी के लिए रचनात्मक कार्य किए। सन 2007 से फिल्म समीक्षक के रूप में भी सेवाएं दी है। वर्तमान में पुस्तक लेखन, फिल्म समीक्षक और सोशल मीडिया लेखक के रूप में सक्रिय हैं।

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