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जब लेखक को लोग भूल जाएं और कृति को याद रखें तब कोई किताब रचती है एक इतिहास!

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इंडिया स्पीक्स डेली के प्रधानसंपादक और लेखक संदीप देव एक खोजी पत्रकार रहे हैं! उन्होंने भारत के कम्युनिस्टों के शुरूआती दौर के इतिहास पर ‘कहानी कम्युनिस्टों की’ के नाम से प्रथम खंड लिखा है! कम्युनिस्टों के स्याह इतिहास लिखी इस किताब को अपेक्षानुसार पाठक वर्ग ने हाथों हाथ भी लिया नतीजा यह कि राजनैतिक किताबों की श्रेणी में ये किताब हिंदी में होने के बाद भी सातवें स्थान तक जा पहुंची! कम्युनिस्टों के हर झूठ को बेनकाब करती यह किताब युवावर्ग में खासी लोकप्रिय रही है! इस पुस्तक की लोकप्रियता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि इसके दूसरे भाग के लिए लगातार मेसेजे और मेल आ रहे हैं! इसमें लिखे तथ्यों से सोशल मीडिया, वामपंथी वेब द्वारा फैलाये झूठे नरेशन को पाठक ध्वस्त कर रहे हैं! पाठको द्वारा इस किताब पर कई समीक्षाएं और आंखों देखा संस्मरण आया हैं। ऐसा ही एक संस्मरण ट्रेन से अनुराग सिंह राठौड़ ने हमें लिखकर भेजा है आप भी पढ़िए…

सर आपको बहुत बधाई , बताते हुए हर्ष हो रहा है कि आपके जलाए हुए दिए की रोशनी हर तरफ पहुंचने लगी है। मैं इंदौर से मुम्बई ट्रैन में यात्रा कर रहा हूँ और मेरे बगल के साइड लोअर बर्थ पर एक सज्जन आपकी किताब ‘कहानी कम्युनिस्टों की’ पढ़ रहे थे! उनके चेहरे के भाव पल-पल बदल रहे थे। मैं लगातार उनको देख रहा था और वे बिना पलक झपकाए किताब में खोए हुए थे ऐसा लग रहा था कि अपलक ही पूरी किताब को पढ़ लेंगे।

मुझसे रहा नही गया और मैं भी ऊपर की बर्थ पर लेटे-लेटे बोर हो चुका था। सोचा जरा इनसे थोड़ी बात की जाए। पूछा तो जाए कि इनकी इस किताब के बारे में क्या धारणा है? मैं उनके पास गया और विनम्रता पूर्वक उनसे बगल में बैठने आग्रह किया। उन्होंने मुस्कुराते हुए अपने पैरों को थोड़ा सिकोड़ कर सिर हिलाने हुए अनुमति दे दी। मैंने उनसे पूछा ये कौन सी किताब है? मेरा पूछना था कि उनकी आंखों में चमक आ गयी लगा जैसे वह किसी से अपनी मन की प्रतिक्रिया बताने के लिए उतावले हो रहे हैं और उसके बाद बीस मिनट तक मुझे आपकी किताब ‘कहानी कम्युनिस्टों की’ के बारे में बताते रहे।

मैंने भी चुटकी लेते हुए कहा कि होगा कोई छोटा मोटा लेखक, कॉपी पेस्ट के जमाने में किसको लेखक कहा जाए? इतना सुनते ही वह सज्जन मुझ पर भड़क गए और बोले” तुम लोग पढ़ना नही चाहते और देखना एक दिन यही रीजन होगा भारत के पतन का!” शायद आपके प्रति मेरे द्वारा किया गया कटाक्ष उन्हें अच्छा नही लगा। एक लेखक के लिए इससे बड़ा पारिश्रमिक क्या होगा कि पाठक अपने लेखक के लिए उठ खड़ा हो जाये! आगे उन्होंने कहा कि मुझे नही पता यह लेखक कौन है लेकिन ठोस और गूढ़ विषय को बड़ी सरल भाषा में लिखा है! पूरा खोल कर रख दिया है आज की कलुषित सोच को।

इसके बाद मैंने उन्हें आप के बारे में बताया। उनसे अच्छे से दोस्ती हो गयी थी मेरी। उन्होंने चाय भी पिलाई वह भी अपने पैसे से और हर घूंट के बाद कांग्रेस और कम्युनिस्ट को देश के लिए घातक कह रहे थे।

साभार: अनुराग सिंह राठौड़

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