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बिल्ली और फेमिनिज्म : यात्रा

सोनाली मिश्रा। प्रकृति से दूर हुए मानव की निर्बलता देखनी है तो प्रसव क्रिया में देखिये. कल रात को अंतत: वह वह घड़ी आई जब वह बिल्लो उस पीड़ा से दो चार हो रही थी, जिस पीड़ा की मैं दो बार साक्षी होकर भी नहीं थी क्योंकि दोनों ही बच्चे ऑपरेशन से हुए थे. इसलिए प्रसव पीड़ा का नहीं हां, उससे पहले और उसके बाद एनेस्थीसिया का असर खत्म होने के बाद की पीड़ा का अनुभव था.

पर कल शाम से वह मेरे पास से कहीं नहीं जा रही थी. कल दोपहर से बस यही चाह रही थी कि मैं उसका सिर सहलाती रहूँ. जैसे ही मैं उसका सिर सहलाना बंद करके लैपटॉप पर कुछ टाईप करने चलूँ, वह तेजी से चीखे, और उसकी आँखें? क्या होता है उस समय उस दृष्टि में, जब वह जीवन का सृजन करने जा रही थी. उसकी आँखें पीड़ा से या कहे बेचैनी से बहुत अधिक खुलती जा रही थीं. वह बैठे और फिर उठ जाए,

दूध पिए और फिर आकर मेरे पैरों में लेट जाए. फिर लेट भी न पाए और मेरा हाथ अपने सिर पर रखने की जिद्द करे. आद्या और अक्षित बेचैन हो रहे थे और बोले “माँ यह आपको क्यों परेशां कर रही है?” मैं उसका दर्द समझ पा रही थी क्योंकि जब मेरे जीवन में दोनों ही बार यह चरण आया था तब मेरे सिर पर माँ भगवती का हाथ इसी प्रकार स्नेह से रहता था. उनके अतिरिक्त कोई भी उस समय मेरे पास नहीं था.

मैं उस अकेलेपन की पीड़ा को समझ सकती थी. फिर मैं खाना बनाने के लिए घर चली गयी. वह ऑफिस वाले फ़्लैट में ही रही. आद्या के साथ! मैं एक घंटे में आई, उसके बाद वह फिर से मेरे पास आ गयी. मुझे लगा कि उसके आज बच्चा हो जाएगा, और फिर इन बच्चों का शोर होगा, मैंने उसे बाहर भगा दिया.

और फिर एक अजीब सी बेचैनी दिल में होने लगी. बार बार हाथ उसी स्थान पर जाए जहाँ पर वह बैठी रहती थी और फिर भगवान से कहा “भगवान जी, प्लीज़ मुझे क्षमा करें!” और जैसे ही यह कहा वैसे ही उसकी बेचैन करने वाली आवाज बहर से आई. वह दरवाजे पर बैठी थी. हमने दरवाजा खोल दिया और फिर दो घंटे वह उसी प्रकार बेचैन रही. और फिर अंतत: बाथरूम में जाकर बैठ गयी. और फिर उसने संकेत दिया कि अब मैं भी जाऊं!

फिर थोड़ी देर बाद उसकी सारी बेचैनी शांत हुई और कल उसके दो बच्चे हुए हैं. हालफिलहाल बाथरूम घेर कर रख लिया है. रात को एक बजे के बाद से वह तो शांत हैं, मगर अब हम ऑफिस वाले फ़्लैट में बाथरूम नहीं जा सकते क्योंकि वहां पर बिना आँख खुले उनके छुटकू पुटकू अपनी माँ को खोज रहे हैं!

सुबह चार बजे जब देखा तो वह सो रही थी.

प्रसव को प्रकृति ने कितना सहज बनाया है, और हमने कितना जटिल! मानव ही प्रकृति से सबसे दूर है और सबसे जटिल जीवन मानव का है! जितना जितना मानव मशीनों के निकट जा रहा है, उतना ही जीवन और मृत्यु दोनों ही जटिल बनाता जा रहा है. न ही जन्म के समय भगवान और प्रकृति का नाम है और न ही मृत्यु के समय!

मृत्यु के समय तो मशीनों के बीच ही वह जाता है, और जो यात्रा अगले जन्म की सहज यात्रा होनी चाहिए वह भी ऐसी बन जाती है कि घरवाले ही सोचने लगते हैं, कि इतना पैसा इनके इलाज में लगा अब संस्कारों में भी लगाओ, जबकि संस्कार कितने आवश्यक हैं, यह हम सभी जानते हैं.

फिर भी मशीनें आवश्यक हो गईं और संस्कार और प्रकृति अनावश्यक! क्या विकास इसी को कहते हैं या विकास का अर्थ है उस शक्ति से मिलने, इस प्रकृति के साथ एकाकार होना

मैं भ्रमित हूँ, क्योंकि मशीनों में पगा मानव एक दिन नष्ट होगा ही, उसे नष्ट होना ही है, क्योंकि यदि मशीनों को ही शासन करना होगा तो मानव निर्मित मशीनें ही शासन करेंगी, मानव के रूप में मशीनें नहीं! हम विनाश की ओर धीरे धीरे बढ़ रहे हैं, अब यह कितनी शीघ्रता से होगा, बस यही देखना शेष है!

बिल्डिंग में अंतत: यह समाचार फैल गया कि हमने बिल्ली को शरण दी थी और उसके बच्चे हुए हैं. दरअसल इस बड़ी सी बिल्डिंग में नीचे से लेकर ऊपर छत तक घूमने वाली और किसी बच्चे को गलती से भी हानि न पहुंचाने वाली इस प्यारी बिल्ली से कई लोगों को समस्या थी. नहीं, नहीं सूसू पॉटी उसने कभी ऐसी जगह नहीं की कि किसी को समस्या हो!

वह कबूतर खाती है. अब इससे समस्या होनी चाहिए थी हम जैसों को जो प्याज भी गिना चुना या न्यूनतम खाते हैं. मगर इस बात से समस्या थी ऐसे लोगों को जिनकी संस्कृति में जब तक मछली न बने तब तक भोजन पूरा नहीं होता है!

बच्चों के अनुसार कई और लोगों को. कई ऐसे लोग थे जिन्हें इस बिल्ली से प्यार था, मगर प्रसव पीड़ा से बेचैन हो रही बिल्ली को इसलिए भगा दिया कि गंदगी न कर दे! वह जहाँ भी शरण लेने पहुँची सभी ने उसे भगा दिया! जबकि यह फ़्लैट उसी का है! वह भाग आई इधर ही!

मैं लोगों के इस दोगले रवैये से दुखी हो जाती हूँ. क्या लाभ दिन भर हरे राम, हरे कृष्ण गाने का, जब आपके हृदय में उसकी रचना के लिए अथाह घृणा है? मानव अपनी चेतना के उस द्वार तक एक दिन पहुँचता ही है जब उसके लिए आहार संभवतया वायु ही रह जाए. परन्तु पशु? उसे आप उसकी प्रवृत्ति के अनुसार कुछ खाने से कैसे रोक सकते हैं? मैंने इस बिल्ली के लिए बहुत गाली सुनी हैं, जितनी शायद किसी अपने के लिए भी न सुनी हो! न जाने कौन सा नाता है इससे! बच्चे बड़े होंगे तो चली ही जाएगी, कौन किसी के साथ सदा के लिए रहता है?

मैं उसकी पीठ पर लगी चोट से भी सिहर गई थी. वह मेरे पास रात में आकर लेट जाती है. खैर अब मैं कमरा बंद करके सोती हूँ, क्योंकि वह पूंछ फैलाकर सोती है और उसकी पूंछ पर हाथ चला जाए तो खैर नहीं!

उसके बच्चे अपने आप दूध पीने लगें तो उसके लिए दरवाजा खोल दूंगी, चली जाएगी! मैं जब उसे उसके बच्चों के साथ सोते हुए और एक ऐसी नींद में सोते हुए देखती हूँ, जैसी मैं अपने अक्षित के साथ सोती थी. तो मुझे उस पर लाड़ उमड़ आता है. यह कैसी भावना है, मैं समझ नहीं पा रही हूँ. एक बिल्ली जैसे मेरे मन के बंधन तोड़ती जा रही है.

फिर मुझे वह लोग याद आती हैं, जो एकदम से घर में प्रवेश करके यह देखने चली आई थीं कि “बिल्ली के बच्चे हो गए क्या? गंदगी नहीं की उसने?” हमारा धर्म इसी एकता की बात करता है. जब जीवात्मा के मध्य यह बोध ही समाप्त हो जाए कि देह क्या है?

उसने मुझे स्वीकारा है, बिना किसी शर्त के, बिना यह कहे कि मैं भी बिल्ली हो जाऊं? प्रेम में बंधन होता ही कहाँ है? प्रेम तो बंधन तोड़ता है. जीवात्मा जब वृक्षों से प्रेम करती है तो उसकी एक पत्ती के टूटने से भी कांप उठती है पीड़ा से और जब अपनी प्यारी बिल्ली या अपनी शाइला से प्यार करती है तो शाइला मेरी ही प्लेट से ढाई रोटी खा जाती है!

यह प्रेम है! यही परमपिता के साथ एकाकार होने की शर्त है कि प्रेम करो, परन्तु प्रेम का वह अर्थ कतई नहीं है जो फेमिनिस्ट बताती हैं! प्रेम को अनुभव करने के लिए प्रेम हृदय में होना ही चाहिए

बिल्ली के दोनों बच्चों की आँखें खुल गयी हैं आज! और आज हमने बिल्ली को घर से बाहर जाने दिया. बिल्ली शिकार करने के लिए बेचैन हो रही थी.

जरा सोचिये, बिल्ली जो मात्र दस दिन पहले एक ऐसी प्रसव पीड़ा से दो चार होकर बच्चे पैदा करके निढाल पड़ी थी, जिस प्रसव पीड़ा के कारण औरतें* (यहाँ मैंने औरतें जानबूझकर ही लिखा है, क्योंकि स्त्री कभी भी सृजन के लिए पीड़ा का अनुभव नहीं करती) पूरा एक या दो महीना आराम करते हुए और परिवार और समाज पर अहसान जताते हुए ताना मारती हैं.

काम पर नहीं जाती हैं. उधर बिल्ली को पता है कि शिकार करना उसकी स्किल है. उसका जीवन उसी शिकार पर चलेगा. उसे वह दूध चाहिए ही नहीं, जो हम उसे दे रहे हैं. पिछले तीन दिनों से वह दूध सूंघ कर छोड़ देती थी. उसे अपने श्रम का भोजन चाहिए था.

पशुओं से आप यह सीख सकते हैं, कि वह समाज पर अहसान जताए बिना मात्र अपने कर्मपथ पर चलते हैं. वह परसों पूरे घर में दीवारों पर कूद रही थी कि उसे बाहर जाने दिया जाए. परन्तु मैं इस बात पर टिकी थी कि जब तक उसके बच्चों की आँखें नहीं खुलेंगी, वह नहीं जाएगी!

बिल्ली को मैं कल शाम को बड़ी छत पर ले गयी! वहां पर मैंने देखा कि कैसे वह शिकार करने में अक्षम हो रही है. क्योंकि दस दिनों से तो मेरे पास ही कैद है! वह असफल हो कर आए और मेरी ओर देखे! एक विवशता से! मैं उसकी विवशता देखकर अजीब सी भावना से भरी जा रही थी.

कहाँ फेमिनिस्ट बार बार औरतों को सृजन के आनंद से दूर करती हैं और कहाँ यह सृजन के आनंद के साथ साथ इस चिंता में भी है कि कहीं वह अपनी बेसिक स्किल अर्थात शिकार करना न भूल जाए! बिल्लियों में फेमिनिज्म नहीं होता, तभी बिल्ली अपनी स्किल को ब्रशअप कर रही है.

वह कर्मठ है. फेमिनिज्म आपको कर्मठता से दूर करके मात्र शिकायत करना सिखाता है. बिल्ली का मातृत्व एक सुगठित मातृत्व है, जिसमें बच्चों के विकास के साथ साथ स्वयं का विकास सम्मिलित है. जैसा भारत में पहले पाया जाता था कि माँ ही बच्चों की प्रथम गुरु हुआ करती थी.

परन्तु कैसी माँ? फेमिनिज्म से कोसों दूर बैठकर उन्हें अपने पूर्वजों की कहानियाँ सुनाती माँ, उन्हें दुर्गा माँ की शक्ति का स्मरण कराती माँ और उन्हें उनकी जन्मों की चेतना का स्मरण कराती माँ!

दुर्भाग्य से फेमिनिज्म ने इस सहज मातृत्व की हत्या कर दी है. पशुओं के मातृत्व को अनुभव कीजिये, वह आपको मातृत्व का मूल सिखाएंगे. वह बताएँगे कि मातृत्व का अर्थ स्वयं की स्किल्स का नाश नहीं होता. वह बताएँगे कि मातृत्व का अर्थ स्वयं की पूर्णता और आह्लाद है, विक्टिमाइज़ेशन नहीं!

बिल्ली के पास आइये और फेमिनिज्म से दूर जाइए!

बिल्लियों में सेरेलेक और फेमिनिज्म नहीं होता है, इसलिए माँ होती है!

बिल्ली तब तक बच्चों को दूध पिलाती है जब तक वह चाहते हैं. एक ही मुद्रा में लेटी रहती है. वह फेमिनिज्म से पीड़ित औरतों की तरह कराहती नहीं है, या फिर यह नहीं कहती कि मेरा फिगर खराब हो रहा है, इसलिए मैं दूध नहीं पिलाऊंगी, सेरेलेक ले आओ!

बिल्ली फिर सहज हो जाती है. दूध पिलाकर वह देखती है कि बच्चों की आँखें खुल गयी हैं. और अब वह उनसे दूर जाकर बैठ गयी है. वह उन्हें चलाने की प्रैक्टिस करवा रही है. वह उन्हें गिरने देती है, फेमिनिस्ट डीडी लोगों की तरह उन्हें नजाकत से थामती नहीं!

दादी कहा करती थीं, बच्चा जब चलना सीखे तो उसे छोड़ दो अकेला, बस ध्यान रखो उसका कि कहीं तेज न गिरे, नहीं तो छोड़ दो! मगर आजकल औरतें नहीं करती हैं. वह बच्चों को वॉकर में बैठा देती हैं. चलता रहे, कौन देखे?

मगर बिल्ली ऐसा नहीं करती! बिल्ली को एक कुशल नागरिक बनाना है. बिल्ली को एक अपनी परम्पराओं को उन्हें सौंपना है सो उनके पैर, जितनी जल्दी चलना सीख जाएँ उतना बेहतर!

बिल्ली के पास नानी या दादी नहीं है, परन्तु उसके पास दादी और नानी की सहेजी विरासत है. जब वह दूध पिलाती है तो कहीं न कहीं वह विरासत वह उनके खून में मिला रही है. मगर औरतें ऐसा नहीं करतीं! उनके पास बच्चों को विरासत देने के अतिरिक्त बहुत काम है. उन्हें आराम करना है, उन्हें अपना विक्टिम कार्ड खेलना है और उन्हें यह भी बताना है कि माँ बनकर उन्होंने दुनिया पर कितना बड़ा अहसान किया है!

बिल्ली ने अपनी विरासत आउटसोर्स नहीं की है. औरतों ने कर दी है! इसलिए बिल्ली सहज है और औरतें कुंठित और हारमोन का रोना रोने वाली! बिल्ली को पता है कि वही बच्चों की प्रथम गुरु है, इसलिए जितना अधिक हो सकती है उनके साथ रहती है. औरतों को गुरु आदि से मतलब नहीं है इसलिए वह पौने दो साल का होते ही किसी ऐसे प्ले स्कूल में डालती हैं, जो बच्चों को विरासत से काटता है.

औरतें कहती हैं “जल्दी जाए स्कूल, तो आराम आए!” बिल्ली धैर्यपूर्वक अपनी दादी, नानी से मिली विरासत अपने बच्चों में तब सौंपती है जब वह इस योग्य हो जाते हैं.

पर औरतों के पास इतना समय नहीं है, उन्हें बच्चों के लिए धन निवेश करना है जिससे बच्चे उनका बुढापे में ध्यान रख सकें! बच्चा उनके लिए निवेश है, जबकि बच्चा बिल्ली के लिए उसके वंश की परम्परा को आगे ले जाने वाला है. निवेश कैसे परम्परा से जीत सकता है. इसलिए आज औरतें बच्चों के बाद फिगर का रोना रोती हैं और बिल्ली बिना कुंठित हुए उसी फिगर को पा लेती है.

निवेश को परम्परा से हारना ही है इसलिए आज बेटा अपनी माँ को बुढ़ापे में वृद्धाश्रम में छोड़ जाता है, पर बिल्ली को अपने पर विश्वास है, उसे अपनी दादी और नानी की परम्परा पर विश्वास है कि जो ज्ञान अर्थात शिकार करने का ज्ञान उन्होंने दिया है, वह सदा साथ रहेगा, इसलिए बिल्ली आत्महत्या नहीं करती!

बिल्ली ज्ञान को पिछड़ापन नहीं मानती! औरतें मानती हैं. दादी और नानी की बड़ियाँ बनाने की कला और ज्ञान को औरतों ने अत्याचार माना और छोड़ दिया सब!

बिल्ली ने जीवन में अपने परम्परागत ज्ञान में निवेश किया तो जीतती गयी और औरतों ने अपने परम्परागत ज्ञान को त्यागा जो उनके परिवार की स्त्रियों के पास सदियों से था, तो हारती गईं! और हारती जाएँगी क्योंकि बिल्लियों में फेमिनिज्म नहीं होता, बिल्लियों में स्त्रियों को औरतों में बदलने वाला फेमिनिस्ट जहर नहीं होता!

*बात औरतों की हो रही है, स्त्रियों की नहीं!

बिल्ली झूठे विश्वास पर नहीं जीती, इसलिए छली नहीं जाती

जहाँ बिल्ली ने अपने बच्चे रखे थे अर्थात रसोई में, वहां पर हम दिन में कई बार जाते हैं, इसलिए बिल्ली ने अपने बच्चों को सुरक्षा के लिए फिर से वहीं रख दिया है, जहाँ पर उसने पहले रखे थे अर्थात बाथरूम में!

चूंकि बिल्ली को खतरा अनुभव हुआ कि बर्तन आदि धोए जाने पर उसके बच्चे गीले हो सकते हैं, इसलिए फिर वह एकांत में ले गयी है. उसके लिए किसी भी “विश्वास” से बढ़कर उसकी सर्वाइविंग स्किल या कहें जीवित रहना अधिक आवश्यक है! बिल्ली को पता है कि अभी उसके बच्चे को सुरक्षित रखना अनिवार्य है और साथ ही अभी से उनमें शत्रुबोध या खतरे का बोध कराना अनिवार्य है!

बिल्ली को पता है कि मैं उसकी शत्रु नहीं हूँ, परन्तु उसे यह भी पता है कि हर व्यक्ति ऐसा नहीं है, इसलिए उसने विश्वास की सीमा मुझतक ही रखी है. बिल्ली किसी “विश्वास” के झूठे सपने में नहीं जीती, उसे पता है कि कुत्ते और इंसान उसके शत्रु हैं, इसलिए वह उनसे दूरी बनाकर ही रखती है. वह अपने शत्रुबोध को जागृत रखती है!

उसे विश्वास नहीं जीतना, मगर राजनीति और फेमिनिज्म दोनों ही शत्रुबोध समाप्त करते हैं, और लड़कियों को परोस देते हैं “विश्वास” के सम्मुख! वह “विश्वास” के नाम पर शिकार करते हैं. बिल्ली अपने बच्चों को सिखा रही है कि भले ही हम कुछ दिन के लिए यहाँ हैं, परन्तु “विश्वास” नहीं करना है!

और वह अपने बच्चों के दिल में यह कहकर कुंठा भी नहीं भर रही है कि देखो, तुम्हें इन्सान या कुत्ते जैसे गुण भगवान ने नहीं दिए, इसलिए तुम गाली दो! बिल्ली को अपनी क्षमताओं का ज्ञान है, अपनी विशिष्टताओं का बोध है, वह युगों युगों से अपनी बिल्लियों की चेतना में समाहित ज्ञान से यह अपने बच्चों में विशिष्टता बोध जगाती है और भौतिक जगत में शत्रु बोध जागृत करती है.

उसे फेमिनिज्म की तरह उंगलियाँ बराबर नहीं करनी है, उसे समानता की बात नहीं करनी है, क्योंकि उसे पता है कि वह विशिष्ट है और जो विशिष्ट है, उसे न ही कृत्रिम समानता चाहिए और न ही थोपा हुआ “विश्वास”, क्योंकि उसे पता है कि यह दोनों उसे नष्ट कर देंगे. इसलिए वह अपने विशिष्टता बोध के विश्वास के साथ जीवित है.

उसे पता है फेमिनिज्म की कृत्रिम समानता या राजनीति का थोपा हुआ विश्वास उसकी प्रजाति को विलुप्त कर देगा, इसलिए उसे यह सब ध्यान नहीं है. वह कुत्ते का विश्वास जीतने का प्रयास नहीं करती है, वह बच्चों को स्पष्ट बताती है कि वह आपका शत्रु है. बिल्ली का सारा जोर अपने जीवित रहने पर है, जबकि फेमिनिज्म का सारा जोर विक्टिम कार्ड खेलने पर है. इसलिए बिल्ली प्रसन्नता की छाँव में स्वस्थ और जीवित रहती है और फेमिनिज्म कुंठित, जिसे वह हारमोंस का नाम देती हैं!

बिल्ली बताती है कि मातृत्व मोह का नहीं, मुक्ति का नाम है! क्योंकि मातृत्व का अर्थ है अपने पुरखों के द्वारा संरक्षित ज्ञान की परम्परा को अक्षुष्ण एवं निरंतर बनाए रखना! बिल्ली को यह भली भांति ज्ञात है कि इस धरा पर आप अपना पीढ़ियों का ज्ञान सुरक्षित करने के लिए आए हैं, अत: बिल्ली अपना ज्ञान, अपने पूर्वजों का दिया गया ज्ञान अपनी बच्चियों को सौंप कर मुक्त हो जाएगी, परन्तु औरतें फंसी रहेंगी क्योंकि उनके जीवन में ज्ञान का स्थान है ही नहीं, उनके लिए संतान मोह है या निवेश है!

उनके लिए बच्चों के विवाह के बाद और शिकंजा कड़ा करना मुख्य उद्देश्य है जिससे बच्चे अपनी गृहस्थी में प्रसन्न न रह पाएं और अपनी छोटी मोटी समस्याओं को उनसे साझा करे, क्योंकि उन्होंने ज्ञान तो दिया ही नहीं है अपनी बच्चियों को, उन्होंने “थोपा हुआ विश्वास और कृत्रिम समानता दी है”, जबकि बिल्ली ने अपने तमाम ज्ञान, तमाम कौशलों को अपनी बच्चियों में सौंप दिया है, इसीलिए उसकी बच्चियां जहां जाएँगी वहां अपना संसार बसा लेंगी, पर औरतों की संतानें बंधी रहेंगी, वह मोह से बंधी हैं, बिल्ली वानप्रस्थ के सिद्धांत पर जीती है और औरतें मोह में!

वह अपनी बच्चियों की ज़िन्दगी अपने हस्तक्षेप से नरक बनाती हैं और बिल्ली अपनी विरासत सौंप कर मुक्त हो जाती है और मुक्त होकर ही आगे की यात्रा करती है, पर फेमिनिज्म के जाल में फंसी औरतें पीढ़ी दर पीढ़ी विष सौंपती हैं, और सौंपती हैं अपनी कुंठा, जिससे उनकी बेटियों का परिवार भी अतिशय मोह में फंसकर टूटता है!

जो लोग कहते हैं कि पशुओं में ज्ञान नहीं होता, उन्हें पता ही नहीं है कि ज्ञान अंतत: होता क्या है?

बिल्ली धीरे धीरे फेमिनिज्म के सारे विष को बाहर निकाल रही है

बिल्ली को अपनी भाषा से प्रेम है, इसलिए वह भटकाव का शिकार नहीं होती

बिल्ली कल से अपने बच्चे मुझसे दूर किए हुए है, और मजे की बात है वह खुद मुझसे दूर नहीं है. अपने बच्चों को सुलाकर मुझसे प्यार करवाने के लिए मेरी गोद में बैठ रही है. मैं सुबह लेटी थी, तो अचानक से मेरे बगल में आकर लेट गयी और म्याऊँ कहा, माने मैं प्यार करूँ!

मैंने कहा “तुमने अपने बच्चे मुझसे दूर किए, मैं तुमसे प्यर नहीं करूंगी!” पर उसने हर नहीं मानी और मुझसे प्यार करवाया.

दरअसल मुझे लगता है कि बिल्ली चाहती है कि जब उसके बच्चों में अपनी बुद्धि आए तब वहदूसरे की भाषा सीखें. वह बच्चों को पहले अपनी भाषा से परिचित कराना चाहती है, फिर वह चाहती है  कि दूसरे की भाषा सीखें. बिल्ली को पता है कि उसकी भाषा में संवाद करना ही उसके बच्चों के विकास और सुरक्षा के लिए श्रेयस्कर है. 

उसे पता है कि इंसान की भाषा के संकेत और बिल्ली की भाषा के संकेत दोनों अलग अलग हैं.

पर औरतें ऐसा नहीं करतीं. वह अपनी संतानों को छोटे से ही दूसरे की भाषा में पारंगत करती हैं. वह अपने बच्चों को अपनी ही भाषा से दूर करती हैं. और सगर्व कहती हैं कि “हमारे बच्चे को हिन्दी नहीं आती!” मगर बिल्ली में अपनी भाषा को लेकर कोई आत्महीनता नहीं है. बिल्ली के लिए अपने बच्चों का आतंरिक विकास महत्वपूर्ण है, वह कुत्ते की भाषा सिखाकर उसे जोकर नहीं बनाना चाहती.

पर औरतें करती हैं. वह बच्चों से ठुमके लगवाती हैं, बच्चों को प्रेम के स्थान पर मोहब्बत और इश्क सिखाती हैं. कौवे के स्थान पर क्रो बताती हैं. जिस चन्द्र को देखकर कान्हा जी मचल जाते हैं कि मैं चन्द्र खिलौना लैन्हो, उस चन्द्र को वह मून कहकर तमाम कल्पनाओं और उपमाओं का नाश करती हैं और बच्चे के आंतरिक विकास को रोक देती हैं.

बिल्ली को पता है कि कुत्ते की भाषा के संकेत उसकी अपनी प्रजाति के लिए हैं, बिल्ली के लिए नहीं, इसलिए वह अपनी भाषा में ही बच्चे को पहले सिखाना चाहती है. परन्तु औरतें ऐसा नहीं करतीं. औरतें अपने बच्चों को रियल्टी शो में जाने के लिए “अनारकली डिस्को चली” या “राधा ऑन द डांस फ्लोर” पर ठुमके लगवाती हैं.

बिल्ली को पता है कि कुत्ते जब शिकार कहते हैं, तो उसका अर्थ वह स्वयं हैं, परन्तु फेमिनिस्ट खुद ही हिन्दू लड़कियों को “बुत गिरवाने” वाली नज्में पसंद करवाती हैं और इन बुतों को तुड़वाने वाली नज्मों के चलते दुष्यंत की गजलों को भुला देती हैं. वह खुद गाती हैं. “खोजती हैं काफिर आखें किसका निशाँ!” उनका बेटा डांस करता है ““ए गनपत चल दारू ला!” पर!

वह खुद नुसरत फतेह अली खान की कव्वाली गाती हैं

“कुछ तो सोचो मुसलमान हो तुम,

काफिरों को न घर में बिठाओ,

लूट लेंगे ये ईमां हमारा,

इनके चेहरे से गेसू हटाओ!”

इन औरतों को अपनी भाषा में प्रेम पसंद नहीं है. प्रेम का अर्थ सत्य, सनातन, शाश्वत! प्रेम का अर्थ है त्याग भी, तपस्या भी! प्रेम का अर्थ है महादेव और माँ पार्वती! जन्मजन्मातर शाश्वत प्रेम को लेकर औरतें भय खाती हैं, इसलिए वह ताजमहल वाली मोहब्बत चुन लेती हैं.

वह रामसेतु वाला प्रेम नहीं चुनती हैं!

वह प्रतीक्षा नहीं चुनती, वह धैर्य नहीं चुनती,

वह हवस और वासना चुनती हैं

वह अपनी भाषा पर दूसरी तहजीब की उस भाषा को प्राथमिकता देती हैं, जो उनके विनाश की कामना करती हैं, इसलिए जीवन भर कुंठित रहती हैं. परन्तु बिल्ली को अपनी ही भाषा पर गर्व है, उसके जीवन में भय नहीं है,  इसलिए वह अपने कातिलों की भाषा नहीं अपनाती, वह अपनी भाषा पर टिकी है, क्योंकि उसने प्रकृति के साथ स्वयं को एकाकार किया हुआ है.

बिल्ली मात्र बिल्ली नहीं है, यह हम कब समझेंगे

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Sonali Misra

सोनाली मिश्रा स्वतंत्र अनुवादक एवं कहानीकार हैं। उनका एक कहानी संग्रह डेसडीमोना मरती नहीं काफी चर्चित रहा है। उन्होंने पूर्व राष्ट्रपति कलाम पर लिखी गयी पुस्तक द पीपल्स प्रेसिडेंट का हिंदी अनुवाद किया है। साथ ही साथ वे कविताओं के अनुवाद पर भी काम कर रही हैं। सोनाली मिश्रा विभिन्न वेबसाइट्स एवं समाचार पत्रों के लिए स्त्री विषयक समस्याओं पर भी विभिन्न लेख लिखती हैं। आपने आगरा विश्वविद्यालय से अंग्रेजी में परास्नातक किया है और इस समय इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय से कविता के अनुवाद पर शोध कर रही हैं। सोनाली की कहानियाँ दैनिक जागरण, जनसत्ता, कथादेश, परिकथा, निकट आदि पत्रपत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं।

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