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बंगाल में ममता की हिंसा और भाजपा की चुप्पी के नतीजे!

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अरुण मिश्रा। बंगाल की मुख्यमंत्री Mamata Banerjee विधानसभा चुनाव बाद हिंसा से साफ इन्कार करती रही हैं। जो की सरासर झूठ है। पिछले गुरुवार को उन्होंने केंद्र, भाजपा और राज्यपाल जगदीप धनखड़ की ओर से लगाए गए हिंसा के आरोपों को खारिज करते हुए उल्टा उन सभी पर ही निशाना साध दिया था।

ममता ने साफ कहा था कि ‘छिटपुट घटनाओं को छोड़कर सूबे में सियासी हिंसा की कोई वारदात नहीं हो रही। ऐसा लगता है कि उनकी आंखों में पीलिया है। जैसे पीलिया होने पर सबकुछ पीला दिखता है, उसी तरह उन लोगों को बंगाल में हर तरफ हिंसा दिख रही है।’

ममता दीदी को पता होना चाहिए की वो सच्चाई से अधिक देर तक मुंह नहीं मोड़ सकती है। और यही बात एक दिन बाद ही कलकत्ता हाई कोर्ट में परसो रविवार जो की लगभग #NoMediaDay होता है को प्रमाणित हो गई।

ममता उनकी सरकार और सरकार के मंत्री लगातार हिंसा से इन्कार करते रहे परंतु जिस बंगाल सरकार के मामले पर सुप्रीम कोर्ट की जज मुकदमे से हट गई है उसी मामले पर हाई कोर्ट की मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पांच जजों की पीठ से ममता सरकार को सिर्फ कड़ी फटकार ही नहीं मिली, बल्कि राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) को समिति गठित कर जांच करने का भी निर्देश दे दिया गया।

इससे साफ हो गया कि सूबे में चुनाव बाद हिंसा हुई है। आने वाले समय में ये और भी क्लियर हो जायेगा की ये राजनीतिक हिंसा ही थी। जिस प्रकार बंगाल में भाजपा कार्यकर्ताओं को विशेष करके महिला कार्यकर्ताओं व पुरुषो के परिवार की महिलाओं को टारगेट किया गया है वो भी आपको दिखाई देने लगेगा।

ऐसे में यह सवाल उठता है कि आखिर ममता ने पहले सूबे में सियासी हिंसा होने से क्यों इन्कार किया? इसके बाद जब एनएचआरसी को समिति गठित कर जांच करने को कहा गया तो इसका विरोध क्यों कर रही थी? अगर बंगाल में ममता की पार्टी द्वारा हिंसा हुई ही नहीं हुई है तो फिर कोर्ट के निर्देश पर पुनर्विचार की मांग क्यों करने लगी थी ममता बनर्जी?

इन सबसे तो यही समझ में आ रहा है कि हिंसा हुई है। क्योंकि पिछले सप्ताह ही भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष दिलीप घोष ने कहा था कि ‘चुनाव बाद हिंसा में अब तक उनके 42 पार्टी कार्यकर्ताओं की हत्या हो चुकी है और हजारों लोग भय से घर छोड़ने को मजबूर हैं। ये सभी घटनाएं स्पष्ट रूप से हिंसा के आरोपों को ही प्रमाणित कर रही हैं।’

वही असम के मुख्यमंत्री हेमंत विस्वा शर्मा जी का भी बयान है की बंगाल चुनाव के बाद लाखो लोग बंगाल से आम में शरण लेने शरणार्थी रूप में आए है। इसमें भी ज्यादातर हिंदू समुदाय से ही है। इसके अलावा 18 जून को हाई कोर्ट की वृहतर पीठ का निर्देश आने से चार दिन पहले राज्यपाल धनकर ने बंगाल की महिला मुख्यमंत्री ममता को पत्र लिखकर कहा था कि ‘राज्य सरकार चुनाव बाद की हिंसा से लोगों को हुई पीड़ा को लेकर निष्क्रिय और उदासीन रही है।’

हाई कोर्ट के कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश राजेश बिंदल, न्यायमूर्ति आइपी मुखर्जी, हरीश टंडन, सोमेन सेन और सुब्रत तालुकदार की पांच सदस्यीय पीठ ने साफ कहा कि ‘चुनाव के बाद हुई हिंसा के कारण राज्य के तमाम लोगों का जीवन और संपत्ति खतरे में होने का आरोप है। ऐसे हालात में राज्य को अपनी पसंद के अनुसार काम करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।

राज्य सरकार को यह बात ध्यान में रखनी चाहिए कि कानून व्यवस्था को बनाए रखना और लोगों में विश्वास पैदा करना उसका कर्तव्य है। लोगों की शिकायतों पर तत्काल कार्रवाई की जानी चाहिए। हमले की आशंका से ही लोग अपने घरों को लौटने से डर रहे हैं। पहले तो राज्य सरकार इन आरोपों को मान ही नहीं रही थी, पर हमारे पास कई घटनाओं की जानकारी और सुबूत हैं। इस तरह के आरोपों को लेकर सरकार चुप नहीं रह सकती।

अब टीएमसी सरकार क्या हाई कोर्ट की इस टिप्पणी को भी नकारा जा सकती है? हो सकता है जिस प्रकार टीएमसी अपना बचाव करती हैं वो कह दे की न्यायधीश महोदय कोर्ट में बैठ के बात कर रहे हैं जो की आसान है वो जमीन पर आ कर सच्चाई को देखे।

हिंसा को लेकर सिर्फ हाई कोर्ट ही नहीं, बल्कि सुप्रीम कोर्ट में भी कई मामले लंबित हैं। भाजपा इस मुद्दे को लेकर ममता सरकार पर लगातार हमलावर है। इस आतंक से सीधे तौर पर तृणमूल कार्यकर्ताओं के जुड़े होने और हिंसा करने वालों को राज्य सरकार तथा पुलिस मशीनरी का संरक्षण प्राप्त होने के भी आरोप ऐसे ही नहीं लग रहे हैं। इन आरोपी में सत्यता तो है, जिसकी वजह से हाई कोर्ट को जांच का निर्देश देना पड़ा है। क्या राज्य के प्रशासनिक प्रमुख के इन्कार करने से हिंसा करने वालों का मनोबल नहीं बढ़ेगा?

इससे पहले जब राज्यपाल धनखड़ ने हिंसाग्रस्त इलाकों का दौरा किया था तो ममता सरकार ने इसका भी घनघोर विरोध किया था। जब राज्यपाल घनखड़ हिंसाग्रस्त इलाकों से पलायन करने वाले हिंदुवो से मिलने असम गए तो उसका भी तृणमूल ने विरोध किया। इसके बाद भी हिंसा को नकारा जाना और कोर्ट में विरोध करना क्या दर्शाता है? हाई कोर्ट की फटकार से ममता सरकार के रवैये पर सवाल उठना लाजिमी है।

अभी तीन दिन पहले बीरभूम जिले में 300 से अधिक भाजपा समर्थकों पर गंगा जल छिड़क कर उन्हें तृणमूल में शामिल कराया गया था। इसे क्या कहा जाएगा? यह सत्य है कि बंगाल जैसी चुनावी हिंसा देश के किसी भी राज्य में नहीं होती। ऐसा नहीं है कि तृणमूल के शासन में यह सब हो रहा है। इससे पहले कांग्रेस से लेकर वामपंथी शासकाल में भी हिंसा और सियासी हत्याओं की लंबी सूची है। वास्तव में सूबे में सत्ता तो बदलती है, लेकिन हिंसा नहीं थमती। राज्य में स्वस्थ लोकतंत्र के लिए यह हिंसा रुकनी चाहिए।

भाजपा इस मुद्दे अभी तक उतनी हमलावर नही दिखी जितनी होनी चाहिए इसके कार्यकर्ता का बलात्कार हो रहा है, भाजपा नेतृत्त्व एक शब्द बोल तक नही पा रहे हैं। यह दिखाता है बंगाल में भाजपा को जितना मुखर होने की जरुरत है उतना ये हुए नही है।

बंगाल प्रभारी चुनाव तक तो बंगाल में रहे परंतु जैसे ही चुनाव खत्म हुआ वापस चले गए। समझने वाली बात येभै की इनको जब अपने कार्यकर्ताओं के साथ दिखना चाहिए था इस समय ये उनसे दूर ही दिखे है।

भाजपा की ही एक कार्यकर्ता जिसका की 2019 में अबोर्सन तक हो गया था। वो दुबारा 2021 में भाजपा के तरफ खड़ी हो गई। चुनाव बाद हुई हिंसा में वो पुनः घायल हो गई। दुनिया के सबसे बड़े कार्यकर्ता वाली पार्टी के इस कार्यकर्ता के इलाज के लिए दूसरे कार्यकर्ता जनता से चंदा मांग रहें हैं। यह अगर किसी कार्यकर्ता के साथ खड़ा होना है तो आप ही बताईए क्या आप या कोई और प्रत्यक्ष रूप से इस पार्टी के साथ खड़ा होने की कोशिश भी करेगा।

हाईकोर्ट के जिस मुद्दे को भाजपा, उसके प्रवक्ता और नेता जमीन से लेकर आसमान तक उठा के घूम सकते थे उसके बदले सिर्फ वैक्सिन ही उठाया। भाजपा को अपने कार्यकर्ताओं का साथ देने आना होगा अगर नही आ रही है तो यह मान के चलिए अपने परिवार को दाव पर लगा करके कोई आपके लिए खड़ा नही हो सकता है।

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