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आक्रमणकारियों द्वारा दिये नामों का बोझ अब नहीं ढोएगी दिल्ली, हुई नाम बदलने की शुरुआत

दक्षिणी दिल्ली के ऐसे गांव हैं हुमायूं पुर, मोहम्मदपुर जिनकी पहचान हनुमान पुर और माधवपुर के रूप में है।

केवल दिल्ली के नाम पर ही विविध मत नहीं रहे हैं बल्कि यहां पर बने छोटे बड़े गांवों के नामों पर भी आक्रांताओं ने समय-समय पर अपने निशान छोड़े और लकीर की फकीर बनी दिल्ली उन नामों के बोझ को सालों बाद तक ढोती रही। इतिहास के पन्नों में जिन नामों को पढ़ते हुए मन घृणा, क्रोध से भर जाता है, उन्हीं नामों की सड़कों पर चलने को मजबूर होते हैं, उन्हीं नामों के इलाकों में रहते हैं और अपनी पहचान के तौर पर उन्हें ही अनचाहे भी लेकर चलते हैं।

अब एक बड़े बदलाव की जो बयार आई है उसमें इतिहास की इस भूल को सुधारने का सिलसिला शुरू हो गया है। दिल्ली ढिल्ली थी, शाहजहांनाबाद थी या फिर इंद्रप्रस्थ थी इसके गांव, हुमायूं, तैमूर, औरंगजेब या फिर मोहम्मदपुर तो तीन से चार सौ साल पहले तक पड़े होंगे, इनके वास्तविक नाम क्या थे। कई अभिलेख मिले, कई साक्ष्य मिले लेकिन नामों के बदलाव की बात नहीं हुई। जो इस दिशा में काम कर रहे हैं उनका कहना है कि यह बदलाव हमारी संस्कृति और सभ्यता की वास्तविक पहचान का प्रतीक बनेंगे। उन नामों को तलाशना होगा जो इन आक्रमणकारियों से पहले थे।

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गांव हुमायूंपुर जिसे अब एक बार फिर से हनुमानपुर करने का प्रस्ताव दक्षिणी नगर निगम में दिया गया है।

गांवों के नाम की कहानी: पुरातत्व विभाग, दिल्ली के पूर्व निदेशक और दिल्ली के 365 गांवों पर अध्ययन करने वाले डा. धरमवीर शर्मा का कहना है कि बात सिर्फ दो गांवों की नहीं है। दिल्ली में कुछ 365 गांव हैं और अधिकतर के नामों में विदेशी आक्रमणकारियों की छाप मिलती है। पहले दिल्ली पंजाब का ही हिस्सा था। जब पंजाब से अलग होकर दिल्ली सूबा बना तो यह हरियाणा की राजधानी था। पुरातत्व विभाग को इसके साक्ष्य भी मिले हैं। तेरहवीं शताब्दी में मिला सरवन अभिलेख इसकी पुष्टि करता है जिसमें इंद्रप्रस्थ मौजा हरियाणा लिखा हुआ है। दिल्ली ढिल्ली, ढिल्लू और ढिल्लिका होने से पहले पहले एक गांव से विकसित हुई थी। यह गांव किलोकड़ी था। जब यहां पर राजा ढिल्लू ने कील लगाई तो इसका नाम किलोकड़ी पड़ गया। इसी तरह से महरौली का नाम मिहिरावाली था जो आचार्य मिहिर के नाम पर रखा गया था। डा. धरमवीर का कहना है कि जो इतिहास पांच सौ सालों में पढ़ाया गया है वह गाइड की कहानियों के अलावा कुछ नहीं है।

पौराणिक इतिहासकार नीरा मिश्र का कहना है कि दिल्ली में गांवों के नामों के साथ मुगलों के समय में बहुत खिलवाड़ हुआ है। पहले हौज खास और सिरी फोर्ट के इलाके का नाम शाहपुर जट था। इसी तरह मनीष के गुप्ता बताते हैं कि एक बार भयावह बाढ़ आने के बाद यमुना पार के इलाके का नाम पटपड़गंज नाम पड़ा क्योंकि यहां सब कुछ पट पड़ गया था वरना मुगल शासन काल में इस जगह का नाम साहिबगंज हुआ करता था जो कि किसी मुगल बादशाह की प्रेमिका के नाम पर था।

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गांव मोहम्मदपुर का भव्य मंदिर। इस मंदिर से जुड़ी है ग्रामीणों की विशेष आस्था।

सब्जी मंडी और चुंगी था मोहम्मदपुर : अब आते हैं आजकल जिन गांवों के नाम के बदलाव की चर्चा है। हम बात कर रहे हैं मोहम्मदपुर गांव की। जिसका प्राचीन नाम माधव पुर था। इतिहासकार मनीष कुमार गुप्ता के अनुसार ऐसा कहा जाता है कि पृथ्वीराज चौहान को हराकर जब मोहम्मद गौरी ने उत्तर क्षेत्र पर अधिकार कर लिया था तब अपने गुलाम कुतुबुद्दीन ऐबक को गवर्नर बना दिया था और मोहम्मद गौरी वापस गजनी लौट गया था। अपने मालिक मोहम्मद गौरी की इच्छानुसार कुतुबुद्दीन ऐबक ने भारतवर्ष में इस्लाम को फैलाने की कोशिशें शुरू कर दीं और उन्हीं कोशिशों के पहले चरण में उसने स्थानों के नाम बदलने प्रारंभ किए और ऐसे में माधवपुर गांव का नाम भी बदलकर अपने मालिक यानी मोहम्मद गौरी के नाम पर मोहम्मदपुर कर दिया गया।

पूर्व में मोहम्मदपुर व्यापार का केंद्र था और यहां सब्जियों और अनाजों का बड़ा कारोबार होता था आज भी माधवपुर नाम से सब्जी का मार्केट यहां स्थित है। मोहम्मदपुर के नजदीक ही मोहम्मद बिन तुगलक में बेगमपुरी मस्जिद का भी निर्माण कराया था जोकि गुलाम वंश के बाद दिल्ली का शासक बना था। इलाके के पार्षद भगत सिंह टोकस के मुताबिक पूर्वजों के पूर्वज बताते आए हैं कि गांव का मौजूदा नाम मुगलों का दिया हुआ था इससे पहले इसका नाम श्रीकृष्ण पर माधवपुरम था। इस इलाके के निवासी और भाजपा के मंडल अध्यक्ष हरि सिंह का कहना है कि गांव के प्राचीन नाम को पुनस्र्थापित करने के लिए बरसों से प्रयास चल रहा था क्योंकि इसका यह नाम मुगलों की देन है। पूर्वज बताते हैं कि यहां पर पहले एक चुंगी भी हुआ करती थी। गांव निवासी सत्तर वर्षीय वेद प्रकाश का कहना है कि जब वे हरियाणा से 1965 में इस गांव में आए थे तब यहां पर दो गुंबद नजर आते थे लेकिन इस गांव में न तो कभी मुस्लिम समुदाय के लोगों के रहने के प्रमाण मिले न ही इस गांव के इतिहास के बारे में ऐसा पता चला है कि यह केवल मुगलों के समय ही बसाया गया था। इस गांव का अस्तित्व इससे बहुत पहले का है।

कभी था शिव और हनुमान मंदिर : अब बात हुमायूंपुर की। यह दक्षिणी दिल्ली का शहरीकृत गांव है। इसे पहले हनुमान पुर के नाम से जाना जाता था। हुमायूंपुर में एनसीसी मुख्यालय स्थित है। गांव तकरीबन 350 साल पहले बसाया गया था। गांव के बुजुर्गो का कहना है कि उस वक्त यहां फोगाट, महले, टोकस, गहलोत और गरसे गोत्र के लोग आए थे और गांव की नींव रखी थी। तब गांव की आबादी काफी कम थी, लेकिन आज यह बढ़कर हजारों तक पहुंच गई है। गांव के कुछ बुजुर्गो का कहना है कि यह असल में एक शिव और हनुमान का मंदिर था जिसको तुगलक के समय में एक गुंबद का रूप देकर कोई गुमनाम सी कब्र बनाकर इसका इस्लामीकरण कर दिया गया। इस गांव को लेकर कई तरह की कथाएं प्रचलित हैं।

कुछ लोग कहते हैं कि यह गांव लगभग 350 वर्ष पहले टोकस गोत्र के जाटों द्वारा बसाया गया था। लेकिन इसी गांव में साढ़े छह सौ वर्ष पुराना गुंबद यह बताता है इस गांव का अस्तित्व 350 वर्ष से नहीं बल्कि से कम 600 वर्ष से है। मुगल बादशाह हुमायूं ने कभी दिल्ली पर शांति पूर्वक राज्य नहीं किया। उसका जीवन हमेशा युद्ध में और भागदौड़ करते ही बीता। उसके पुत्र जलालुद्दीन अकबर ने लंबे समय तक देश पर राज किया और मुगल वंश के वैभव और समृद्धि का मुजाहिरा किया। ऐसे में यह माना जा सकता है कि चूंकि अकबर ने अपनी राजधानी आगरा को बनाया था और दिल्ली में अपने पिता हुमायूं की मृत्यु होने पर उसकी याद में एक क्षेत्र का नाम बदलकर हुमायूंपुर कर दिया। आज हुमायूंपुर बाहर से आने वालों के लिए उपयुक्त स्थान साबित होता है। यहां पर अधिकतर उत्तर पूर्व से आने वाले लोगों की बसावट है और इसी कारण यहां बने रेस्त्रं और रेहड़ियों पर भी उत्तर-पूर्व के व्यंजनों की खुशबू आती है।

क्यों रखें आक्रांताओं के दिए नाम : अपनी विजय की निशानी के तौर पर गांव, कस्बों और शहरों के नामों को बदलना विदेशी आक्रमणकारियों का शगल था। सेवानिवृत प्रोफेसर डीपी भारद्वाज कहते हैं कि उनका व्यक्तिगत रूप से मानना है कि सामाजिक सांस्कृतिक विरासत सदियों पुरानी है। बीच का कालखंड में आततायी आए, शासन किया और मानसिकता बदली। अपने गौरव को लौटाना और अभिमान करना है तो हमें कदम उठाने होंगे। इसका मकसद संप्रदाय, पूजा पद्यति या मान-अपमान का उद्देश्य नहीं है। ऐतिहासिक भूलों को सुधारनों का सिलसिला अगर बढ़ता है तो किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए। डा. अब्दुल कलाम आजाद के नाम पर यदि दिल्ली मे सड़क बनती है तो किसको आपत्ति नहीं हो सकती है। वे हमारे अपने थे, प्रेरणास्नोत थे, यहां के मूल्यों और संस्कृति से निकले हुए थे। हां, औरंगजेब के नाम पर नाम होगा तो ऐतराज होगा।

जख्मों की निशानी हैं यह नाम : राजीव तुली ने बताया कि देश या दिल्ली में जो भी आया, उसने इसे लूटा, खून बहाया और इसके सम्मान पर आघात किया। इतिहास गवाह है कि आक्रमणकारियों ने दिल्ली को किस-किस तरह से तोड़ा, कैसे जुल्म किए और किस तरह से देशवासियों की भावनाओं और मान-सम्मान को अपने अभिमान और क्रूरता तले रौंदा। इन्हीं घटनाओं, क्रूरताओं और बर्बरताओं की निशानी आज भी नामों के रूप में हमें डंसती रहती हैं। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की दिल्ली प्रांत कार्यकारिणी के सदस्य राजीव तुली का कहना है कि प्राचीन नाम स्थानों के हिसाब से रखे हुए थे।

मुगलों ने विजित भाव में आकर स्थानों के नाम बदले, अपने निशान छोड़े। इन्हीं नामों को धारण किए गांवों शहरों में रहते चले आ रहे हैं। अब तक इतिहास की इस भूल को नहीं सुधारा गया लेकिन अब जागृति आ रही है तो पुराने नामों को पुनस्र्थापित किया जा रहा है। अगर हम अंग्रेजों के दिए नामों को बदल रहे हैं तो मुगलों के दिए नाम क्यों न बदलें। दिल्ली के कई अस्पतालों के नाम अंग्रेजों के नामों पर थे, इनके नाम बदल दिए गए तो फिर मुगलों के दिए नामों को बदलने में क्या आपत्ति हो सकती है। दूसरों के दिए नामों को बदलना और अपने नामों को वापस लाना हमारे लिए गौरव की बात होगी और इस पर किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए।

साभार लिंक

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