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अब न वह गंगा है, न आस्था, और न कार्तिक पूर्णिमा की वह धार्मिकता!

हिंदू धर्म में कार्तिक, कार्तिक पूर्णिमा, कार्तिक में गंगा स्नान, देवदीपावली की महत्ता आदि आप इस एक लेख से जितना जान पाएंगे, उतना ढूंढ़ने पर भी आप शायद न पढ पाएं! आज के समय में ऐसे लेख कहां और कौन लिखता है? वरिष्ठ पत्रकार और लेखक हेमंत शर्मा ने अपने बचपन की टीस में आज की पीढ़ी को पौराणिकता का जो दर्शन कराया है, वह अद्भुत है। ऐसे लेख हमें उस पौराणिक भारत में डुबकी लगाने के लिए ले जाते हैं, जिसे शायद हम-आप भूल चुके हैं। अपने बच्चों को बताइए कि हमारी परंपरा में कार्तिक मास का जो महत्व है, वह इस नवंबर-दिसंबर में नहीं! लेकिन बताएंगे तो तब न जब आप खुद जानेंगे। तो पढि़ए और गुनिए…

हेमंत शर्मा। इस दफ़ा देवदीपावली में मन उदास था। उदासी की वजह हमारी जीती जागती परम्परा के टूटने से थी। देवों की दीपावली अब टूरिस्टों का कैलेंडर बन चुकी है। बनारस की देवदीपावली अब श्रद्धा नही बल्कि पर्यटकों के कौतुक और सरकार के प्रचार का ज़रिया बनती जा रही है। काशी का महापर्व देवदीपावली वीआईपी सिन्ड्रोम की भेंट चढ़ता जा रहा है। मुख्यमंत्री, राज्यपाल, आधा दर्जन राज्य के मंत्री, भारत सरकार के मंत्री सबकी मौजूदगी ने इस पर्व को लोक से काट दिया। सुरक्षा के नाम पर आम लोगों को घाटों पर जाने से रोका गया। इससे घाटों पर दिए पहले से कम जले। प्रशासन ने उसकी कमी बिजली की झालरों से पूरी की। बिजली की उन्हीं झालरों के ठीक नीचे परम्परा पर छाए अंधेरे की परत फैली हुई थी।

बचपन से देखता आया हूँ। काशी का आठ किलोमीटर लम्बा गंगा का अर्धचन्द्राकार तट दीपमालाओ के सज़ा रहता था। इन सवा सौ घाटों पर आम आदमी दिया जलाता था। इसके लिए कोई अपील या आयोजन समिति नही थी। स्वत:स्फूर्त यह सामूहिक सहभागिता का लोक आयोजन था
महादेवी जी ने शायद इन्हीं दीपों को प्रतिष्ठित करते हुए लिखा था। ‘दीप मेरे जल अकंम्पित। पथ न भूले एक पग भी। ‘हमारी परम्परा में दीप प्रकाशक तत्व है। इसलिए वह ज्ञान का प्रतीक है। दीया जलाने का मतलब देवता की उपस्थिति का ज्ञान होना है। देवता के साथ हमारे सम्बन्ध का ज्ञान होना। इसलिए दीए का स्थानापन्न कुछ नही होता।’

इस दिव्य उत्सव को सरकारी इवेन्ट बनाने की कोशिश ने देवदीपावली को कुरूप बना दिया। मेरे बचपन मे यह ग़ज़ब उत्सव था। लाखों लोग आस पास के इलाक़े से आधी रात से ही गंगा स्नान के लिए आना शुरू करते थे। और दूसरे रोज़ पूरे दिन स्नान चलता था। इस बार तो उन घाटो पर भी स्नान की रोक थी जहॉं वीआईपी लोगों को आना था। धार्मिक लिहाज़ से बारह महीनों में कार्तिक सबसे पवित्र महिना माना गया है। यह शरद ऋतु का आख़िरी महीना है। शरद संतुलन की ऋतु है। परम्परा से इस महीने की हर शाम को आकाश मे दिया जला टाँगते है। घाटों पर बॉंस गाड़कर दीए की छितनी रस्सी से उपर पहुँचाई जाती है। इसे आकाश दीप कहते है। जय शंकर प्रसाद की एक कहानी आकाश दीप भी इसी पर है।शहर में नदियों, तालाबों के वक्ष पर पंक्तिबद्ध दिए तैराए जाते है। इस दौरान तुलसी के हर चौरे को दीपों से आलोकित किया जाता है।

कार्तिक पूर्णिमा हमारे खेतिहर समाज और ऋतुचक्र के मिलन का पर्व है। किसान चार महीने की मेहनत के बाद ख़रीफ़ की फ़सल घर लाता है। साल भर के खाने का संजो बाक़ी बेच कर पैसा प्राप्त करता है। देवता चार महीने की नींद से जागते है। साधु संत चौमासा ख़त्म कर समाज को दिशा देने के लिए फिर से सक्रिय होते थे। ओस से प्रकृति नहायी हुई होती थी। सब मिल कर जो उत्सव मनाते थे वही कार्तिक पूर्णिमा का प्राणतत्व है।

कार्तिक पूर्णिमा सगुणोपसना के साथ ही निर्गुणोपासना का भी पर्व है। क्योंकि यह उन गुरुनानक देव से जुड़ा है। ‘गगन के थाल रविचंद्र दीपक जरे’ जैसी आराधना की वे बात करते है। स्वाति नक्षत्र इसी माह आता है। जो जलद चातक के लिए अमृत बरसाता है। चंद्रमा चकोर के लिए आग की चिनगारियाँ में शीतलता भरता है। यह माह भीतर और बाहर की सम्पन्नता का है और यह सम्पन्नता उत्सव से जुड़ती है।

देवदीपावली हमारे लिए मित्र मिलन, रसरंजन, नौकाविहार और गंगादर्शन का सालाना उत्सव था। बचपन में इसी रोज़ सुबह का कड़कती ठंड में गंगा मे डुबकी लगाता था। तब उसका यह उत्सवी स्वरूप इतना व्यापक नही था। गंगास्नान ,दान और लौटते वक्त पहली फ़सल का आया गन्ना ख़रीद हम घर लौटते थे। मैं बाउ के साथ मुँह अंधेरे गंगा स्नान के लिए जाता था। बाउ हमारे पिता तुल्य पारिवारिक मित्र थे।

दशाश्वमेध घाट पर एक पेल्हू गुरू बाउ के घाटिया (पंडा) थे। आज कल जहॉं जल पुलिस का थाना है ठीक उसी के नीचे। हम उन्ही की चौकी पर कपड़े रख स्नान करते थे। ग़ज़ब की भीड़ होती थी। बनारस के आसपास से स्नानार्थियो की भीड़ जमा होती थी। स्नान के बाद गोदान होता। उन दिनों इस मौसम में ग़ज़ब की ठण्ड पड़ती थी। लोग कटकटाती ठण्ड में तड़के टाट से ढके बछड़ों की पूँछ पकड़ गौदान करते थे। पेल्हू गुरू के तीन लड़के थे। तीनों अपनी अपनी बछिया को टाट ओढ़ा गौदान कराते थे। एक बार मैं भी वहीं था। जिस बछिया की पूंछ पकड़ाकर पेल्हु गुरू का बालक भक्तों को वैतरिणी पार करा था, वह थोड़ी देर में ज़ोर ज़ोर से ‘चींपो चींपो’ चिल्लाने लगी। लोगों ने देखा ‘अरे यह तो गधा है।’ लोगों ने पेल्हू गुरू के लड़के को दौड़ाया। वह जनाब भाग गए। पेल्हू गुरू इतना ही बोले- सरवा बहुत हरामी हौअ। पर तब तक उनका बालक गधे की पूँछ पकड़ाकर हज़ारों के गोदान करा चुका था। गुरू के लड़के तीन थे। बछिया दो थी। इसलिए वह बालक बछिया के अभाव में गधे से गोदान करा रहा था। सभी जीवों में परमात्मा का वास मानने वाले बनारस मे यह सामान्य बात है।

बचपन चला गया। अब न वह गंगा है न आस्था। न कार्तिक पूर्णिमा की धार्मिकता। गौदान वाली बछिया भी नही दिखती। पंडे गोदान के एवज़ में दक्षिणा ले लेते है। पर्यटन ,होटल, उघोग और नाव वालों ने मिल कर कार्तिक पूर्णिमा को बाज़ार बना दिया। और सरकार इस मेले की मार्केटिंग समूची दुनिया में कर रही है। घाट पर सारे मठ और घर अब होटल में तब्दील हो गए है। जो कमरे आम दिनों मे सात आठ हज़ार के थे वे सत्तर अस्सी पर पंहुच गए थे। बड़ी नाव जो रोज़ पॉंच छ हज़ार में उपलब्ध थी वह उस रोज़ दो लाख के पार पहुँच गयी थी।बड़ी नाव जिसे यहॉं हड्डी कहते है, उनमें वाशरूम भी नही है। एक लाख से ज्यादा लोग गंगा में! उनका जल विसर्जन कहॉं होगा। मित्रअजय गुरू बोले- ‘बड़ी पुरानी कहावत है जल मध्ये जल दीच्चै।’ बचपन से गंगा आर पार करता आ रहा हूँ। यह तब का फ़ार्मूला है।

मैं भी गंगा दर्शन के लिए हर देव दीपावली गंगातट पर आता हूँ। मित्रो को भी दिल्ली से पकड़ कर लाता हूँ।मेरे भीतर जो आदि बनारसी है वह इससे ताक़त पाता है। क्योकि गंगा का मतलब गतिशीलता है। प्रवाह है। जो मंद है उसे तीव्र करना है। हमारे लिए गंगा जीवन की निरतंरता का आश्वासन है। गंगा सिर्फ़ नदी का नाम नही है। इसी से जीवन की बैट्री चार्ज होती है।

घाटों पर देव दीपावली का जीवित इतिहास पंचगंगाघाट पर मिलता है। पंचगंगा काशी के पॉंच पौराणिक घाटों अस्सी, दशाश्वमेध, मणिकर्णिका, पंचगंगा और आदिकेशव मे से एक है। पौराणिक मान्यता है कि पंचगंगा घाट पर गंगा के साथ यमुना सरस्वती, धूतपापा और किरणा नदियाँ मिली थी। यहीं से नाम हुआ पंचगंगा। इस घाट पर कबीर के गुरू रामानंद रहते थे उनका श्रीमठ आज भी यहॉं मौजूद है। यह रामभक्ति शाखा की सबसे बड़ी पीठ है। इसी घाट पर अपने गुरू से तिरस्कृत होने के बावजूद कबीर ने रात के अंधेरे में गुरूमंत्र ज़बरन ले लिया था।

कार्तिक मास में त्यौहारो की भरमार है। मान्यता है कि इस महीने में स्नान, तीर्थ, दान और ताप करने वाले को विष्णु अक्षय फल की प्राप्ति करवाते है।धर्म शास्त्र कहते है कि कार्तिक में पूजा पाठ से मृ्त्युलोक से छुटकारा मिलता है। यानी मोक्ष की प्राप्ति होती है। यह हिन्दू पंचांग का आठवां महीना होता है। तुला राशि पर सूर्यनारायण के आते ही कार्तिक शुरू होता है। यह महीना शरद पूर्णिमा से लेकर कार्तिक पूर्णिमा तक चलता है। कार्तिक शुक्ल एकादशी देवोत्थान एकादशी होती है। यह वर्ष की सबसे बड़ी एकादशी है क्योंकि इसी दिन भगवान विष्णु चार महीने की नींद से जागते हैं। संतों के चातुर्मास का समापन इसी एकादशी के दिन होता है। तुलसी का विवाह भी इसी रोज़ होता है। इस पूरे महीने तुलसी की पूजा और आकाश में दिया जलाने की मान्यता है। बनारस के घाटों पर बॉंस की टोकरी मे जलता दिया बाँस पर टंगा मिलता है।

इसी दिन ही भगवान शंकर ने त्रिपुरासुर नामक असुर का अंत किया था और वे त्रिपुरारी के रूप में पूजित हुए थे। इस दिन गंगा नदी में स्नान करने से पूरे वर्ष स्नान करने का फल मिलता है। इस महीने की पवित्रता का वर्णन स्कन्द पुराण,नारद पुराण, पद्म पुराण में भी मिलता है। पुराणों में कहा गया है कि भगवान नारायण ने ब्रह्मा को, ब्रह्मा ने नारद को और नारद ने महाराज पृथु को कार्तिक मास के ‘सर्वगुण संपन्न माहात्म्य’ के संदर्भ में बताया है। कार्तिक पूर्णिमा को ही देवी तुलसी ने पृथ्वी पर जन्म लिया था। इसी दिन भगवान विष्णु ने प्रलय काल में वेदों की रक्षा के लिए तथा सृष्टि को बचाने के लिए मत्स्य अवतार धारण किया था।

इसी पवित्र वेला में देव दीपावली किसी दैवीय वरदान सी उतरती है। ये गंगा की शीतलता में देव आशीर्वाद का अमृत घुल जाने का क्षण होता है। अनादि काल से देव दीपावली सहज आस्था के जगमग दीपों से अलंकृत होती आई है। मगर अब इसी सहज आस्था को ‘वीआईपी शक्ति’ की ‘भक्ति’ वाली असहज सी दीवार से टकराना पड़ रहा है। ये दीवार बनारस के संस्कारों में कभी नही रही है। कबीर के बनारस की आस्था हमेशा से फक्कड़ रही है, ये आस्था हृदय की धमनियों में प्रवाहित होती है। उम्मीद करता हूँ कि बनारस की देव दीपावली आम जनता की घनीभूत श्रद्धा के उत्सव के तौर पर पुनः प्रतिष्ठित हो सकेगी।

साभार:

URL: Dev Deepawali That is, in the basket of bones, he hung the basket !

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