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Movie Review : भुज के गर्व को ढोकर लक्ष्य नहीं साध सकी अजय देवगन की मिसाइल

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विपुल रेगे। ‘भुज द प्राइड ऑफ़ इंडिया’ से ये अपेक्षा थी कि वह एक दिन पूर्व प्रदर्शित हुई युद्ध फिल्म ‘शेरशाह’ से हर मामले में आगे निकल जाएगी। लेकिन जब दर्शक ने फिल्म देखी तो पता चला कि अजय देवगन की ये फिल्म गुणवत्ता की उस रेखा को छू भी न सकी, जो शेरशाह ने खींच डाली थी। इस स्वतंत्रता दिवस पर फिल्म उद्योग से दो मिसाइल प्रक्षेपित की गई। इनमे से एक मिसाइल लक्ष्य साध गई किंतु भुज का गर्व देवगन की मिसाइल ढो नहीं पाई।

सन 1971 के भारत -पाकिस्तान युद्ध में भारत की शौर्य गाथाओं में भुज की गाथा विशेष महत्व रखती है। भुज की गाथा में महिला सशक्तिकरण की पायल बंधी हुई है। यदि वे 300 महिलाएं भुज की हवाई पट्टी बनाने से मना कर देती तो क्या होता ? पाकिस्तानी विमानों के द्वारा भुज में नेपाम बम गिराए जा रहे थे। अनवरत हवाई आक्रमण की आशंकाओं को मन में लेकर हवाई पट्टी का निर्माण क्या आसान काम रहा होगा ?

इस महान शौर्य गाथा को परदे पर देखने के लिए दर्शक बड़े मन से प्रतीक्षा कर रहे थे। और जब फिल्म शुरु होती है तो सारी आशाओं पर तुषारापात कर देती है। जब आपके पास इतना विलक्षण विषय हो, फिल्म निर्माण के लिए धन उपलब्ध हो, अजय देवगन जैसा माहिर अभिनेता हो तो प्रस्तुतिकरण स्तरीय होना चाहिए। फिल्म की सबसे बड़ी कमी है गहनता। किसी एक दृश्य में गहराई नहीं दिखाई देती। ऐसा लगता है उथले पानी में कोई नाव खेने का असफल प्रयास कर रहा हो।

निर्देशक सिचुएशन पर ठहरा ही नहीं। वह ठीक से भुज के एक गांव को नहीं दिखा सका। जिन महिलाओं ने ये शौर्य दिखाया था, उन 300 महिलाओं पर केवल एक किरदार दिखाया गया। महिलाओं के किरदार डेवलप ही नहीं किये गए। वह हवाई पट्टी ही फिल्म का मुख्य विषय थी किन्तु सबसे अधिक उन महिलाओं और उस हवाई पट्टी की ही उपेक्षा की गई है। अजय देवगन का किरदार ठीक से उभारा ही नहीं गया।

उनका फिल्म में प्रवेश इतना चुपके से होता है कि दर्शक कुछ पल बाद समझ पाता है कि उनका सुपर स्टार फिल्म में प्रवेश कर चुका है। देवगन स्वयं फिल्म में उखड़े से दिखाई दिए, जैसे बेमन से ये किरदार कर रहे हो। क्या ऐसा हो सकता है कि भारतीय सेना के लिए जासूस का कार्य कर रहा व्यक्ति सेना के साथ मिलकर लड़े ? इसमें संजय दत्त का किरदार केवल कुल्हाड़ी से सौ-डेढ़ सौ लोगों को काट डालता है। ऐसी तर्कहीनता देख कौन सिर न पीट लेगा।

एक युद्ध फिल्म में ऐसे ‘फ़िल्मी दृश्य’ बॉक्स ऑफिस की सेहत के लिए अच्छे नहीं होते। युद्ध फिल्मों में आप भारतीय सेना के लिए जासूसी करने वाले व्यक्ति को हल्क की भाँति लॉन्ग जम्प लेकर टैंक पर नहीं कूदा सकते हैं। इसके वीएफएक्स बहुत बचकाने हैं। सबसे अधिक इसकी ही आलोचना की जा रही है। टीवी धारावाहिकों का निर्देशन करने वाले अभिषेक दूधिया ने पहली बार किसी फिल्म को निर्देशित किया है।

इतने विलक्षण विषय के लिए आपने निर्देशक भी क्या खूब खोज लिया। उन्होंने फिल्म को निर्देशित भी वैसे ही किया है। आप एक भी दृश्य में नहीं दिखा सके कि ये 1971 का वर्ष है। कहीं भी कालखंड के अंतर की अनुभूति नहीं होती। अजय देवगन के लिए ये फिल्म लाभदायक नहीं रहेगी। अपितु इससे उनकी स्टार वेल्यू पर फर्क नहीं पड़ेगा किन्तु ये उनके कॅरियर के मार्ग का बदसूरत पत्थर बनकर खड़ा रहेगा। जैसे विमल का विज्ञापन करने पर पीक के जो दाग उनके कॅरियर पर पड़ चुके हैं, वे कभी न धोए जा सकेंगे।

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Vipul Rege

पत्रकार/ लेखक/ फिल्म समीक्षक पिछले पंद्रह साल से पत्रकारिता और लेखन के क्षेत्र में सक्रिय। दैनिक भास्कर, नईदुनिया, पत्रिका, स्वदेश में बतौर पत्रकार सेवाएं दी। सामाजिक सरोकार के अभियानों को अंजाम दिया। पर्यावरण और पानी के लिए रचनात्मक कार्य किए। सन 2007 से फिल्म समीक्षक के रूप में भी सेवाएं दी है। वर्तमान में पुस्तक लेखन, फिल्म समीक्षक और सोशल मीडिया लेखक के रूप में सक्रिय हैं।

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