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एक महिला यदि ‘स्त्रीत्व’ की जगह अपने अंदर ‘औरतपन’ ढूंढने लगे तो वह अपनी गरिमा खो देती है!

परसों रात शकुंतलादेवी फिल्म देख रहा था। वहां मातृत्व और स्त्रित्व की टकराहट में बार-बार अपने अंदर ‘औरत की तलाश’ शब्द मुझे खटक रहा था। कल सुबह यूं ही बैठे-बैठे स्त्री के विभिन्न शाब्दिक रूपों को लेकर अनायास मैंने एक पोस्ट लिख दिया, जिसे काफी लोगों ने सराहा।

दैनिक जागरण में मेरे साथी रहे Chandiduttshukla भाई ने भी इसे अपने वाल पर शेयर किया। वहां टिप्पणियों में इस पोस्ट के कुछ विरोधी दिखे, जो मूलतः तीन प्रवृत्ति के स्त्री-पुरुष हैं!

१) screen shot-1 एक नाजिया खान हैं। उनका यह कहना ठीक है कि कला व्यक्तिनिष्ठ होता है, इसलिए क्रियेटिव फ्रीडम लेना चाहिए। मेरा भी मानना है कि बिलकुल लेना चाहिए। परंतु कला व्यक्तिनिष्ठ है तो वह भावनात्मक भी है। अतः पटकथा में यदि भाव के अनुरूप शब्द हों तो वह और निखर उठता है। यदि कला के नाम पर शब्द को ही अर्थहीन बनाने का प्रयास होगा तो कला अपने भौंडेपन को ही प्रदर्शित करेगी।

अब शकुंतला देवी को लेते हैं। एक महिला जब ‘स्त्रीत्व’ की जगह ‘औरतपन’ को ढूंढने लगे तो वह अपनी गरिमा खो देती है। शकुंतला देवी जो गणित में कंप्यूटर को भी मात देती हैं, इस एक ग़लत खोज के कारण शनै:शनै: अपनी गरिमा को खोती चली जाती हैं। और इसकी निर्देशिका भी ‘औरतपन’ की इसी सोच के कारण शकुंतला देवी की सकारात्मकता से अधिक उसकी नकारात्मकता उभारती चली जाती है। यही है सोच और फिर उससे उपजे शब्द का चेतन/अचेतन पर गहरा प्रभाव!

मानव इतिहास में लंबी यात्रा के बाद ही शब्दों ने अर्थ ग्रहण किया है। शब्द केवल शब्द नहीं हैं, बल्कि किसी भी शब्द में संबंधित समाज-संस्कृति-राष्ट्र-परिवेश-अनुभूति-समाजीकरण का संपूर्ण समावेश होता है। लंबी चिंतन प्रक्रिया से शब्द और फिर शब्द से सोच का उत्तरोत्तर विकास होता चला जाता है।

राजश्री, यश चोपड़ा या संजय लीला भंसाली की फिल्म आप सपरिवार देख सकते हैं, वहीं अनुराग कश्यप की फिल्म अकेले देखने में भी असहज महसूस करते हैं। यह सोच, शब्द और फिर उसके प्रस्तुतीकरण के कारण ही है। कला तो दोनों तरह के फिल्मकार प्रदर्शित कर रहे हैं, परंतु अधिकतम लोगों को अपील किसकी कला कर रही है, यह अधिक मायने रखता है!

२) Screen shot-2 दूसरे अनु नेवतिया जैसी महिलाएं और अडिग रामकृष्णन जैसे पुरुष हैं। इनकी सोच टू-मिनट्स नूडल वाली है। मेहनत करने और गहराई से सोचने की जगह यह चलताऊ अंदाज में जीना पसंद करते हैं। इसलिए शब्द हों या भोजन, यह कुछ भी निगलने वाली प्रवृत्ति के द्योतक हैं।

३) screen shot-3 यह सैय्यद अय्यूब है‌। इस प्रवृत्ति को आईना देखना पसंद नहीं है। अतः ऐसे लोग तर्क/तथ्य से परे सीधे आपके चरित्र पर हमला करते हैं, जैसे इस महाशय ने मुझे सांप्रदायिक और महिला विरोधी कह कर किया है। ये वास्तव में ‘अरबी सोच’ की विकृति के नायाब नमूने हैं। इन नमूनों पर समय खर्च करना व्यर्थ है। वैसे भी दुनिया सैय्यद अय्यूब जैसी सोच वालों का पैंट उतरवा ही रही है!

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Sandeep Deo

Sandeep Deo

Journalist with 18 yrs experience | Best selling author | Bloomsbury’s (Publisher of Harry Potter series) first Hindi writer | Written 8 books | Storyteller | Social Media Coach | Spiritual Counselor.

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