1984 के सिख नरसंहार 34 साल बाद मौत की सजा के मायने समझते हैं आप?

 

भारत में मौत की सजा को ‘रेयरेस्ट ऑफ द रेयर’ कहा जाता है। मतलब देश की अदालत का भी मानना है कि जो जिंदगी दे नहीं सकता उसे लेने का अधिकार नहीं। इसलिए मौत की सजा देने में अदालत को सावधानी रखनी चाहिए। यही कारण है कि अदालत में दाखिल लाखो – लाख अपराधिक मामले में से विरले केस होते हैं जिसमें अपराधी को मौत की सजा दी जाती है। अदालत जब कभी किसी अपराधी को मौत की सजा देती है तो अक्सर अपने फैसले में यह व्याख्या करती है कि अपराधी का आपराधिक चरित्र बताता है कि वो समाज के लिए खतरनाक है। उसे सलाखों के पीछे रखना भी किसी की जिंदगी के लिए खतनाक हो सकता है। इसीलिए अमुख अपराधी को तब तक फंदे से लटकाया जाए जब तक उसकी मौत न हो जाए। इसे अंग्रेजी में ‘हैंग टील डेथ’ कहा जाता है। साल 1984 में भारत की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद भड़के सिख विरोधी दंगे में हजारों सिखों का नरसंहार हुआ। उन्हें जलते टायर का माला पहना कर जिंदा जला दिया गया,कमरे में परिवार समेत बंद कर मिट्टी तेल डाल कर फूंक दिया गया।

दो दिन के अदंर तीन हजार सिखों के नरसंहार के मामले में 297 मामले दर्ज हुए लेकिन 34 साल बाद भी किसी मामले में किसी पर जुर्म साबित नहीं हो पाया था। 34 साल बाद जब एक मामला खुला तो अदालत ने अपराधी को मौत की सजा सुनाई है। मौत की सजा!

 

एक नवबंर 1984 को दिल्ली के महिपालपुर इलाके में दो सिखों की हत्या करने के जुर्म में 34 साल बाद अदालत ने एक अपराधी यशपाल सिंह को समाज के लिए इतना खरनाक माना की उसे मौत की सजा दी है। 34 साल से वो अपराधी समाज में छुट्टा घुम रहा था। अपनी पारिवारिक जिंदगी जी रहा था। अपनी पूरी जवानी काट कर दबा के सहारे जब बुढ़ापे में हांफ रहा था।  अदालत ने उसे मौत की सजा दी है। इसी मामले में दुसरे अपराधी नरेश शेहरावत को अदालत ने उम्र कैद की सजा सुनाई है। उसे अब अपना पूरा बढ़ापा जेल में काटना होगा। 34 साल में इन दोनो अपराधी ने कभी एक दिन भी जेल में नहीं बिताया। क्योंकि देश की सबसे काबिल दिल्ली पुलिस को इनके खिलाफ कभी कोई सबूत नहीं मिले इस लिए मामला बंद करने की अर्जी पुलिस ने अदाल में 1993 में डाला था जिसे 1994 में अदालत ने स्वीकार कर लिया था। अब उसी मामले में दिल्ली की ही अदालत ने अपराधियों के जुर्म को इतना गंभीर माना है कि उसे मौत की सजा सुना दी है। इसलिए क्योंकि वो समाज के अंदर ही नहीं जेल के अंदर भी दूसरे की जिंदगी के लिए खतरनाक हो सकता है। वही व्यक्ति जो 34 साल से समाज में छुट्टा घुम रहा था।

वैसे य़शपाल को फांसी की सजा तभी हो सकती है जब इस पर हाइकोर्ट की मुहर लगे। क्योंकि फांसी ही एक ऐसी सजा है जिसके लिए हाईकोर्ट की संस्तुति जरुरी होती है। क्योंकि जिंदगी बेहद महत्वपूर्ण है!  यही कारण है कि जज अजय पांडे ने दोषियों को सजा पटियाला हाउस कोर्ट के बदले तिहाड़ जेल में जाकर सुनाई है ताकि अदालत परिसर के अंदर अपराधी पर कोई जानलेवा हमला कर उसकी जिंदगी पहले ही खत्म न कर दे।

 

हमारे संविधान  में इस बात की व्याख्या है कि जिंदगी सबसे महत्वपूर्ण है और उसे हर हाल में बचाने का अधिकार कानून की नजर में एक अपराधी को भी है। इसीलिए अदालत के अंदर सिर्फ अपराधी को झूठ बोलने की सजा नहीं दी है। लेकिन जो कानून किसी को अपनी जिंदगी बचाने का अधिकार देता है वही कानून किसी किसी को जिंदगी खत्म करने  के पागलपन को मौत की सजा भी तय करता है। इसीलिए ऐसे खुंखार अपराधियों को मौत की सजा का प्रावधान कानून के अंदर है। तो सवाल उठता है कि यदि यशपाल सिंह इतना खुंखार अपराधी था जिसके खिलाफ सबूत इक्कठा करने के लिए अदालत ने एसआईटी टीम की तारीफ की उसके खिलाफ कोई सबूत दिल्ली पुलिस को क्यों नहीं मिला!

सिर्फ राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के अंदर एक नवंबर 1984 को दो हजार सिखों का नरसंहार हुआ। इस मामले में 297 एफआईआर दर्ज किए गए। 34 साल बाद इस मामले पहली बार किसी को सजा हुई। वो भी तब जब मोदी सरकार के गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने तीन साल पहले 84 दंगे के सभी फाईलों की जांच के लिए जस्टिस माथुर कमेटी बनाई। जस्टिस माथुर कमिटी ने कांग्रेस सरकार द्वारा बंद किए 237 केसों का पुनर्वलोकन का फैसला किया था। दिलचस्प यह है कि दिल्ली पुलिस द्वारा दंगे के महज डेढ़ साल बाद ही 1986 बिना किसी जांच के 186 मामले बंद कर दिए गए थे। जिसमें  सज्जन कुमार और एच के एल भगत समेत कांग्रेस के कई नामचीन नेताओं को राहत मिल गई थी। बदलते दौर में कई केस और बंद कर दिए गए और बचे खुचे मामलों की सुनवाई  टलती रही। सिर्फ इसलिए क्योंकि अपराधिक मामले जिनके खिलाफ दर्ज किए गए उसमें ज्यादातर कांग्रेस के कद्दावर नेता थे या कार्यकर्ता। इस तीन दशक से ज्यादा के वक्त में भारतीय मीडिया प्रौढ़ हो गई। गुजरात दंगा मामले में खुद जज बनकर कुर्ता फाड़कर फैसला सुनाने वाली, मीडिया डेढ़ दशक तक हल्ला बोलने वाली मीडिया 84 दंगा पीड़ितों के मामले में कलम तोड़ कर चुप्पी लादे रही। हद तो यह है कि इस मामले में न तो पीड़ितों के इंसाफ के लिए मीडिया ने कभी दिलचस्पी रही। न ही अदालत की।

1984 में सिख विरोधी दंगे के साढे तीन दशक के दरमियान केंद्र में ढ़ाई दशक से ज्यादा समय तक कांग्रेस या कांग्रेस के नेतृत्व में सरकार रही। इस दौरान एक दशक तक एक सिख भारत का प्रधानमंत्री रहा लेकिन अपने ही देश में नरसंहार के पीड़ित, इंसाफ की आस छोड़ चुके थे। यह सब इसलिए क्योंकि ज्यादतर मामलों को पुलिस ने शुरुआती समय में ही सरकार के दबाव में केस बंद कर दिया। इस पूरे मामले पर लोकतंत्र के वाचडॉग की चुप्पी और इंसाफ की अदालत का मौन रहना पूरे लोकतांत्रिक व्यवस्था को सवालों के घेरों मे डालता है। अब जब साढ़े तीन दशक बाद एसआईटी जांच के बाद मामले खुलने शुरु हुए तो पहले ही मामले में अदालत ने अपराधी को मौत की सजा सुना दी। अभी 185 केस और खुलने हैं। न जाने कितने अपराधियों का नरेश शेहरावत और यशपाल सिंह का हर्ष होना है। जो समाज के लिए एक पल के लिए भी खतरनाक है । जिन्हें मौत की सजा होनी है।

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