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कन्फ्यूज मत होना रे। नेताओ को सबके सामने ऐसे ही बोलना पड़ता है।

बाबा मौर्या। श्री कृष्ण ने भी कई बार ऐसी ही नीति अपनाई थी। कहा कुछ और कहने का अर्थ कुछ और था। जिसे समझने वाले समझ गए। गांधी जी के हिंदुत्व में ऐसी कौन सी कमी थी जो डॉ हेडगेवार ने कांग्रेस छोड़कर संघ की स्थापना की ? वीर सावरकर भी कट्टर क्यों हो गए ? क्योंकि उन्होंने जमीनी वास्तविकता को समझ लिया था।

महात्मा गांधी के अनुसार हिंदू मुस्लिम एकता होनी चाहिए थी। पर उन्हें लगता था इसकी पूरी जिम्मेदारी हिन्दुओ की है। यदि मुस्लिम जेहाद बालात्कार या दंगे जैसा कुछ गलत भी करें तो हिंदुओं को उसका शारीरिक प्रतिकार करने के बजाए अपने खुद की आत्मशुद्धि करना चाहिए। ताकि उनका दिल बदल सके। इसका परिणाम क्या हुआ, सब जानते हैं।

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राम की नीति पर चलकर विजय प्राप्त तभी कर पाओगे जब दुश्मन भी रावण की तरह ईमानदार हो। महाभारत के कृष्ण भले श्रीराम की तरह झूठे हिन्दू हो पर हमारी नजर में वे महामानव ही नही सच्चे भगवान है। आज तक किसी मौलवी का बयान नहीं आया कि ट्विन टावर तोड़ने वाली लादेन, बम विस्फोट करने वाले दाऊद के गुर्गे, साधुओं को पीट-पीटकर मार देने वाले, कश्मीर , केरल या बंगाल में हिन्दू मा बहिनो से बलात्कार करने वाले सच्चे मुसलमान नहीं है या प्रलोभन देकर धर्म बदलने वाले सच्चे ईसाई नही है।

बहस इस बात पर होनी चाहिए थी कि सच्चा मुसलमान कौन है ? लेकिन विषय सामने आ गया कि सच्चा हिन्दू कौन है कौन नही। कोई तुम्हे सच्चा हिन्दू माने या न माने। शिवाजी की तरह गौहत्यारो की गर्दन उतारने, मां बहनों के बालात्कारियो को ठिकाने लगाने में देर करोगे तो सच्चे हिन्दु भले ही कहला जाओगे पर बहुत लंबे समय तके जिंदा नही रह पाओगे।

गुरु पुत्रो को दीवार में चुनने वाले, राम मंदिर तोड़ने वाले, सीरिया में कत्लेआम मचाने वाले, या सेना पर हमले करने वालो की करतूतों से आज तक किसी मुस्लिम को शर्म नही आई। किसी का मुँह काला नही हुआ। पर एक दो जगह गौरक्षा की एक दो घटनाओं के दाग से हमे शर्म आने लगी। वास्तव में गौहत्यारो और बालात्कारियो के खून के छींटे अगर दाग हैं तो “दाग अच्छे है”।

कल को हमे वेद पढने में भी शर्म आने लगेगी। जो कहते है कि ‘गौ हत्यारे को सीसे से बींध देना चाहिए”। श्रीकृष्ण, चाणक्य या सावरकर के चरित्र या वचनों से भी शर्म आने लगेगी, जिन्होंने आततायियों को उन्ही की भाषा मे जवाब देने के लिए कहा है। जिन मुस्लिमो के बीच ये बाते कही गई है वास्तव में वे मुस्लिमो का प्रतिनिधित्व नही करते।

वे तो बेचारे खुद ही काफ़िर कहलाते है। में स्वयं भी व्यक्तिगत रूप से ऐसे कई मुस्लिमो से मिला हु, उन्हें अच्छी तरह जानता हूं, और उनकी राष्ट्रभक्ति का कायल हु। पर उनके पीछे सारे मुस्लिमो या इस्लाम को महिमामण्डित नही कर सकता। ऐसे मुस्लिम भाई वास्तव में सच्चे मुस्लिम नही है। क्योंकि वे कुरान की उन आयतों का समर्थन नही करते जिनके लिए वसीम रिजवी साहब ने कोर्ट में याचिका लगाई थी।

सच्चे हिन्दू बनने के चक्कर में न तो भविष्य में सरकार बचेगी और न ही तुम बच पाओगे। जिंदा रहे तो सच्चे झूठे का फैंसला भविष्य में हो जाएगा। अभी तो संत विराधू की तरह झूठे बौद्ध बनना ही युग धर्म है। बुद्ध के समय रोहिंग्या जैसे नराधम थोड़े ही थे इसलिए बुद्ध ने इस बारे में कुछ नही बताया था। वरना वो आज के बर्मा में होते तो वो भी वही करते जो विराधू ने किया। और अगर नही करते तो जिंदा भी नही बचते।

किसी को मेरी बात का बुरा नही लगना चाहिए क्योंकि अगर अपने लोगों के बीच अपनी पद्धति का बौद्धिक होता तो उस पर यहां चर्चा नही होती। लेकिन ये एक नेता के रूप में भाषण था अतः आम आदमी की तरह उसकी विवेचना में कोई बुराई नही है। और इसे अनुशासनहीनता नही माना जाना चाहिए। श्री कृष्ण जब समझौते के प्रस्ताव के लिए हस्तिनापुर गए थे तब धृतराष्ट्र ने योजनाबद्ध तरीके से उनके स्वागत के लिए रास्ते भर व्यवस्थाएं की थी।

हस्तिनापुर में भी दुशासन के निवास को उनके लिए आरक्षित किया था लेकिन श्री कृष्ण विदुर के घर पर रुके। श्री कृष्ण ने उनकी किसी भी सुविधा का उपयोग नहीं किया और ना ही उनके टेंट में जाकर स्वागत सत्कार कराया। श्री कृष्ण दुर्योधन के समधी थे। उनके पुत्र साम्ब का विवाह दुर्योधन की लड़की दर्शना से हुआ था। इस बात का उल्लेख दुर्योधन ने करते हुए कहा कि आप हमारे घर क्यों नहीं आए

हमारे शिविरों का आथित्य क्यों नहीं स्वीकार किया? तो श्री कृष्ण कहा था कि मैं तुम्हारा आथित्य स्वीकार करके धर्म संकट में पढ़ना नहीं चाहता था। वह स्वयं अपनी व्यवस्था साथ लेकर गए थे। सच है किसी के घर जाकर उसे गाली देना व्यवहारिकता नहीं है। अतः धर्म संकट में पड़ने के बजाय सुरक्षित दूरी बनाना ही उचित है।

आडवाणी जी जिन्ना की मजार पर गए तो मजबूरी में माला भी चलानी पड़ी और उसके लिए कुछ बोलना भी पड़ा। परिणाम सामने है राम मंदिर के रथनायक आडवाणी अपने ही लोगो के बीच खलनायक बन गए। लव जेहाद, बालात्कार, गौहत्या आदि तभी रुक सकते है जबकी अपराधियो को प्राणों का भय हो। हैदराबाद के बालात्कारियो को ठोकने वाली पुलिस पर लोगों ने फूल बरसाए थे। ये आम जनभावना ही थी।

सच्चे हिन्दू व्यवहार के लिए सच्चे दुश्मन भी तो चाहिए। सच्चे हिंदू बनकर महात्मा गांधी ने सिर्फ चरखा चलाया। अगर झूठे हिंदू बनकर श्री कृष्ण की तरह चक्र चलाने की प्रेरणा हिंदुओं को दी होती, तो ना डायरेक्ट एक्शन डे होता, न नोआखाली हत्याकांड और ना भारत विभाजन। इसलिए सेवाकार्य सच्चे हिन्दू बनकर किये जायें पर देश और धर्म की रक्षा के लिए धर्मराज के सच्चे हिंदुत्व को मत अपना लेना। ऐसी कोई बात कहना ही क्यों जिससे कन्फ्यूजन पैदा हो ? आज्ञाकारी लोगो का दिमाग सोचने समझने में लग जाये और दुश्मन हमे निपटाकर चल दे।

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