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Movie review : रक्षाबंधन के साथ दहेज़ का एंगल फिट करने से सत्यानाश हो गया

विपुल रेगे। ये लगभग तय हो गया कि अक्षय कुमार की फिल्म ‘रक्षा बंधन’ फ्लॉप की ओर जा रही है। इस वर्ष में ये अक्षय की तीसरी फ्लॉप फिल्म है। रक्षाबंधन का अवसर है और इसी विषय पर बनी फिल्म को कोई देखना ही नहीं चाह रहा। एक समय पर करोड़ों की ओपनिंग देने वाले अक्षय फिल्मों की ओपनिंग में कार्तिक आर्यन से भी पीछे हो गए हैं। भाई-बहन के रिश्ते पर बनी ये  फिल्म दर्शक को प्रभावित नहीं कर सकी है।

आनंद एल राय अब बॉक्स ऑफिस पर भरोसेमंद नाम नहीं रह गया है। उनके नाम से दर्शक थियेटर में नहीं आते। उनकी ताज़ा फिल्म रक्षाबंधन का भी यही हाल है। ये एक ऐसे भाई लाला केदारनाथ की कहानी है, जिस पर चार बहनों की जिम्मेदारी है। भाई चाट की दूकान चलाता है। उसके पास बहनों का दहेज़ देने के लिए पैसे नहीं है इसलिए किसी का विवाह नहीं हो पा रहा है। केदारनाथ की एक प्रेमिका है, सपना। वह तब तक प्रेमिका से विवाह नहीं कर सकता, जब तक बहनों का विवाह नहीं कर देता।

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ये फिल्म बॉक्स ऑफिस पर सफलता पा सकती थी, यदि इसका क्लाइमैक्स नकारात्मक नहीं होता। इसका क्लाइमैक्स सकारात्मक होकर भी नकारात्मक अंत की ही अनुभूति देता है। मुझे नहीं पता कि भारत जैसे देश में ऐसा कौनसा भाई होगा, जो अपनी बहनों का विवाह कराते-कराते स्वयं बूढ़ा हो गया होगा। निर्देशक आनंद राय लगातार फ्लॉप देने के बाद अपनी चिर-परिचित धार खो बैठे हैं। सन 2018 में आनंद राय ने शाहरुख़ को लेकर ज़ीरो फिल्म बनाई थी।

उनकी आखिरी हिट फिल्म सन 2013 में प्रदर्शित हुई ‘रांझणा’ थी। इसके बाद वे कोई हिट फिल्म लेकर नहीं आए। ये भी सिद्ध हुआ कि वे लंबी रेस के घोड़े नहीं बन सके हैं। इस फिल्म की स्क्रिप्ट राइटर कनिका ढिल्लन भारतीय समाज को ठीक से जानती भी नहीं हैं। उनकी लिखी कथा में नकारात्मक तत्व अधिक है। इस कहानी को हिन्दू समाज की एक कुरीति के रुप में सामने रखा गया है। और जब आप ऐसा करते हैं तो मनोरंजन अप्रभावी हो जाता है। नकारात्मकता दर्शक को फिल्म का मज़ा ही नहीं लेने देती।

निर्देशक यहाँ कन्फ्यूजिंग दिखे हैं। वे तय ही नहीं कर सके कि फिल्म रक्षा बंधन पर बनानी है या दहेज़ प्रथा के विरोध में। ये भी कैसा मज़ाक है कि नई सदी के बाइसवें वर्ष में आप दहेज़ प्रथा को उठाते हैं। क्या ये सत्य नहीं है कि ये कुप्रथा अब समाप्ति की ओर है। जिन दिनों दहेज़ प्रथा अत्याधिक प्रचलन में थी, उन वर्षों में दहेज़ प्रथा पर सैकड़ों फ़िल्में बनाई गई थी। इनमे से कई बॉक्स ऑफिस पर सफल रही थी। उनके सफल होने का कारण ये था कि उन फिल्मों की कथाएं सामाजिक परिदृश्य के अनुसार प्रासंगिक थी।

अब तो ये समाचार ही नहीं आते कि दहेज़ के लिए स्त्री को ज़िंदा जलाया गया। राखी के बहाने एक समाज पर निशाना साधा गया है, जो दर्शक को पसंद नहीं आया। अक्षय कुमार ओवर एक्सपोज हो चुके हैं। हर दो माह में उनकी एक फिल्म आती है और पिट जाती है। वे विज्ञापनों में इतने अधिक दिखाई देते हैं कि उनके लिए दर्शकों का क्रेज ख़त्म होने लगा है। भूमि पेडनेकर को हम एक उम्मीद के रुप में देखते थे।

एक समय पर उनके भीतर स्मिता पाटिल झांकती प्रतीत होती थी लेकिन गलत फिल्मों के चयन ने उनको पटरी से उतार दिया। सत्तर करोड़ के बजट से बनी फिल्म ने 21 करोड़ का कलेक्शन तीन दिन में किया है। और निर्माताओं की तरह अब ओटीटी और सैटेलाइट अधिकार बेचकर लाभ कमाने का प्रयास किया जाएगा। ये बेजान फिल्म सोमवार से और डाउन होती चली जाएगी।

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Vipul Rege

पत्रकार/ लेखक/ फिल्म समीक्षक पिछले पंद्रह साल से पत्रकारिता और लेखन के क्षेत्र में सक्रिय। दैनिक भास्कर, नईदुनिया, पत्रिका, स्वदेश में बतौर पत्रकार सेवाएं दी। सामाजिक सरोकार के अभियानों को अंजाम दिया। पर्यावरण और पानी के लिए रचनात्मक कार्य किए। सन 2007 से फिल्म समीक्षक के रूप में भी सेवाएं दी है। वर्तमान में पुस्तक लेखन, फिल्म समीक्षक और सोशल मीडिया लेखक के रूप में सक्रिय हैं।

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