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बॉलीवुड की हवा में ड्रग्स का नशा है

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कंगना रनौत कहती हैं कि फिल्म इंडस्ट्री के कलाकारों का ब्लड टेस्ट अनिवार्य हो जाए तो सच्चाई सामने आ जाएगी। कंगना रनौत के इस विस्फोटक बयान ने बॉलीवुड के महंगे कालीन के नीचे दबी नशे की सड़ांध के दर्शन करवा दिए हैं। बॉलीवुड बदल चुका है। सुशांत की मौत से पहले का और उसकी मौत के बाद का बॉलीवुड बदला सा है। अब एक फ़िल्मी दर्शक उसे सम्मान की नज़र से नहीं देख पा रहा है, जबसे उसे पता चला है कि एक अंतरराष्ट्रीय ड्रग रैकेट बॉलीवुड से जुड़ा हुआ है। लोगों को शायद पता न हो कि मुंबई में हर वर्ष तीन-चार रस्मी छापेमारी होती है, जिसमे कुछ ड्रग पैडलर ड्रग्स के साथ पकड़े जाते हैं लेकिन नशीली दवाओं के छत्ते तक नारकोटिक्स के हाथ नहीं पहुँचते। अँधेरी की अंबोली पुलिस हर साल यहाँ ड्रग्स पकड़ती है, जो आसपास रहने और काम करने वाली फ़िल्मी हस्तियों को सप्लाई किया जाता है।

खुले तौर पर जिन फ़िल्मी हस्तियों के ड्रग एडिक्ट होने की जानकारी है, उनमें बड़े नाम शामिल हैं। संजय दत्त, रणबीर कपूर, फरदीन खान और विजय राज लंबे समय तक एडिक्ट रहे हैं। रणबीर तो रॉकस्टार फिल्म की शूटिंग तक ड्रग्स का सेवन करते रहे हैं।

कंगना ने रणबीर का नाम भी लिया है। ये तो सिद्ध हो जाता है कि कंगना के आरोप मनगढंत दिखाई नहीं देते। वे जो आरोप लगा रही हैं, उनकी जानकारियां पब्लिक डोमेन में पहले से ही मौजूद हैं। नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो जानता है कि मुंबई-गोआ-दिल्ली ड्रग्स के बाज़ार के बड़े केंद्र हैं। मुंबई में तो अंतरराष्ट्रीय सिंडिकेट सक्रिय होने की ख़बरें आ रही हैं। एक न्यूज़ चैनल में कहा गया कि ‘उड़ता पंजाब’ बनाने वाले बॉलीवुड को ‘उड़ता बॉलीवुड’ बनानी चाहिए। उस चैनल ने कुछ गलत तो नहीं कहा है।

ड्रग पैडलर एजाज खान

अब तो ये ज़हर टीवी इंडस्ट्री में भी घुस गया है। नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो ने दो दिन पूर्व ही बेंगलुरु से एक पूर्व टीवी अभिनेत्री अनिखा को गिरफ्तार किया है। अनिखा टीवी और फिल्म उद्योग के बहुत से अभिनेताओं और संगीतकारों को ड्रग्स सप्लाई कर रही थी।

बिग बॉस की एक प्रतियोगी मुमैथ खान ड्रग्स के साथ गिरफ्तार हो चुकी है। अपूर्व अग्निहोत्री अपनी पत्नी के साथ एक रेव पार्टी से गिरफ्तार हो चुके हैं। टीवी प्लेटफॉर्म पर लोग अपने बच्चों को कॅरियर बनाने भेजते हैं। सोचिये आपकी पंद्रह वर्षीय प्रतिभाशाली संतान मुंबई जाए और वहां ड्रग्स की गिरफ्त में आ जाए। सोचकर ही रोंगटे खड़े हो जाएंगे। क्या गारंटी है कि ड्रग्स का प्रभाव रियलिटी शो के मंचों तक न जा पहुंचा हो, जहाँ छोटे बच्चों से लेकर टीनएजर्स अपना भाग्य आजमाते हैं।

एक समय था जब फिल्म उद्योग में काम करने वालों को अच्छी दृष्टि से नहीं देखा जाता था। फिर ये सोच नब्बे के दशक में ख़त्म हुई। टीवी पर सारेगामा जैसे अच्छे मंचों पर प्रतिभावान बच्चों को आने के लिए प्रेरित किया। उसके बाद तो डांस और गायन पर बन रहे ऐसे कार्यक्रमों की बाढ़ सी आ गई।

कई बच्चों ने यहाँ प्रतिभा का प्रदर्शन कर पहचान बनाई। अब लोगों की दृष्टि बॉलीवुड के प्रति फिर से बदल गई है। सुशांत सिंह राजपूत की निर्मम हत्या और उसमे ड्रग एंगल आने से उन अभिभावकों की चिंता बढ़ गई है, जिनके बच्चे या तो बॉलीवुड में काम कर रहे हैं या अभी संघर्षरत हैं। क्या सुशांत की हत्या के बाद युवा अभिनेता कार्तिक आर्यन के माता-पिता की चिंता न बढ़ गई होगी, जो मध्यप्रदेश के छोटे से शहर ग्वालियर में रहते हैं।

केंद्र सरकार की तीन एजेंसियां इस समय मुंबई में बॉलीवुड के गुप्त तारों को खंगालने का प्रयास कर रही हैं। केंद्र को इस मामले में कतई ढील नहीं बरतना चाहिए। ये उन हज़ारों युवाओं के जीवन का प्रश्न है, जो इस समय बॉलीवुड में कार्यरत हैं। सुशांत सिंह राजपूत का एक वीडियो वायरल हुआ है।

वीडियो में मुंबई के एक नामीगिरामी व्यक्ति का गुर्गा सुशांत को धक्का देते हुए एक कार में बैठा रहा है। ये वीडियो जब सुशांत के परिवार ने देखा होगा तो उनको कैसा भय हुआ होगा। ऐसा ही भय उन अनगिनत अभिभावकों के मन में समा गया है, जो अपनी संतानों को बॉलीवुड में सितारा बनने के लिए भेज चुके हैं।

नेपोटिज़्म से ग्रस्त हिन्दी फिल्म उद्योग की नसों में नशीला पावडर दौड़ रहा है। क्या छोटे शहर के युवा का प्रतिभावान होना अपराध है। वह पटना जैसे शहर से जाकर एक स्टार बन जाता है तो क्या ये उसका अपराध है। कंगना एक पहाड़ी गांव से मुंबई जाकर मुंबइया अभिनेत्रियों को चुनौती देती हैं, तो क्या उनको पंखे से लटका देना चाहिए।

बॉलीवुड पर अभी एक गाना बहुत प्रासंगिक हो गया है। इतना नशा क्यों छा रहा है, तूने हवा में क्या भांग मिलाया। बॉलीवुड की हवाओं में एमडी ड्रग्स की खुमारी घुली हुई है। उस रात संभवतः हत्यारे ड्रग्स के गहरे नशे में थे। उनको तनिक अहसास ही नहीं था कि वे न केवल एक युवा के सपनों की हत्या कर रहे हैं, बल्कि उससे जुड़े छोटे शहरों के युवाओं के ख्वाबों को भी दफन कर रहे हैं।

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Vipul Rege

पत्रकार/ लेखक/ फिल्म समीक्षक पिछले पंद्रह साल से पत्रकारिता और लेखन के क्षेत्र में सक्रिय। दैनिक भास्कर, नईदुनिया, पत्रिका, स्वदेश में बतौर पत्रकार सेवाएं दी। सामाजिक सरोकार के अभियानों को अंजाम दिया। पर्यावरण और पानी के लिए रचनात्मक कार्य किए। सन 2007 से फिल्म समीक्षक के रूप में भी सेवाएं दी है। वर्तमान में पुस्तक लेखन, फिल्म समीक्षक और सोशल मीडिया लेखक के रूप में सक्रिय हैं।

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